सोमवार, 17 अक्तूबर 2016

सिद्ध बिल्ली


।।सिद्ध बिल्ली।।
बढ़ी हुई दाड़ी और मुछ भेष बदलने में सहायता करती है इससे इंसान का असली रूप दिखाई नहीं देता,बढ़ी हुई उम्र ,बढ़ी हुई सफ़ेद दाढ़ी ये साबित नहीं करती की तुम सिद्ध हो ।

गुरु पद जाने ना कोई 
जो जाने सो तलाश ख़त्म होई।
बैठा तू जाल बिछाकर 
फसे जो परिंदा कोई 
शिव सुमिरन कर ,ना करे तो 
दो जख में घर होई
बूढ़ी बिल्ली ना कुछ करे
राम राम कर 
भक्ति में पापड ढोई.....
कहत गुरु गोरख ,बाहर ना मिल्या कोई
भीतर मिले गुरु जब 
तू सच्चा चेला होई...

*****जयश्री महाकाल****
(व्यक्तिगत अनुभूति एवं विचार )
******राहुलनाथ********
भिलाई,छत्तीसगढ़+919827374074(whatsapp)
फेसबुक पेज:-https://www.facebook.com/rahulnathosgybhilai/
***********************************************
।। मेरी भक्ति गुरु की शक्ति।।
***********************************************
चेतावनी-हमारे लेखो में लिखे गए सभी नियम,सूत्र,तथ्य हमारी निजी अनुभूतियो के स्तर पर है। लेखो को पढने के बाद पाठक उसे माने ,इसके लिए वे बाध्य नहीं है।हमारे हर लेख का उद्देश्य केवल प्रस्तुत विषय से संबंधित जानकारी प्रदान करना है किसी गंभीर रोग अथवा उसके निदान की दशा में अपने योग्य विशेषज्ञ से अवश्य परामर्श ले।बिना लेखक की लिखितअनुमति के लेख के किसी भी अंश का कॉपी-पेस्ट ,या कही भी प्रकाषित करना वर्जित है।न्यायलय क्षेत्र दुर्ग छत्तीसगढ़
(©कॉपी राइट एक्ट 1957)

।।खोपड़ी और तंत्र।।एक भ्रम...?

।।खोपड़ी और तंत्र।।एक भ्रम...?
एक बात आप समझने का प्रयास करे
खोपड़ी की साधना मतलब सहस्त्रार की साधना होती है इसमें किसी इंसान की खोपड़ी की आवश्यकता नहीं होती।खोपड़ी में सहस्त्रार,सहस्त्रार में गुरु स्थान और गुरु में परमात्मा का वास होता है ,इस खोपड़ी को सिद्ध करना मतलब अपनी खोपड़ी मतलब अपना दिमाग अपने अहंकार को गुरु चरण में समर्पित करना मात्र है।
इंसान की खोपड़ी का सामान्यतः प्रयोग साधक डराने मात्र के लिए ही है।क्योकि डर से मूलाधार सक्रीय होता है और सक्रीय मूलाधार,भयभीत मूलाधार सामने वाले व्यक्ति की बातो को जल्दी स्वीकार कर ,उसके नियंत्रण में हो जाता है।हड्डी नुमा खोपड़ी में इतनी शक्ति होती तो वैज्ञानिक शोध संस्थानों में लाखो साल पुरानी ख़ोपड़िया रखी हुई है वे उसपे शोध क्यों करते,सीधा खोपड़ी के मालिक को बुला कर पूछ नहीं लेते,की भाई तू कब मरा?तेरा नाम क्या है?
*****जयश्री महाकाल****
(व्यक्तिगत अनुभूति एवं विचार )
******राहुलनाथ********
भिलाई,छत्तीसगढ़+919827374074(whatsapp)
फेसबुक पेज:-https://www.facebook.com/rahulnathosgybhilai/
***********************************************
                   ।। मेरी भक्ति गुरु की शक्ति।।
***********************************************
चेतावनी-हमारे लेखो में लिखे गए सभी नियम,सूत्र,तथ्य हमारी निजी अनुभूतियो के स्तर पर है। लेखो को पढने के बाद पाठक उसे माने ,इसके लिए वे बाध्य नहीं है।हमारे हर लेख का उद्देश्य केवल प्रस्तुत विषय से संबंधित जानकारी प्रदान करना है किसी गंभीर रोग अथवा उसके निदान की दशा में अपने योग्य विशेषज्ञ से अवश्य परामर्श ले।बिना लेखक की लिखितअनुमति के लेख के किसी भी अंश का कॉपी-पेस्ट ,या कही भी प्रकाषित करना वर्जित है।न्यायलय क्षेत्र दुर्ग छत्तीसगढ़
(©कॉपी राइट एक्ट 1957)

