मंगलवार, 16 मई 2017

हनुमंत लांगुल्लास्त्र शत्रुन्जय स्त्रोत

हनुमंत लांगुल्लास्त्र शत्रुन्जय स्त्रोत

।।विनियोग:।।
ऊँ अस्य श्री हनुमल्लांगुलशत्रुन्जय स्त्रोत मंत्रस्य ईश्वर ऋषिः अनुष्टुप छन्दः श्री हनुमान रूद्रो देवता हं बीजम्
स्वाहा शक्तिः हृा हृा हृा कीलकम् मम
शत्रुसंहारणार्थे मम सवरिक्षयार्थे जपे विनियोगः।
अब ऋषि न्यास करे -
1. ऊँ ईश्वर ऋषियै नमः - शिरसे ।
2. ऊँ अनुष्टुप छन्दसे नमः - मुखे।
3. ऊँ श्री हनुमान रूद्रो देवता नमः - हृदये।
4. ऊँ हं नमः - गुह्ये।
5. ऊँ स्वाहा नमः - पादयो।
6. ऊँ हृा हृा हृा बडीलकाय नमः - नाभौ।
विनियोगाय नमः सर्वागें।

।।करन्यास:।।
ऊँ हृीं रामदूताय - अगुष्ठाभ्याम् नमः ।
ऊँ हं अक्षयकुमार विध्वसंकाय - अनामिकाभ्याम् नमः।
ऊँ हृैं लंकाविदाहृकाय - तर्जनीभ्याम् नमः।
ऊँ हृौं रूद्रावताराय - मध्यमाभ्याम नमः।
ऊँ हांः सकलरिपु संहारणाय: कनिष्ठाभ्याम् नमः।
ऊँ हृः अंजनयाय: - करतल पृष्ठाभ्याम् नमः।

।।हृदय न्यास:।।
ऊँ हृां आंजनेयाय: हृदयाय नमः।
ऊँ हृीं रामदूताय:- शिरसे स्वाहा।
ऊँ हं अक्षयकुमाराय विध्वंसकाय:- शिखायै वषट्।
ऊँ हृौं लंकाविदाहकाय:- कवचाय हूम।
ऊँ हृौ रूद्रावताराय:- नैत्राय वौषट्।
ऊँ हृ सकलरिपु संहारणाय:- अस्त्राय फट्।

।।मंत्र:।।
त्रैलोभ्यांक्रमण प्रराक्रमाय श्रीराम भक्त मम परस्य च सर्व शत्रुन् चतुर्वर्ण सम्भवान पुस्त्री नपुसंकान।
भूत भविष्यंद् क्वथानान् दुरस्थान, पुस्त्रीनपुसंकान
भूत भविष्यद् वर्तमानान् दुरस्थान समीपस्थान नाश
सकट जाती यान् कलत्रपुत्र मित्रमृत्युं बन्धुसुहृत्
समेतान।राज्ञो राजसेवकान मंत्री सचि सखीना त्यन्तिकान क्षणेन त्वष्टया एतद् दिनावधि मानोपायर मारये मारय अस्त्रैः छेदय-छेदय अग्निना ज्वालय ज्वालय दाहय-दाहय अक्षय कुमारवत पाद तलाक्रमेणन आत्रोय्य-आत्रोय्य घातय-घातय भक्तजनवत्सल सीता शोक शोक प्रहारक सर्वत्रभामिन च रक्ष-रक्ष हा हा हा हृुं हृुं हुं।
भूत सघे सहृ भक्षय-भक्षय क्रुद्ध चेतसा नखैविधारय-विदारद दाशादश्माुदू उच्चाटाय-उच्चाटाय पिशाचवद् क्षंशय भ्रंशय घे घे घे हुं हुं हुं फट् स्वाहां।।

ऊँ नमो भगवते श्री हनुमंते महाबल प्रराक्रमाय
महाविप्पति निवारणाय भक्तजन मनः सकल्पनाय कल्पद्रूमाय दुष्टजन मनोरथः स्तम्भनाय प्रभजन प्राणप्रियाय स्वाहा ।।

