बुधवार, 23 अगस्त 2017

जानिए क्या आपकी जन्म कुंडली मे प्रेम विवाह का योग है

जानिए क्या आपकी जन्म कुंडली मे प्रेम विवाह का योग है
*********************************************** ज्योतिषशास्त्र में सभी विषयों के लिए निश्चित भाव निर्धारित किया गया है लग्न, पंचम, सप्तम, नवम,  एकादश, तथा द्वादश भाव को प्रेम-विवाह का कारक भाव माना गया है यथा शुक्र ग्रह” को प्रेम तथा विवाह का कारक माना गया है। स्त्री की कुंडली में “ मंगल ग्रह “ प्रेम का कारक माना गया है।

लग्न भाव      —   जातक स्वयं।
पंचम भाव     —   प्रेम या प्यार का स्थान।
सप्तम भाव     —   विवाह का भाव।
नवम भाव     —   भाग्य स्थान।
एकादश भाव —    लाभ स्थान।
द्वादश भाव    —   शय्या सुख का स्थान।

प्रेम विवाह के ज्योतिषीय सिद्धांत या नियम
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पंचम और सप्तम भाव तथा भावेश के साथ सम्बन्ध। पंचम भावप्रेम का भाव है और सप्तम भाव विवाह का अतः जब पंचम भाव का सम्बन्ध सप्तम भाव भावेश से होता है तब प्रेमी-प्रेमिका वैवाहिक सूत्र में बंधते हैं।पंचमेश-सप्तमेश-नवमेश तथा लग्नेश का किसी भी प्रकार से परस्पर सम्बन्ध हो रहा हो तो जातक का प्रेम, विवाह में अवश्य ही परिणत होगा हाँ यदि अशुभ ग्रहो का भी सम्बन्ध बन रहा हो तोवैवाहिक समस्या आएगी।लग्नेश-पंचमेश-सप्तमेश-नवमेश तथा द्वादशेश का सम्बन्ध भी अवश्य ही प्रेमी प्रेमिका को वैवाहिक बंधन बाँधने में सफल होता है।प्रेम और विवाह के कारक ग्रह शुक्र या मंगल का पंचम तथा सप्तम भाव-भावेश के साथ सम्बन्ध होना भी विवाह कराने में सक्षम होता है।सभी भावो में नवम भाव की महत्वपूर्ण भूमिका होती है नवम भाव का परोक्ष या अपरोक्ष रूप से सम्बन्ध होने पर माता-पिता का आशीर्वाद मिलता है और यही कारण है की नवम भाव -भावेश का पंचम- सप्तम भाव भावेश से सम्बन्ध बनता है तो विवाह भागकर या गुप्त रूप से न होकर सामाजिक और पारिवारिक रीति-रिवाजो से होती है।शुक्र अगर लग्न स्थान में स्थित है और चन्द्र कुण्डली में शुक्र पंचम भाव में स्थित है तब भी प्रेम विवाह संभव होता है।नवमांश कुण्डली जन्म कुण्डली का सूक्ष्म शरीर माना जाता है अगर कुण्डली में प्रेम विवाह योग नहीं है या आंशिक है और नवमांश कुण्डली में पंचमेश, सप्तमेश और नवमेश की युति होती है तो प्रेम विवाह की संभावना प्रबल हो जाती है।पाप ग्रहो का सप्तम भाव-भावेश से युति हो तो प्रेम विवाह की सम्भावना बन जाती है।राहु और केतु का सम्बन्ध लग्न या सप्तम भाव-भावेश से हो तो प्रेम विवाह का सम्बन्ध बनता है।लग्नेश तथा सप्तमेश का परिवर्तन योग या केवल सप्तमेश का लग्न में होना या लग्नेश का सप्तम में होना भी प्रेम विवाह करा देता है।चन्द्रमा तथा शुक्र का लग्न या सप्तम में होना भी प्रेम विवाह की ओर संकेत करता है।
ज्योतिष ग्रंथानुसार संकलित