त्रिया राज...स्त्रियों का संसार


त्रिया राज...स्त्रियों का संसार
क्या लगता है मित्रो त्रिया राज क्या है?
सूना है सिद्धों से साधू संतो से की
गुरु मचिंद्रनाथ जी भी इस त्रिया राज में फस गए थे?
कुछ कहते है त्रिया राज आसाम के आसपास है।
ये तो आसाम के चरित्र पे अत्याचार है।
मुझे लगता है की इस धरती पे ऐसा कौन सा स्थान है
जहा त्रिया राज नहीं है।हर पुरुष के भीतर त्रिया राज पैदा हो जाता है।फिर वो पुरुष भारत में हो या किसी राज्य में या फिर किसी किसी अन्य देश में ।
त्रिया राज मतलब स्त्रियों का राज ।
ये हर गली में ,हर नुक्कड़ में ,हर मोहल्ले में उपलब्ध होता है ।
इतिहास गवाह है ,शास्त्र गवाह है हर युद्ध त्रिया राज के कारण ही हुआ है।त्रिया राज की रानी मतलब एक ऐसी कामुक स्त्री जिसको काम के अलावा कुछ पसंद ही ना हो।
हमेशा कामातुर जिसके लिए पुरुष मात्र एक जिव है कुत्ते एवं गधे के सामान,जो उसे भोगे ।किन्तु हकीकत ये है की पुरुष कभी भोग ही नहीं पाता बल्कि भुगतता ही रहता है।
ये एक ऐसा गुण है जो 60%स्त्रियों में मिलता है ये बात अलग है की वो इसे माने या ना माने।कोई खुल के करता है कोई बंध के करता है।

एक शिष्य था जिसने कभी कभी स्त्री को नहीं देखा था
जिस दिन उसने पहली बार स्त्री को देखा तो सोचा ,
पूछा अपने गुरु से गुरूजी ये कौन है?
ये मेरे जैसी नहीं है ।
मेरा सीना तो सपाट किन्तु इसका गोल क्यों है?
गुरूजी ने कहा
ये स्त्री है दूर ही रहना क्योकि तू पुरुष है
और स्त्री के समतुल्य नहीं है।
इसका सीना गोल है क्योकि इसका कोई छोर नहीं है
ये कब किस और डोलेगी इसका पता तो उसको खुद को भी नहीं है।इस गोल सीने के पीछे गोल समुन्दर भी है बस याद रख जब ,ये जननी बने तो ब्रहम्मा विष्णु भी नत मस्तक है
और जब ये काल बने तो साक्षात यम का स्वरूप है।
गोल है धरती गोल है चन्द्रमा ,
गोल का ही खेल है।
जो इस गोल टकराये
वो माटी के मोल मिल जाए।

ठीक है गुरूजी चेले ने कहा
समय बदला ,माह बदला महीना भी बदला
गुरु ने देखा एक रूपवती स्त्री को।
जाग गई काली
उत्तपन हो गई काम काली,बिखर गया संन्यास।
भटक गया गुरु ,चेतन करने में शिष्य को।
फिर एक समय आया
चेले ने पूछा गुरु कहा है अपने
गुरु भाइयो से ?
चेले ने कहा भाई वो तो एक संतान के पिता है
भविष्य की तैयारी है।
जागा चेला
लगाईं अलख ,
पहुचा गुरु के पास कहा
गुरूजी अब क्या?
गुरु ने कहा बच्चे ,माया है ,माया से बचा ना कोई
सोचा कुछ ऐसा करू की
फिर करने की हिम्मत करे ना कोई
किया पैदा मछली को
कहा
तू अब तो पुरुष बन जा
कर पैदा सिद्ध को ,साधू को
कुछ ऐसा भेष बना
चेले ने कहा गुरु से
गुरु! क्यों ना अब तू जनक बन जा
भेद मिटा ,स्त्री पुरुष का
अब तो तू एक बार बाप बन जा।
जागा गुरु लगाईं अलख
हे प्रभु जिसे समझा था राई
वो निकली माई
जागी बुद्धि अब स्त्री की
छोड़ा पुरुष का रास
बन गई वो माया
शिव शंकर की दास

अलख निरंजन जय शिव गोरक्ष
पढ़ु तो सिद्ध होवे सब काम
कहत राहुलनाथ गुरु
आपकी चरण मोर धाम
भटक ना सकु प्रभु अब
हर लो मोर हर धाम