ऊँ नमो हनुमंते पाहि पाहि एहि एहि सर्वग्रहभुतानां
डाकिनी शाकिनीनां सर्वीवषयान आर्कषय आकर्षय मर्दय मर्दय छेदय छेदय अपमृत्यु
प्रभूतमुल्युपशोषय शोषय ज्वल प्रजवल भूत मंडल पिशाच मंडल निरसनाय भूतज्वर प्रेत ज्वर चातुर्थिकज्वर महेश्वर जवर छिधिं छिधिं भिन्दी-भिन्दी अक्षिशूल कुक्षि शुल शिरोभ्यंतर शूल गुल्म शूल पित्र शूल ब्रह्म राक्षस कुलप्रनज नागकुलविष निविषं कुरू-कुरू स्वाहा।।

।।ध्यान।।
श्रीमन्त हनुभन्तामान्त रिपुमिद् भूमृत्तभुभ्राजित
बाल्गद् बालधिबद्धवैरिमिचय चाभि कटाद्रिप्रभम्।
रोषासेत पिशंगः नेत्र नलिन भूमंगमंगे स्फटतु प्रौद्यच्यण्ड मखूख मण्डल मुख दुख पाह दुः खिनाम्।।
कौपीना काटसूत्र गौज्यजिन युग्देह विदेहात्मज
प्राणाधीशयदारविन्दः निहंत स्वान्तं कृतांन्तद्धिषाम
ध्यात्वेर्व समरांगणे स्यित मकानीय स्वहत्पकंजै
सम्पूजयखिल पूजनोक्तविधिनां साम्प्रार्थयेल्पार्थतेमू ।।2।।

।।हनुमल्लांगुलशत्रुन्जय स्त्रोत ।।
ओं हनुमंत अंजनीसुतो महाबलपराक्रम
लोललागुलपातेन ममारातीन निपातय ।।1।।
अक्षक्षपण पिंगााक्षदि त्रिजासुक्षयक्कर, लोललांगुलपातेन ममारातीन निपातय ।।2।।
मर्कटाघिप मार्तण्डमण्डलग्रासकारक, लोललांगुलपातेन ममारातीन निपातय ।।3।।
रूद्रावतार संसारदुः ख भाराप्रहारक,
लोललागुलपातेन ममारातीन निपातय ।।4।।
श्रीराम चरणाम्भोज मधुपापितमानस्, लोललांगुलपातेन ममारातीन् निपातय ।।5।।
बालिकाल कोटदक्रान्त सुग्रीवोन्मोचक प्रभो,
लोललांगुलपातेन ममारातीन निपातय ।।6।।
सीता विरह वारीशम अग्नि सीते शतारक,
लोल लांगुलापातेन ममारातीन् निपातयः ।।7।।
रक्षोराज प्रजापाग्नि दहयमान् जगहित्।
लोललागुलापातेन ममारातीन निपातय ।।8।।
ग्रसताशेष जगत्स्वास्थ राक्षसाम्भोधिमन्दर ।
लोललांगुलपातेन ममारातीन निपातय ।।9।।
पुच्छगुच्छ स्फप्द्धूम ध्वजदग्ध निकेतन, लोललांगुलपातने ममारातीन निपातय ।।10।।
जग्न्मनोदुरूल्धय पारावार विलंघन् ।
लोललांगुलपातेन ममारातीन निपातय ।।11।।
स्मृति मात्र समस्तेष्ट पूरणा प्राणतप्रिये ।
लोललांगुलपातेन ममारातीन निपातय ।।12।।
रात्रिचरणभूराशि कत्र्तानैक विकतेन।
लोललांगुलपातेन ममारातीन निपातय ।।13।।
जानकी जानकी जानी प्रेम पात्र परन्तप, लोललांगुलपातेन ममारातीन निपातय ।।14।।
भीमादिक महावीर वीरेवेशादितारक।
लोललांगुलपातेन ममारातीन निपातय ।।15।।
वैदेहि विरहाक्रान्त रामरोष कविग्रह।
लोललागुलपातेन ममारातीन निपातय ।।16।।
व्रजागनखदेष्ट्रेश व्रजिव्रजावकुण्ठन ।
लोललागुलपातेन ममारातीन निपातेय।।17।।
अखर्व गर्व गन्धर्व पर्वतोद्भेदनेश्वर।
लोललागुलपातेन ममारातीन निपातेय ।।18।।
लक्ष्मण प्राण संस्त्राणं त्रातं तीक्ष्णकरान्वयं ।
लोललागुलपातेन ममारातीन निपातय ।।19।।
रामादि विप्रयोगार्त भरताद्यर्तिनाशन ।
लोललागुलपातेन ममारातीन निपातय ।।20।।
द्रोणाचल सुभत्क्षेय समुत् क्षिप्तारिभैव।
लोललागुलपातेन ममारातीन निपातय ।।21।।
सीतार्शीवाध सम्पन्न समस्ताभ्य वछिंतम्।
लोललागुलपातेन ममारातीन निपातय ।।22।।
वात पित्त कफ श्वास स्वरादि व्याधिनाशन।
लोललागुलपातेन ममारातीन निपातय ।।23।।