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सोमवार, 21 अगस्त 2017

बीज मंत्रो के उच्चारण का रहस्य

बीज मंत्रो के उच्चारण का रहस्य
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बहुत से साधक पूछते है कि बीज मंत्रो के जाप में मात्रा कौन सी लगाये जैसे "ह्रीं"इसे कैसे पढ़े।क्या इसका उच्चारण ह र ई म् (hrim)करे या ह र ई न ग(haring) करे इसे समझिये। यदि आप शिव को मानने वाले है तो लिंग को भी मानते होंगे ऐसे में लीन+अंग अर्थात अंग(ang) की मात्रा लगाने से लाभ हो सकता है और आप यदि देवी की साधना करते है तो अम(am) की मात्रा लगाए लाभ होगा।किन्तु ये विषय बहुत ही जटिल है इसी लिए एक पोस्ट के माध्यम से पूर्ण जानकारी नही दी जा सकती और मैं चाह के भी इसको लिख नही सकूंगा क्योकि मोबाइल या कम्प्यूटर में वे शब्द् ही नही है लिखने के लिए,उन शब्दों या ध्वनियों को सुना तो जा सकता है किन्तु लिखा नही जा सकता।फिर भी यदि आपको कोई प्रश्न करना है तो आप कमेंट में लिख सकते है मेरा प्रयास रहेगा आपका मार्गदर्शन करने का...

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।। राहुलनाथ।।™
भिलाई,छत्तीसगढ़,भारत
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चेतावनी:-इस लेख में वर्णित सभी नियम ,सूत्र,व्याख्याए,एवं तथ्य हमारी निजी अनुभूतियो के स्तर पर है जिसे मानने के लिए आप बाध्य नहीं है।अतः हमारी मौलिक संपत्ति है।विश्व में कही भी,किसी भी भाषा में ये इस रूप में उपलब्ध नहीं है|लेख को पढ़कर कोई भी प्रयोग बिना मार्ग दर्शन के न करे । तंत्र-मंत्रादि की जटिल एवं पूर्ण विश्वास से  साधना-सिद्धि गुरु मार्गदर्शन में होती है अतः बिना गुरु के निर्देशन के साधनाए ना करे।बिना लेखक की लिखितअनुमति के लेख के किसी भी अंश का कही भी कॉपी-पेस्ट कर प्रकाषित करना वर्जित है।लेख पसंद आने पे कृपया शेयर करे।न्यायलय क्षेत्र दुर्ग छत्तीसगढ़(©कॉपी राइट एक्ट 1957)
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शुक्रवार, 18 अगस्त 2017

कालिकाष्टकं


कालिकाष्टकम्
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देवी कालिका के प्रत्यक्षीकरण के लिए श्रीमत् शंकराचार्यविरचित श्रीकालिकाष्टक एक अमोघ साधन है

कालिकाष्टकं
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गलद्रक्तमुण्डावलीकण्ठमाला