।।जय शिव गोरक्ष।।

*****जयश्री महाकाल****
(व्यक्तिगत अनुभूति एवं विचार )
******राहुलनाथ********
भिलाई,छत्तीसगढ़+919827374074(whatsapp)
फेसबुक पेज:-https://www.facebook.com/rahulnathosgybhilai/
***********************************************
।। मेरी भक्ति गुरु की शक्ति।।
***********************************************
चेतावनी-हमारे लेखो में लिखे गए सभी नियम,सूत्र,तथ्य हमारी निजी अनुभूतियो के स्तर पर है। लेखो को पढने के बाद पाठक उसे माने ,इसके लिए वे बाध्य नहीं है।हमारे हर लेख का उद्देश्य केवल प्रस्तुत विषय से संबंधित जानकारी प्रदान करना है किसी गंभीर रोग अथवा उसके निदान की दशा में अपने योग्य विशेषज्ञ से अवश्य परामर्श ले।बिना लेखक की लिखितअनुमति के लेख के किसी भी अंश का कॉपी-पेस्ट ,या कही भी प्रकाषित करना वर्जित है।न्यायलय क्षेत्र दुर्ग छत्तीसगढ़
(©कॉपी राइट एक्ट 1957)

निर्वाण...एक अकेली यात्रा

निर्वाण...एक अकेली यात्रा
"जो भावनाओ एवं विचारो का एकत्रीकरण करेगे वो नर्क जैसे दुःखों को भोगेंगे एवं जो भावनाओ एवं विचारो को आत्मसाध कर एकाँकी जिएंगे वो परमात्मा की शरण में सवर्ग को भोगेंगे"

यह दुनिया भावनाओ एवं विचारो का संग्रह मात्र है हर एक विचार अपने जैसे विचारो को आकर्षित एवं एकत्रित करता रहता है ।और जो विचार आकर्षित या एकत्रित नहीं होता वो भी एक विचार ही होता है किन्तु वो पहले विचार से भिन्न होता है वो भी अपने जैसे विचार एवं भावना के अनुसार दूसरे समूह को एकत्रित करता रहता है।इसी प्रकार के वैचारिक मतभेदों के अलग-अलग समूहों का नाम धर्म कहलाता है।इन सबमे वैचारिक व् भावनात्मक समानता नहीं होना सामान्य सी बात है।इन भावनाओ एवं विचारो का वर्गीकरण बहुत पहले ही कर दिया गया है जैसे :-हिन्दू धर्म,मुस्लिम धर्म,सिख ,ईसाई,जैन,फ़ारसी इत्यादि।इन धर्मो के भीतर भी वैचारिक एवं भावनात्मक वर्गीकरण किया गया है जैसे:-ब्राह्मण,क्षत्रिय,शुद्र वैश्य इत्यादि।आज भी नए विचार एवं भावनाओ की खोज अपने चर्म स्तर पर है और इन नई भावनाओ एवं विचारो के मिलने मात्र से पंथ,सम्प्रदाय,दल,धार्मिक सेना ,समुदाय,मिशनों एवं समितियों का निर्माण होते ही जा रहा है।आशय यह है की लगातार मानव को परमात्मा से जोड़ने का कार्य न करके उनको तोड़ने का प्रयास लगातार किया जा रहा है।ये अध्यात्म नहीं है,ईश्वर परमात्मा का मार्ग नहीं है।ईश्वर का मार्ग एकीकरण का मार्ग है समानता का मार्ग है एक रूप में परिवर्तित हो जाने का मार्ग है।परमारमा या परमात्मा के विचारो से भटक जाना ही आत्मा का अस्तित्व है और आत्मा के भटकने का मूल कारण आत्मा में जन्मा अहंकार मात्र है।अहंकार के टूटते ही आत्मा में परमात्मा का समावेश होने लगता है इस प्रकार लगातार टूट कर कई स्तरों को पार करता हुआ आत्मा स्वयं परमात्मा में विलीन हो जाता है।
जिस प्रकार आत्मा पहले शिशु,बाल्य,युवा एवं प्रौढावस्था को प्राप्त करता हुआ मृत्यु को प्राप्त करता हुआ पुनः शरीर धारण कर जन्म लेता है ठीक इसीके विपरीत क्रम मृत्यु,प्रौढावस्था,युवा,बाल्य एवं शिशु अवस्था की ओर बढते हुए परमात्मा में विलीन भी हो सकता है।
इन दोनों मार्गो में से मानव को किस मार्ग की और चलना है इसका निर्णय बुद्धि द्वारा होता है किन्तु मन हमेशा बुद्धि पे भारी ही पड़ता है।मन में लगा आघात बुद्धि को बदल देता है बुद्धि के बदलते ही आत्मा इन दोनों में से एक मार्ग की ओर प्रशस्त होता है।बुद्धि पे आघात लगने से मेरा आशय है की जैसे बुद्ध प्रारंभ में बुद्ध नहीं थे मृत्यु को देखने से आघात हुआ और बुद्धत्व प्राप्त हुआ ,सम्राट अशोक के हृदय का आघात उसे बदलने को विवश किया इस आघात ने अँगुलीमाल जैसे डाकु में परमतत्व को पैदा कर दिया।
बुद्ध एवं बुद्ध जैसे अन्य महान आत्माओ ने एकाँकी में परमात्मा को पाया।आज इन माहान आत्माओ(सभी धर्म की)को जानने वाले इनके अनुयायी अपने विचार एवं भावनाओ का एकत्रीकरण कर पंथ,सम्प्रदाय,दल,धार्मिक सेना ,समुदाय,मिशनों एवं समितियों का निर्माण कर एकांत से दूर ले जा कर उन महान गुरुओ एवं महान आत्माओ के विचारो को अपने कुविचारों से संक्रमित कर रहे  है।एकत्रीकरण तो युद्ध के लिए किया जाता है मोक्ष एवं आध्यात्मिक मार्ग तो एकाँकी ही होता है।बुद्ध में बुद्धत्व ,महावीर में ज्ञान एवं महान आध्यात्मिक संतो में यदि ये तत्व पैदा हुआ होगा तो उस तत्व ने एकत्रिकरण का मार्ग तो नहीं दिखाया होगा क्योकि एकत्रीकरण ,परमात्मा से बहुत दूर करता है।और बोधित्व एकांत में जन्म लेता है।
*****जयश्री महाकाल****
(व्यक्तिगत अनुभूति एवं विचार )
******राहुलनाथ********
भिलाई,छत्तीसगढ़+919827374074(whatsapp)
फेसबुक पेज:-https://m.facebook.com/rahulnathosgybhilai/
***********************************************
                   ।। मेरी भक्ति गुरु की शक्ति।।
***********************************************
चेतावनी-हमारे लेखो में लिखे गए सभी नियम,सूत्र,तथ्य हमारी निजी अनुभूतियो के स्तर पर है। लेखो को पढने के बाद पाठक उसे माने ,इसके लिए वे बाध्य नहीं है।हमारे हर लेख का उद्देश्य केवल प्रस्तुत विषय से संबंधित जानकारी प्रदान करना है किसी गंभीर रोग अथवा उसके निदान की दशा में अपने योग्य विशेषज्ञ से अवश्य परामर्श ले।बिना लेखक की लिखितअनुमति के लेख के किसी भी अंश का कॉपी-पेस्ट ,या कही भी प्रकाषित करना वर्जित है।न्यायलय क्षेत्र दुर्ग छत्तीसगढ़
(©कॉपी राइट एक्ट 1957)