।।फल श्रुति।।
इल्येवभश्वतयतलोपाविष्टः शत्रुंजय ना पठेत्सत्वंयः।
सः शीघ्रमेवास्त समस्त शत्रु, प्रभोदत्ते मरूजत प्रसपित।।

**************************************
।। राहुलनाथ ₂₀₁₇।।™
" महाकालाश्रम "
भिलाई,छत्तीसगढ़,भारत
पेज लिंक:-https://www.facebook.com/rahulnathosgybhilai/
0⃣9⃣1⃣9⃣8⃣2⃣7⃣3⃣7⃣4⃣0⃣7⃣4⃣

चेतावनी-हमारे हर लेख का उद्देश्य केवल प्रस्तुत विषय से संबंधित जानकारी प्रदान करना है लेख को पढ़कर कोई भी प्रयोग बिना मार्ग दर्शन के न करे । किसी गंभीर रोग अथवा उसके निदान की दशा में अपने योग्य विशेषज्ञ से अवश्य परामर्श ले। साधको को चेतावनी दी जाती है की वे बिना गुरु के निर्देशन के साधनाए ना करे। अन्यथा मानसिक हानि भी संभव है। यह केवल सुचना ही नहीं चेतावनी भी है।
विशेष:-इस पोस्ट से सम्बंधित शाब्दिक त्रुटि, पूजा विधि एवं अन्य जानकारी के लिए ऊपर दीये गए नंबर व्हाट्सऐप पे संपर्क करे।।

मंगलवार, 2 मई 2017

बगलामुखी का गुप्त रहस्य (पहली बार प्रकाशित)