महोघोररावा सुदंष्ट्रा कराला ।

विवस्त्रा श्मशानालया मुक्तकेशी

महाकालकामाकुला कालिकेयम् ॥१॥

भुजेवामयुग्मे शिरोऽसिं दधाना

वरं दक्षयुग्मेऽभयं वै तथैव ।

सुमध्याऽपि तुङ्गस्तना भारनम्रा

लसद्रक्तसृक्कद्वया सुस्मितास्या ॥२॥

शवद्वन्द्वकर्णावतंसा सुकेशी

लसत्प्रेतपाणिं प्रयुक्तैककाञ्ची ।

शवाकारमञ्चाधिरूढा शिवाभिश्_

चतुर्दिक्षुशब्दायमानाऽभिरेजे ॥३॥

विरञ्च्यादिदेवास्त्रयस्ते गुणास्त्रीन्

समाराध्य कालीं प्रधाना बभूबुः ।

अनादिं सुरादिं मखादिं भवादिं

स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः ॥१॥

जगन्मोहनीयं तु वाग्वादिनीयं

सुहृत्पोषिणीशत्रुसंहारणीयम् ।

वचस्तम्भनीयं किमुच्चाटनीयं

स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः ॥२॥

इयं स्वर्गदात्री पुनः कल्पवल्ली

मनोजास्तु कामान् यथार्थं प्रकुर्यात् ।

तथा ते कृतार्था भवन्तीति नित्यं

स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः ॥३॥

सुरापानमत्ता सुभक्तानुरक्ता

लसत्पूतचित्ते सदाविर्भवत्ते ।

जपध्यानपूजासुधाधौतपङ्का

स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः ॥४॥

चिदानन्दकन्दं हसन् मन्दमन्दं

शरच्चन्द्रकोटिप्रभापुञ्जबिम्बम् ।

मुनीनां कवीनां हृदि द्योतयन्तं

स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः ॥५॥

महामेघकाली सुरक्तापि शुभ्रा

कदाचिद् विचित्राकृतिर्योगमाया ।

न बाला न वृद्धा न कामातुरापि

स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः ॥६॥

क्षमस्वापराधं महागुप्तभावं

मया लोकमध्ये प्रकाशिकृतं यत् ।

तव ध्यानपूतेन चापल्यभावात्

स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः ॥७॥

यदि ध्यानयुक्तं पठेद् यो मनुष्यस्_

तदा सर्वलोके विशालो भवेच्च ।

गृहे चाष्टसिद्धिर्मृते चापि मुक्तिः

स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः ॥८॥

॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं श्रीकालिकाष्टकं सम्पूर्णम् ॥
।। राहुलनाथ।।™
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चेतावनी:-लेख को पढ़कर कोई भी प्रयोग बिना मार्ग दर्शन के न करे । तंत्र-मंत्रादि की जटिल एवं पूर्ण विश्वास से साधना-सिद्धि गुरु मार्गदर्शन में होती है अतः बिना गुरु के निर्देशन के साधनाए ना करे।पोस्ट पसंद आने पे कृपया शेयर करे।न्यायलय क्षेत्र दुर्ग छत्तीसगढ़
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गुरुवार, 17 अगस्त 2017

नाथ सम्प्रदाय का पुराणों में स्थान

नाथ सम्प्रदाय का पुराणों में स्थान
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नाथ संप्रदाय पर विपुल श्रेष्ठ सामग्री प्राचीन ग्रंथ में बिखरी पड़ी है पर उनका संतोषजनक सूक्ष्म शोध-संग्रह एवं संपादन शेष है। उदहारण स्वरूप नारद पुराण उत्तर भाग,अध्याय ६९,स्कंध पुराण, नागरखंड,अध्याय २६२,भविष्य पुराण,प्रतिसर्ग पर्व ,में श्रीमत्स्येन्द्रनाथ जी एवं श्री गोरखनाथ जी के प्रादुर्भाव की बड़ी रोचक कथाएं वर्णित है इसके साथ ही मत्स्यनाथ,मीननाथ, अवलोकितेश्वर आदि पर्यायवाची नाम भी प्राप्त होते है।
इसी प्रकार महर्षि दुर्वासा-विरचित 'ललितास्तव' के श्लोक ५६ में हनुमानजी के पिता वायु देवता के साथ-

वन्दे तदुत्तरहरित्कोने वायुम् चमरुवरवाहम्।
कोरकितत्व बोधान गोरक्षप्रमुखयोगिनोपि मुहु:।।

तत्वबोधोत्पन्न योगियोमे श्रीगोरक्षनाथजी का सर्वोप्रथम निर्देश किया गया है।योग-सिद्धियों से संबंध होनेके कारण नवनाथोका भी श्री हनुमान जी से संबंध रहा है।कई बार संस्पर्धा सी भी इनमे चली है जिसका श्री नाथ सिद्ध संत उल्लेख करते है।
साभार श्रीहनुमान अंक,कल्याण,गीताप्रेस