शनिवार, 1 अक्तूबर 2016

डाकिनी विद्या

डारालाकाशाहा मंत्रविद्या की जननी देवियाँ ।।
""""डाकिनी विद्या""""
*********************************
०१..अ→आ→इ→ई→उ→ऊ→ऋ→ऋॄ→लृ→लॄ→ए→ऐ→ओ→औ→अं→अ:→डाकिनी बीज मंत्र(16अक्षर)
**************************************************
०२..क→ख→ ग→ घ→ङ→च→छ→ज→ झ→ञ→....राकिनी बीज मंत्र(10 अक्षर)
**************************************************
०३..ट→ठ→ड→ढ→ण→त→थ→द→ध→न....लाकिनी बीज मंत्र(10 अक्षर)
**************************************************
०४..प→फ→ब→भ→म→य→र→ल....काकिनी बीज मंत्र(8 अक्षर)
**************************************************
०५..व→श→ष→स....शाकिनी बीज मंत्र(4 अक्षर)
**************************************************
०६..ह→ल→क्ष....हांकिनी बीज मंत्र(3 अक्षर)
**************************************************
०७.अ→आ→ इ→ई→उ→ऊ→ऋ→ऋॄ → लृ→लॄ →ए→ऐ→ ओ→औ→अं→ अ:....(सत्व स्वरूपिनी देवी 16 अक्षर)
**************************************************
०८..क→ख→ग→घ→ङ→च→छ→ज→झ→ञ→ट→ठ→ड→ढ→ण→त→थ...(रजः स्वरूपिणी देवी 17 अक्षर)
**************************************************
०९..द→ध→न→प→फ→ब→भ→म→य→र→ल→व→श→ष→स→ह→ल→क्ष...(तम् स्वरूपिणी देवी 18अक्षर)
**************************************************
१०..अ→आ→ इ→ई→उ→ऊ→ऋ→ऋॄ → लृ→लॄ →ए→ऐ→ ओ→औ→अं→ अ:
क→ख→ग→घ→ङ→च→छ→ज→झ→ञ→ ट→ठ→ड→ढ→ण→त→थ→द→ध→न→प→फ→ब→भ→म→य→र→ल→व→श→ष→स→ह→क्ष...(मातृका मंत्र 50 अक्षर)