बगलामुखी का गुप्त रहस्य (पहली बार प्रकाशित)
*****************************************
आइये मित्रों,आज कुछ परिचर्चा करते है "देवी बगलामुखी"के चमत्कारी विषय मे ।बहुत से मित्र अक्सर मुझसे प्रश्न करते है कि वे देवी की साधना करते है और लगातार कर रहे है किंतु उन्हें पूर्ण रूप से लाभ नही हो रहा है इसका मूल कारण क्या है?
मित्रो,सबसे पहले देवी बगलामुखी के विग्रह पर एक दृष्टि डाले ,क्या दिखता है आपको?ये देवी शत्रु की जिव्हा को  अपने बाये हाथ से खींच रही है और दाये हाथ से शत्रु को मुद्गर से मार रही हैं ये विग्रह देवी के शत्रुओं के प्रति व्यवहार को दर्शाता है,ये देवी के प्रयोग शत्रु की जुबान बंद करने के लिए ,कानूनी कार्यवाही रोकने के लिए किए जाते है।जब कोई आपको बदनाम करने का प्रयास करे तब मूल रूप से ये देवी कार्य करती है।यदि आपको इस देवी से संबंधित परेशानियां नही है तो फिर इनकी साधना ना करे।देवी का पीला रंग पित्त एवं स्तंभन का कारक है सिर्फ स्तंभन ही देवी का मूल शस्त्र है इसके विपरीत यदि आप कोई और इच्छा से ,जैसे शत्रु के मारण की कामना से पूजा करते है तो यही देवी काली में परिवर्तित हो जाती है ,यदि आप वशीकरण की कामना करते है तो यही देवी सरस्वती में भी परिवर्तित हो जाती है किन्तु स्वरूप बदलने पे ये बगला नही रह जाती है।
यहां समझने वाली एक और बात है कि देवी का मूल मंत्र मात्र "ह्लीं"है और इसके अलावा जोड़े गए सब शब्द् प्रार्थना मात्र है सोशल मीडिया में ,किताबो में बार बार देवी के 36 अक्षरों का मंत्र दिया गया है किंतु कही भी मंत्र की मूल विधि आज तक कही दी गई है मैंने कभी नही पढ़ी सभी जगह बस कॉपी पेस्ट कर छापा गया है ।मंत्र में ध्यान से पढ़े की आप क्या पढ़ रहे है आप कह रहे है कि " सभी दृष्टो के बातो को,मुख को ,पैर को रोक दो,जुबान को कील दो,उसकी बुद्धि का विनाश कर दो किन्तु कही भी दृष्ट के नाम-गोत्र एवं ध्यान का उल्लेख नही किया गया है।
हां कुछ जानकार व्यक्ति संकल्प में शत्रु के नाम का उल्लेख करने की सलाह देते है किंतु मंत्र में शत्रु का नाम किस जगह लगाए जिससे मंत्र की चाल सही हो और अक्षर भी 36 रहे ऐसा उपाय क्या कभी आपने किसी किताब में या सोशल मीडिया की पोस्ट में पढ़ा है?निश्चित ही नही पढ़ा होगा।
इसीकारण वश सभी विद्याओ को गुरु शिष्य परंपरा में सम्हाल के रखा गया है ।
इस मंत्रानुसार दृष्टो को मारो!
क्यो भाई क्यो मारो?
उसने आपके साथ क्या बुरा किया है ,जिसके साथ बुरा किया होगा ,उसकी नजर में वो दृष्ट होगा आप क्यो बीच मे अपनी राय जोड़ रहे है।आप करोड़ो मंत्र जाप करो कुछ नही होगा ,जब तक पूरी विधि ना जान पाए।हा दो या चार साधको को मनोवैज्ञानिक रुप से लग सकता है कि सफलता प्राप्त हुई है ।
बगला देवी के बहुत से साधक इस विधि को जानते है और वो अपने अनुयायियों पे देवी के मंत्रो का प्रयोग कर उन्हें स्तंभित कर देते है जिससे कि वो बार बार उस भगत के दरबार का चक्कर लगाने को विवश हो जाये।स्मरण रहे मित्रो ये देवी हो या अन्य देवी देवता ,सब ऊर्जा मात्र है और ऊर्जा को पाप पुण्य से कोई लेना देना नही होता वो तो प्रक्षेपण करने वाले कि आज्ञा के अनुसार कार्य करती है ।विद्युत के वोल्टेज-वाट   इत्यादि को कम करके जब चिकित्सक किसी के प्राण बचाये जा सकते है वही इन्हें बढ़ा के किसी के प्राण भी लिए जा सकते है,इसमें आप कहे कि ऊर्जा पापी है दृष्ट है तो यह ऊर्जा का अपमान हीं होगा।
ऐसे बहुत से मित्र है जिनका कार्य स्तंभन मंत्र किसी सिद्ध से या किताबो से लेकर पढ़ने पर उनके कार्य सब अचानक रुक गए,ऐसे में उनसे इस स्तंभन की विधिवत काट करवा कर पुनः सात्विक में सरस्वती एवं तामसिक में महाकाली का विधिवत अनुष्ठान करवा कर ,उन्हें मैंने ठीक करने का प्रयास किया जिसमें ७०% सफलता भी प्राप्त हुई।
मित्रों ये पोस्ट देवी के विरुद्ध नही बल्कि देवी की उच्च स्तंभन क्षमता को दर्शाने लिखी गई है कृपया पोस्ट को अन्यथा ना ले एवं जब भी किसी भी देवी-देवता की साधना करनी हो तो पहले उनके गुण धर्म एवं क्षमता को भली भांति समझ ले।एवं सही मार्ग दर्शन में रहकर साधना करे।ऐसे बहुत से लोग मिलेंगे जिन्होंने काली,दुर्गा,तारा, बगला का कवर फ़ोटो लगा के ये बताने का प्रयास किया कि वे सिद्ध साधक है किंतु हर पोस्ट में वही आधे- अधूरे मंत्र दिए होते है।
प्राचीन ऋषि मुनियों योगियों ने इसे गुप्त विद्या कहा है अब आप सोचिये की ये इतनी सरल होती तो इसे गुप्त विद्या क्यो कहां गया।यहां पोस्ट पढ़कर बहुत से मित्र शास्त्रो-उपनिषदों का वास्ता देंगे कहेगे की वहां ऋषियों ने लिखा हैं तो मित्रो ये भी समझने का प्रयास करे कि वहा भी गुप्तता को प्राथमिकता देते हुए ,विषय को जन सामान्य से दूर रखा गया था जिससे कि ये विद्या कुपात्रों के हाथ ना पहुच जाए।मूल बातो को गुरु गम्य ही रखा गया था और आज भी गुरु गम्य ही है।इन रहस्यो को समझने के लिए।भगवान राम,कृष्ण को भी गुरु धारण कर विद्या ग्रहण करनी पड़ी थी वरना क्या उनको पढ़ना नही आता था?या उनके पास गुप्तचर नही थे?जो इन विद्याओ की जानकारी निकाल लेते।इसी कारण वश इस बहुमूल्य ज्ञान को गुरु गम्य कर ,सुपात्र के कान में फूंकने (अकेले में बताने)का प्रचलन रहा जो आज भी चल रहा है।क्योकि किताबो में लिखी बाते चोरी हो सकती है किंतु बुद्धि/स्मृति से चोरी नामुमकिन ही है।
मेरी किसी बात से देवी के भक्तों को ठेस पहुची हो या आत्मा आहत हुई हो तो मैं करबद्ध क्षमा मांगता हूं।।
पोस्ट पसंद आने से अवश्य लाइक,कमेन्ट करे ,जिससे कि भविष्य में में आपकी इसी प्रकार सेवा करता रह।आपकी लाइक कमेंट ही मेरे लिए आशीर्वाद है पारितोषित हैं।
****JSMOSGY*********

व्यक्तिगत अनुभूति एवं।विचार©₂₀₁₇
।। राहुलनाथ।।™
भिलाई,छत्तीसगढ़,भारत
पेज लिंक:-https://www.facebook.com/rahulnathosgybhilai/
0⃣9⃣1⃣9⃣8⃣2⃣7⃣3⃣7⃣4⃣0⃣7⃣4⃣

🚩🚩🚩जयश्री महाँकाल 🚩🚩🚩
इस लेख में वर्णित सभी नियम ,सूत्र एवं व्याख्याए,एवं तथ्य हमारी निजी अनुभूतियो के स्तर पर है अतः हमारी मौलिक संपत्ति है।विश्व में कही भी,किसी भी भाषा में ये इस रूप में उपलब्ध नहीं है।इसकी किसी भी प्रकार से चोरी,कॉप़ी-पेस्टिंग आदि में शोध का अतिलंघन समझ कार्यवाही की जायेगी।अतः आपसे निवेदन है पोस्ट पसंद आने से शेयर करे ना की पोस्ट की चोरी।

चेतावनी-हमारे हर लेख का उद्देश्य केवल प्रस्तुत विषय से संबंधित जानकारी प्रदान करना है लेख को पढ़कर कोई भी प्रयोग बिना मार्ग दर्शन के न करे । किसी गंभीर रोग अथवा उसके निदान की दशा में अपने योग्य विशेषज्ञ से अवश्य परामर्श ले। साधको को चेतावनी दी जाती है की वे बिना गुरु निर्देशन के साधनाए ना करे। अन्यथा प्राण हानि भी संभव है। यह केवल सुचना ही नहीं चेतावनी भी है।