डाकिनी,राकिनी,लाकिनी,काकिनी,शाकिनी एवं हाकिनी ये सतोगुणी देवीशक्तिया है ये समस्त देवियां एवं गुरु को मिलाकर मुख्य 51 ही मूर्तियाँ होती है।जिसमे गुरु का बीज मंत्र "गुरु"सबद ही है।इसमें डाकिनी अणिमा सिद्धि,राकिनी लघिमा सिद्धि,लाकिनी कामय सिद्धि,कालिनी प्राप्ति सिद्धि एवं शाकिनी महिमा सिद्धि प्रदान करने वाली है।हाकिनी से काम्यकर्म एवं।वशीकरण जैसी सिद्धि प्राप्त होती है।इसके अतिरिक्त मातृकां बिज मंत्र का अनुलोम-विलोम रूप से 250000 जाप करने से सभी प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त होती है।ये तीनो देवियो से धर्म,अर्थ,काम एवं मोक्ष की प्राप्ति होती है वही गुरु बीज मंत्र से ब्रह्मांडीय ज्ञान की प्राप्ति होती है।
इन छः देवीके क्रमशः 6 अधिदेवता होते है यदि आप किसी भी अक्षर को अकेला पढ़ते है तो उस अक्षर के फल को ते डाकिनिया हरण कर लेती है इसीकारण आपने देखा होगा की मंत्रो को एकानकी नहीं जपा जाता है इन्हें जपने के लिए बिंदु या मात्राओ का उपयोग किया जाता है जैसे अं ऐं ह्रीं इत्यादि।
इन देवियो के अपने अपने ध्यान मंत्र भी है जिसमे ये बताया जाता है की ये  देवियाँ दिखती कैसी है एवं इन्होंने कौन से शास्त्र धारण कर रखे है,ये कौन से आसान में विराजमान है।जिनका उल्लेख भविष्य की पोस्ट में अवश्य किया जाएगा।क्योकि 6 देवियो के मुख्य ध्यान एवं 50 अक्षरो के 50 ध्यान लिखना कोई सामान्य विषय नहीं है ।
इनमे ध्यान रखने की बात ये है की सभी देवियो के अक्षरो से उनके मूल मंत्र का निर्माण किया जाता है।जैसे अं डाकण्यै नमः,कं राकण्यै नमः इत्यादि।
इन मंत्रो को विस्तृत रूप से समझाने के लिए ,यहाँ मुझे लिखते लिखते कई वर्ष लग जायेगे किन्तु फिर भी मैं इस विद्या को पूर्ण रूप से नहीं लिख पाउगा।अतः अपनी बुद्धि का प्रयोग कर समझने का प्रयास करे।आपको समझाने के लिए एक शब्द का यहाँ मैं चयन कर रहा हु आशा है की आपको मैं समझा पाउँगा।
एक शब्द लेते है जैसे "महाकाल"
इस महाकाल सबद का विश्लेषण करने का प्रयास करेगे।
म +ह +आ +क +आ +ल
इसमें
म(काकिनी)
ह(हाकिनी)
आ(डाकिनी)
क(राकिनी)
आ(डाकिनी)
ल(लाकीनी)
इस प्रकार आपने देखा एक नाम को लिखने में अलग-अलग देवियो तक ऊर्जा का आवागमन होने से एक शब्द का निर्माण होता है इस महाकाल सबद में मुख्य रूप से चार दैविक शक्ति द्वारा ऊर्जाओं का निर्माण होता है इसी प्रकार हर मंत्र में शक्ति का क्रम एवम् चक्र की जानकारी रखना आवश्यक होती है जिससे की आपके समक्ष यदि कोई गलत प्रिंट हुआ मंत्र भी आ जाए तो आप उसका समाधान कर पाये।
ऊपर लिए गए एकाँकी शब्द मात्र संगीत के एक वाद्य के प्रत्येक बिट के समान  है जैसे प्यानो एवं हारमोनियम में होते है जब तक इनको एक सही क्रम में ना जोड़ा जाए तब तक मधुर स्वर ध्वनि का निर्माण नहीं होता उसी प्रकार इन मंत्र अक्षरो को भी एक सही क्रम में रखकर साधना करना ही सिद्धि का मुख्य द्वार है।ऊपर दिए गए डाकिनियो के मूल मंत्र जो 10,12 और 14 अक्षरी होते है उनके आगे गुरु बिज मंत्र (गुरु)या गुरु मुख दिए गुरु मंत्र (ॐ शिवगोरक्ष योगी)का सम्पुटित जाप करने से ये सबद ब्रह्मांड(मस्तिष्क)में कम्पन कर सिद्धि प्रदान करते है।
संसार के सारे देवी देवता फिर वो कितनी भी संख्या में हो या किसी भी धर्म के हो ,उनकी नाम साधना इस विधि से की जा सकती है।इसे ही आप ब्रह्म विद्या भी कह सकते है सभी देवी देवता,दशमहाविद्या,महादेव,महाकाल,विष्णु इत्यादि सभी की जननी यही विद्या है।
इन डाकिनियो की पूजा घोररात्रि ,महारात्रि ,ग्रहणकाल या मात्र रात्रि में सुन्दर सुगंध के बिच करनी चाहिए।जो भगत है और साधक है उनके पास चयन के लिए दो विषय है या तो वो प्रत्येक देवता को सिद्ध करे जिनकी संख्या पौत्राणिक ग्रंथो में 33 कोटि बताई गई है जिनको सिद्ध करना मुमकिन नहीं लगता या फिर इस मंत्र विद्या के 50 अक्षरो को सिद्ध करना चाहिए जिससे स्वयं मंत्र बनाने की शक्ति प्राप्त हो जाती है।तंत्र जगत में डाकिनियो के रूप को बहुत डरावना एवं रहस्य मई दिखाया जाता है।किन्तु ऐसा कुछ नहीं ये वे देवियाँ है जो आपके संदेशो को एकत्रित कर या बना कर अपने गंतव्य तक पहुचाने में सक्षम।होती है जिसे "डाक" सन्देश ले जाना कहा जाता है इसी कारण इनका मुख्य नाम डाकीनी रखा गया है जो आपके संदेशो को अपने गंतव्य तक पहुचाने का कार्य करती है।ऊपर दी गई अक्षरो की संख्या भगवान शिव द्वारा बताई गई है।किन्तु इसका विश्लेषण करने का प्रयास हमने अपनी लघु बुद्धि द्वारा ही किया है।
इन देवियो से सम्बंधित अन्य जानकारियो को भविष्य में इस पोस्ट में जोड़ा जाएगा
(व्यक्तिगत अनुभूति एवं विचार)