रविवार, 30 अप्रैल 2017

पैंसठिया शिव

पैंसठिया शिव
२२-३-९-१५-१६
१४-२०-२१-२-८
१-७-१३-१९-२५
१८-२४-५-६-१२
१०-११-१७-२७-४

पैंसठिया यंत्र सुखों का प्रदाता एवं इच्छाओ को पूर्ण करने में अत्यंत प्रभाव शाली यंत्र है।किसी भी शुभ तिथि मुख्य तः चतुर्दशी तिथि को सोमवार पड़ने से इस यंत्र का निर्माण अनार की कलम द्वारा गोरोचन,केसर,अष्टगंध की स्याही को मिलाकर बिना कटे-फटे भोजपत्र पे लिखना चाहिए।यंत्र प्रातः काल स्नानादि के उपरांत लिखे।इस काल मे गुलाब की खुशबू वाली धूपबत्ती का उपयोग करे।
आसन में बैठने के बाद सर्वप्रथम गुरु का स्मरण कर गुरु का ध्यान कर उन्हें प्रणाम कर ,आदिगुरु भगवान शिव की मन ही मन स्तुति करे-

।।स्तुति।।
यस्यांके च विभाति भूधरसुता देवापगा मस्तके।
भाले बाल विधुर्गले च गरलं यस्योरसि व्यालराट ।।
सोsयं भूति विभूषणः सुरवरः सर्वाधिपः सर्वदा।
सर्वः शर्वगतः शिवः शशिनिभः श्रीशंकरः पातु माम्।।

इस स्तुति के बाद भगवान शिव के पंचाक्षरी मंत्र "ॐ नमः शिवाय" का दस हजार रुद्राक्ष की सिद्ध माला से जाप करे।यंत्र की पंचोपचार द्वारा पूजन कर इस यंत्र को स्वर्ण या ताँबे के तावीज में रख कर दाहिनी भुजा पर काले धागे से बांध लें।
ऐसा करने से भगवान शिव के आशीर्वाद से सभी व्याधियो का हनन होता है और सुख संपत्ति की प्राप्ति होती है।

।। राहुलनाथ ©₂₀₁₇।।™
" महाकालाश्रम "
भिलाई,छत्तीसगढ़,भारत
पेज लिंक:-https://www.facebook.com/rahulnathosgybhilai/
0⃣9⃣1⃣9⃣8⃣2⃣7⃣3⃣7⃣4⃣0⃣7⃣4⃣
************JSMOSGY****************

चेतावनी-हमारे हर लेख का उद्देश्य केवल प्रस्तुत विषय से संबंधित जानकारी प्रदान करना है लेख को पढ़कर कोई भी प्रयोग बिना मार्ग दर्शन के न करे । किसी गंभीर रोग अथवा उसके निदान की दशा में अपने योग्य विशेषज्ञ से अवश्य परामर्श ले। साधको को चेतावनी दी जाती है की वे बिना गुरु के निर्देशन के साधनाए ना करे। अन्यथा मानसिक हानि भी संभव है। यह केवल सुचना ही नहीं चेतावनी भी है।
विशेष:-इस पोस्ट से सम्बंधित पूजा विधि एवं अन्य जानकारी के लिए ऊपर दीये गए नंबर व्हाट्सऐप पे संपर्क करे।।

सिंहासन बत्तीसी का मूल रहस्य

सिंहासन बत्तीसी का मूल रहस्य
एक बार अवश्य पढ़ें ये रहस्य आपके होश उड़ा देगा।
मित्रों सिंहासन बत्तीसी का नाम तो आपने सुना ही होगा किन्तु बहुत ही कम लोग है जो इस सिंहासन सत्यता को समझने का प्रयास करते है सामान्य जन के लिए ये मात्र उपदेश देने वाली कहानियों का संग्रह है ।आज इसे हम समझने का प्रयास करते है कि ये सिंहासन कहा है?क्या इसका अस्तित्व आज भी है?क्या कभी ऐसे कोई सिंहासन अस्तित्व रहा होगा?बहुत ही विचारणीय विषय है ये।
यह सिंहासन काल्पनिक नही है इस कि मूल कहानी जिन्होंने लिखी है वो पढ़ने में अच्छी लगती है किंतु इस कहानी का गूढ़ रहस्य को सार्वजनिक नाही किया गया ,इस रहस्य को समझना आसान कार्य नही है।
इस कहानी का मुख्य पात्र एक साधारण-सा चरवाहा जो अपनी न्यायप्रियता के लिए विख्यात है, जबकि वह बिल्कुल अनपढ़ है और वो जब भी इस सिंहासन पे बैठता है वह ज्ञान एवं न्याय की बाते करता है।
मित्रो इसका मूल एवं गूढ़ रहस्य ये है कि ये कोई पत्थर का ,या सोने का बना सिहासन नही है।यह सिंहासन बत्तीस पुतलियों से बना हुआ है मतलब आपके 32 दांतों से बना हुआ है और जब ये बत्तीस पुतलिया आपस मे जुड़ती है तो ज्ञान की प्राप्ति होती है बत्तीस पुतलियों पे बैठने से आशय ऊपर और नीचे के 16-16 दांतों को आपस मे मिलाना और मौन रहना।जैसे ही आप बात करते है ये सिंहासन की पुतलियां बोलने लगती है ।इस सिंहासन पे बैठने वाले को ज्ञान की एवं निर्णय लेने की क्षमता प्राप्त होती है।ऊपर के धनात्मक दांतो का नीचे के ऋणात्मक दांतो से मिलते ही ये एक ऊर्जा के परिपथ से जुड़ जाता है।इन सभी दांतो की नसों का सीधा संबंध ज्ञान एवं सहस्त्रार से है और इन नसों का दूसरा सिरा दिमाग के मूल से जुड़ा होता है।इन दांतो पे विरुद्ध क्रम(विक्रम) से ध्यान लगाने से सभी प्रकार की सिद्धिया प्राप्त होती है।यह सिंहासन राजा भोज को मिट्टी के टीले के नीचे से प्राप्त हुआ था यहा मिट्टी अज्ञान को कहा गया है।यदि गुरु ज्ञान द्वारा अज्ञान की मिट्टी हटा दी जाए तो यह सिंहासन प्राप्त हो जाता है।इन पुतलियों को 8-8 के चार हिस्सो में बांटा गया है।जो सिहासन के चार स्तम्भ है,जिसपे ये आसन टिका हुआ है।इस सिंहासन की बेजोड़ कारीगरी से आप सब वाकिफ है इनकी आकृति,इनकी पकड़,इनकी मजबूती जो पत्थर को भी तोड़ दे।ये पुतलियों(दांतो) में लचक होती है स्पंज के समान जो आपको लगातार संदेश भेजते रहते है।इन दांतो को सामान्य रूप से आपस मे मिलाके रखना चाहिए जोर से दबाना नही चाहिए।धीरे-धीरे कुछ दिन प्रयास करने से ये दिव्य ज्ञान की अवस्था प्राप्त होने लगती है।
मित्रों 2007 के आस-पास मैं गुरु द्वारा प्राप्त मंत्रो का नित्य जाप किया करता था और आज भी यह क्रम चल रहा है।उस जाप काल मे मैंने अपने स्वप्न में एक महात्मा को देखा ,जिनका रूप दिव्य था एवं बाल सफेद थे ।उन्होंने मुझे कहा कि सिंहासन बत्तीसी पे आसन लगा के जाप कर,सफलता मिलेगी।अब ये स्वप्न मेरे लिए एक पहेली बन कर रह गया था की अब ये सिंहासन बत्तीसी कहा मिलेगा।बचपन मे "सिंहासन बत्तीसी" की कहानी सुनी थी उज्जैन की,मै उज्जैन पहुचा किन्तु कुछ विशेष प्राप्त नही हुआ,दर्शन हुए सिंहासन के जो वहां है।खैर तलाश चलती रही 3 वर्ष।3वर्ष बाद स्वप्न में फिर उन्ही महात्मा के दर्शन हुए इस बार उन्होंने बताया कि मंत्र जाप मुह बंद कर करना है और दाँतो को आपस मे मिला कर जिव्हा  को तालु से सटाकर जाप करना है यही आसान सिंहासन बत्तीसी है इसपे जाप कर।
अब उस स्वपन का उत्तर प्राप्त हो चुका था इसके बाद इस विषय मे मैंने बहुत शोध किया और जो कुछ पाया उसके कुछ अंशो को आपकी सेवा में प्रस्तुत किया है।