||मेरी भक्ति गुरु की शक्ति,फुरो मंत्र ईश्वरो वाँचा||
******राहुलनाथ********
      भिलाई,छत्तीसगढ़+917489716795,+919827374074(whatsapp)
******************************************
चेतावनी-हमारे हर लेख का उद्देश्य केवल प्रस्तुत विषय से संबंधित जानकारी प्रदान करना है लेख को पढ़कर कोई भी प्रयोग बिना मार्ग दर्शन के न करे ।क्योकि हमारा उद्देश्य केवल विषय से परिचित कराना है। किसी गंभीर रोग अथवा उसके निदान की दशा में अपने योग्य विशेषज्ञ से अवश्य परामर्श ले। साधको को चेतावनी दी जाती है की वे बिना किसी गुरु के निर्देशन के साधनाए ना करे। अन्यथा प्राण हानि भी संभव है। यह केवल सुचना ही नहीं चेतावनी भी है।साधना एवं पूजा विधि जानने के लिए आप हमसे ऊपर दिए गए नंबर पर संपर्क करे।न्यायलय क्षेत्र दुर्ग छत्तीसगढ़
(©कॉपी राइट एक्ट 1957)

कुण्डलिनी शक्ति एवं बीज मंत्र की चाल


।।कुण्डलिनी शक्ति एवं बीज मंत्र की चाल ।।
अवश्य पढ़े आशा करता हु की ये लेख "कुण्डलिनी साधको" का मार्ग प्रशस्त करने में सक्षम होगा...

साधना तंत्र से ,मंत्र से और यन्त्र से की जाती है किन्तु याद रखने वाली बात ये है की पहले मंत्र (मन का विचार),तंत्र (तन का विचार)और यन्त्र का मतलब मन एवम् तन को जोडने का विचार,यहाँ यन्त्र आपका शरीर होता है।
आप कुछ भी विचार करे ,सोचे या दोहराये सब मंत्र है किन्तु सही मायने में इसे प्रार्थना कहना उचित होगा।।।
पिछले कुछ दिनों से मैंने पाया की भगत बीज मंत्रो का लगातार जाप कर रहे है जो की भक्तो के लिए घातक साबित हो सकता है ,बीज मंत्र एक प्रकार की विशेष ऊर्जा को निर्माण करते है जो की प्रार्थानो को सही दिशा में भेजने के लिए चालाक का कार्य करते है।जैसे ह्रीं बीज इस बीज मंत्र को जपने से "ह" विशुद्ध,"र"मणिपुर "ई"शक्ति बिज विशुद्ध चक्र का चौथा अक्षर एवं "अं" विशुद्ध चक्र का प्रथम अक्षर ।मतलब ये बिज विशुद्ध से प्रारम्भ होता हुआ निचे मणिपुर में पहुचकर रफ़्तार से विशुद्ध के "ई" अक्षर तक पहुच कर ,अपनी पूर्ण गति से विशुद्ध के प्रथम अक्षर अं से होता हुआ ब्रह्मांड में पहुच जाता है।इस बिज के साथ पीछे जो भी अक्षर या प्रार्थना लगी हो वो भी पीछे-पीछे उसी प्रकार चलते है जैसे रेल इंगजन के पीछे डिब्बे।अब इसी "ह्रीं" मंत्र में यदि अंतिम सबद के बदले आपने "अँग" सबद लगा दिया तो यह मंत्र "ह्रींग" हो जाएगा और स्मरण रहे की परिणाम बिलकुल विपरीत होंगे।क्योकि "अँग" सबद अनहद चक्र का है इसका मतलब यह हुआ की ये मंत्र अब अंतिम में अनहद से हो कर ब्रह्मांड में पहुचेगा।ऊपर जो "ह" विशुद्ध ,"र"मणिपुर सबद लिखे गए है वे विशुद्ध एवं मणिपुर के मूल बीज मंत्र है जो की इन चक्रों के मूल बीजाक्षर है जो इन चक्रों के मध्य में रहते है एवं बाकी सब्द इन चक्रों के बाहर होते है।जैसे अनहद चक्र के बिच में शक्ति "य"एवं चारो तरफ क से लेकर ठ तक के अक्षर होते है।
यहाँ स्मरण रखने की बात है की जब भी सबद ऊपर की ओर के चक्रों के होंगे तब ऊर्जा ऊपरी ब्रह्माण्ड की और जायेगी और जब सबद निचे के होंगे तो ऊर्जा निचे के ब्रह्मांड(पाताल) में जायेगे,इसी प्रकार मध्य ब्रह्मांड भी है।
जिस प्रकार आपको "ह्रीं" की चाल समझाई गई है इसी प्रकार अन्य बिज काम करते है जैसे क्लीं,ह्लीं,स्रीं इत्यादि।
इन मंत्रो की चाल को कागज़ में चित्र के माध्यम से समझने से ये कुछ उसी प्रकार दिखेगे जैसे ई सी जी मशीन से ग्राफिक निकलता है