इस पोस्ट को लिखकर किसी भक्त की भावना एवं विश्वास आहत हुआ हो तो कृपया क्षमा करें।

।।कथा।।
यह सिंहासन राजा भोज को विचित्र परिस्थिति में प्राप्त होता है। एक दिन राजा भोज को मालूम होता है कि एक साधारण-सा चरवाहा अपनी न्यायप्रियता के लिए विख्यात है, जबकि वह बिल्कुल अनपढ़ है तथा पुश्तैनी रुप से उनके ही राज्य के कुम्हारों की गायें, भैंसे तथा बकरियाँ चराता है। जब राजा भोज ने तहक़ीक़ात कराई तो पता चला कि वह चरवाहा सारे फ़ैसले एक टीले पर चढ़कर करता है। राजा भोज की जिज्ञासा बढ़ी और उन्होंने खुद भेष बदलकर उस चरवाहे को एक जटिल मामले में फैसला करते देखा। उसके फैसले और आत्मविश्वास से भोज इतना अधिक प्रभावित हुए कि उन्होंने उससे उसकी इस अद्वितीय क्षमता के बारे में जानना चाहा। जब चरवाहे ने जिसका नाम चन्द्रभान था बताया कि उसमें यह शक्ति टीले पर बैठने के बाद स्वत: चली आती है, भोज ने सोचविचार कर टीले को खुदवाकर देखने का फैसला किया। जब खुदाई सम्पन्न हुई तो एक राजसिंहासन मिट्टी में दबा दिखा। यह सिंहासन कारीगरी का अभूतपूर्व रुप प्रस्तुत करता था। इसमें बत्तीस पुतलियाँ लगी थीं तथा कीमती रत्न जड़े हुए थे। जब धूल-मिट्टी की सफ़ाई हुई तो सिंहासन की सुन्दरता देखते बनती थी। उसे उठाकर महल लाया गया तथा शुभ मुहूर्त में राजा का बैठना निश्चित किया गया। ज्योंहि राजा ने बैठने का प्रयास किया सारी पुतलियाँ राजा का उपहास करने लगीं। खिलखिलाने का कारण पूछने पर सारी पुतलियाँ एक-एक कर विक्रमादित्य की कहानी सुनाने लगीं तथा बोली कि इस सिंहासन जो कि राजा विक्रमादित्य का है, पर बैठने वाला उसकी तरह योग्य, पराक्रमी, दानवीर तथा विवेकशील होना चाहिए।

व्यक्तिगत अनुभूति एवं।विचार©₂₀₁₇
।। राहुलनाथ।।™
भिलाई,छत्तीसगढ़,भारत
पेज लिंक:-https://www.facebook.com/rahulnathosgybhilai/
0⃣9⃣1⃣9⃣8⃣2⃣7⃣3⃣7⃣4⃣0⃣7⃣4⃣
******************************************
🚩🚩🚩 JSMOSGYJS 🚩🚩🚩
इस लेख में वर्णित सभी नियम ,सूत्र एवं व्याख्याए,एवं तथ्य हमारी निजी अनुभूतियो के स्तर पर है अतः हमारी मौलिक संपत्ति है।विश्व में कही भी,किसी भी भाषा में ये इस रूप में उपलब्ध नहीं है।इसकी किसी भी प्रकार से चोरी,कॉप़ी-पेस्टिंग आदि में शोध का अतिलंघन समझ कार्यवाही की जायेगी।अतः आपसे निवेदन है पोस्ट पसंद आने से शेयर करे ना की पोस्ट की चोरी।

चेतावनी-हमारे हर लेख का उद्देश्य केवल प्रस्तुत विषय से संबंधित जानकारी प्रदान करना है लेख को पढ़कर कोई भी प्रयोग बिना मार्ग दर्शन के न करे । किसी गंभीर रोग अथवा उसके निदान की दशा में अपने योग्य विशेषज्ञ से अवश्य परामर्श ले। साधको को चेतावनी दी जाती है की वे बिना गुरु निर्देशन के साधनाए ना करे। अन्यथा प्राण हानि भी संभव है। यह केवल सुचना ही नहीं चेतावनी भी है।