इन बीज मंत्रो का जाप मात्र आवश्यकता पड़ने से ही और सही मार्ग दर्शन में करना ही उचित होता है,मैंने पाया की किसी भी बीज मंत्र का जाप दिन भर में 54 बार से ज्यादा करने से लाभ की जगह हानि होने लगति है... यह पोस्ट मात्र मंत्र साधना को ध्यान में रख कर लिखी गई है इस विधि के अलावा श्वासों की गिनती के द्वारा ऊर्जा को ऊपर निचे पहुचाना एक अलग विषय है जो योग के अंतर्गत आता है जहा श्वासों को हर अक्षर पर स्थिर किया जाता है ।
किन्तु आज कल बीज मंत्र को देना एक फैशन सा बन गया है बीज मंत्र न्यूक्लियर बम से भी ज्यादा खतरनाक है जो भी पूर्ण जानकारी के बिना इनका जाप करेगा उसके बुद्धि का स्तंभन हो जाता है या फिर जो मंत्र देने वाला होता है उसके प्रति आकर्षण होने लगता है कुल मिलाकर जो जाप कर रहा है उसे लाभ नहीं होता....
इन मंत्रो की प्रतिक्रिया होने से मन में बहुत से नकारात्मक भाव पैदा होते है जैसे:-
मै कौन हूँ?
जीवन में सब धोखा है?
मौत ही सत्य है??
सब व्यर्थ है?
क्या लाया है और क्या ले जाना है?
धन एक धोखा है..
सुख एक छलावा है...
आज बीज मंत्र की दीक्षा देने का फैशन चल रहा है,जैसे बीज मंत्र दीक्षा,शाम्भवी दीक्षा,त्रिकाल दीक्षा
महादेव के दिए गए इस ज्ञान को बेचने वाले ये सब कौन होते है...
ट्रिंग ट्रिंग की ध्वनि पे ध्यान दीजिये ,सायकिल की घंटी में अक्सर ये ध्वनि निकलती है और आपके कानो के पास बार बार इस ध्वनि का यदि उपयोग किया जाए तो आपको कैसा लगेगा ,अनुभूत कीजिये ..
बस ऐसी ही अवस्था ह्रींग, क्लींग.......... 
इत्यादि बीज मंत्रो के अधिक उपयोग करने से आपके भीतर होगी और वहा कोई आपको समझाने वाला भी ना होगा।
क्योकि जाप करने वाला हमेशा एकाँकी ही होता है?
बहुत से गृहस्त के जीवन से दामपत्य सुख छीन गया है,
मन में वैराग्य का प्रारम्भ हो गया है,
क्या इससे ईश्वर को पाया जा सकता है???
इस विधि को पूर्ण रूप से लिख के नहीं समझाया जा सकता है और ना ही इसको शब्दों के माध्यम से समझाया जा सकता है इनको गुरु जो इस विषय को जानते है वे आपको इशारो से,लिख के,बोला के एवं चित्र के माध्यम से ही समझा सकते है।सिर्फ पढने से इसे पूर्ण रूप से नहीं समझा जा सकता है।
आशा करता हु की ये लेख कुण्डलिनी साधको का मार्ग प्रशस्त करने में सक्षम होगा।

*****जयश्री महाकाल****
(व्यक्तिगत अनुभूति एवं विचार )
******राहुलनाथ********
भिलाई,छत्तीसगढ़+919827374074(whatsapp)
फेसबुक परिचय:-
https://m.facebook.com/kawleyrahulnathosgy/

*****************************************************
बीज मन्त्र और शरीर पर प्रभाव .....

मन्त्र के शुद्ध उच्चारण में सस्वर पाठ भेद के उदात्त तथा अनुदात्त अंतर को स्पष्ट किये बिना शुद्ध जाप असंभव है और इस अशुद्धि के कारण ही मंत्र का सुप्रभाव नहीं मिल पाता |इसलिए सर्व प्रथम किसी बौद्धिक व्यक्ति से अपने अनुकूल मन्त्र को समझ-परख कर उसका विशुद्ध उच्चारण अवश्य जान लें |
अपने अनुकूल चुना गया बीज मंत्र जप अपनी सुविधा और समयानुसार चलते फिरते ,उठाते बैठते अर्थात किसी भी अवस्था में किया जा सकता है |इसका उद्देश्य केवल शुद्ध उच्चारण ,एक निश्चित ताल और लय से नाड़ियों में स्पंदन करके स्फोट उत्पन्न करना है |
कां -पेट सम्बन्धी कोई भी विकार और विशेष रूप से आँतों की सूजन में लाभकारी |
गुं- मलाशय और मूत्र सम्बन्धी रोगों में उपयोगी |
शं - वाणी दोष ,स्वप्न दोष ,महिलाओं में गर्भाशय सम्बन्धी विकार और हार्निया आदि रोगों में उपयोगी |
घं - काम वासना को नियंत्रित करने वाला और मारण-मोहन और उच्चाटन आदि के दुष्प्रभाव के कारण जनित रोग विकार को शांत करने में सहायक |
ढं - मानसिक शांति देने में सहायक |आभिचारिक कृत्यों जैसे मारण-मोहन-स्तम्भन आदि प्रयोगों से उत्पन्न हुए विकारों में उपयोगी |
पं - फेफड़ों के रोग जैसे टी वी ,अस्थमा ,श्वास रोग आदि के लिए गुणकारी |
बं - शुगर ,वामन ,कफ विकार ,जोड़ों के दर्द आदि में सहायक |
यं - बच्चों के चंचल मन को एकाग्र करने में अंत्यंत सहायक |
रं - उदर विकार ,शरीर में पित्त जनित रोग ,ज्वर आदि में उपयोगी |
लं - महिलाओं के अनियमित मासिक धर्म ,उनके अनेक गुप्त रोग तथा विशेष रूप से आलस्य को दूर करने में उपयोगी |
मं - महिलाओं में स्तन सम्बन्धी विकारों में सहायक |
धं - तनाव से मुक्ति के लिए ,मानसिक संत्रास दूर करने में उपयोगी |
ऐं - वात नाशक ,रक्त चाप ,रक्त में कोलेस्ट्रोल ,मूर्छा आदि असाध्य रोगों में सहायक |
द्वां - कान के समस्त रोगों में सहायक |
ह्रीं - कफ विकार जनित रोगों में सहायक |
ऐं - पित्त जनित रोगों में उपयोगी |
वं - वात जनित रोगों में उपयोगी |
शुं - आँतों के विकार तथा पेट सम्बन्धी अनेक रोगों में सहायक |
हुं - यह बीज एक प्रबल एंटीबायोटिक सिद्ध होता है |गाल ब्लैडर ,अपच ,लिकोरिया आदि रोगों में उपयोगी |
अं - पथरी ,बच्चों के कमजोर मसाने ,पेट की जलन ,मानसिक शान्ति आदि में सहायक इस बीज का सतत जाप करने से शरीर में शक्ति का संचार उत्पन्न होता है |संकलित ग्रंथो से
***********************************************
।। मेरी भक्ति गुरु की शक्ति।।
***********************************************
चेतावनी-हमारे लेखो में लिखे गए सभी नियम,सूत्र,तथ्य हमारी निजी अनुभूतियो के स्तर पर है। लेखो को पढने के बाद पाठक उसे माने ,इसके लिए वे बाध्य नहीं है।हमारे हर लेख का उद्देश्य केवल प्रस्तुत विषय से संबंधित जानकारी प्रदान करना है किसी गंभीर रोग अथवा उसके निदान की दशा में अपने योग्य विशेषज्ञ से अवश्य परामर्श ले।बिना लेखक की लिखितअनुमति के लेख के किसी भी अंश का कॉपी-पेस्ट ,या कही भी प्रकाषित करना वर्जित है।न्यायलय क्षेत्र दुर्ग छत्तीसगढ़
(©कॉपी राइट एक्ट 1957)