।।राहुलनाथ।।
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गुरुवार, 10 अगस्त 2017

रहस्यमयी स्मशान और शव साधना

रहस्यमयी स्मशान और शव साधना
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स्मशान का नाम सुनते ही साधारण व्यक्ति का शरीर भय ग्रस्त हो जाता है वहा के जलते शवो का भान होने लगता है उन जलते शवो की दुर्गंध का एहसास होने लगता है और रात में तो ये स्थान और भी ज्यादा भयावह प्रतीत होता है।फिर साधना सिद्धि के लिए इस स्थान का चुनाव क्यो???

आपने पढ़ा होगा या सुना होगा कि बहुत से मंत्रो को स्मशान में सिद्ध करना होता है जैसे काली,भैरव आदि के मंत्रो को।किन्तु स्मशान में ही क्यो?क्योकि स्मशान में आप जब भी जाये तो आप महसूस करेंगे एक अलग प्रकार का भाव,शांति ,कुछ भी नही होने का भाव, स्मशान में किसी भी प्रकार का दुनियादारी का भाव पैदा नही होता और ना ही वहां भूख लगती है।और आप ये समझ ले कि मंत्र साधना में भाव का ही मूल महत्व होता है खास कर साबर मंत्रो में, साबर मंत्रो की सिद्धि में जहां भाव की आवश्यकता होती है वही वैदिक मंत्रों में नाद की आवश्यकता होती है।ये भाव स्मशान में आसानी से पैदा हो जाता है क्योंकि स्मशान में प्रवेश करते ही ,चिता के दर्शन करते ही ,जली चिता के भस्म को देखते ही नश्वरता का अहसास होता है और बाकी सभी भाव यहां समाप्त हो जाते है।ऐसी अवस्था मे यदि सही भाव के साथ मंत्र पढ़े जाए तो मंत्र जल्दी सिद्ध हो जाते है।यही स्मशान साधना या शव साधना का मूल है।ये तो हो गई साधारण सी बात ,किन्तु इसका मूल रहस्य जो पूर्णतः गोपनीय रहा है यदि आप समझना चाहेगे तो ये इससे सर्वथा भिन्न है।स्मशान की मूल अवस्था के अनुसार मन मस्तिष्क को स्मशान के समान शांत व विचार हीन करने से होता है यह अवस्था कभी भी कही भी की जा सकती है इसमे स्मशान में बैठकर साधना सिद्धि करना आवश्यक नही होता है।इस अवस्था मे मन -मस्तिष्क को दुनियादारी के सभी भावों से विरक्त कर दिया जाता है ये अवस्था जब जहाँ पैदा हो जाये वो स्मशान की वही अवस्था होती है।इस समय और इस अवस्था मे शव आपका ही शरीर होता है जिस पे बैठ कर आप साधना करते है।किसी अन्य शव पे बैठकर साधना नही करनी होती।इस अवस्था के अभाव में स्मशान में बैठकर साधना करने का कोई अर्थ नही होता है।बहुत से साधक शास्त्रो ग्रंथो की भाषा को ना समझते हुए स्मशान में बैठ कर साधना करते है और भय का व्यपार चलाते रहते है ।सामान्य सांसारिक प्राणी जो कि स्मशान से भयभीत होता है क्योंकि उसे मालूम होता है कि यही वो स्थान है जहां जाने के बाद कोई वापस नही आता ,यही उसके भय का मूल कारण होता है।स्मशान की भस्म से भी आशय है कि अपने मनोविकारों,कुसंस्कारों को भस्म करना एवं उससे निर्मित भस्म तक को अपने शरीर या माथे पे स्मृति स्वरूप स्थान देना ,भस्म लगाने का उद्देश्य यह है कि इस साधक ने अपने मन-मस्तिष्क के विकारों को भस्म कर लिया है एवं जिस प्रकार सोना-चांदी,जीव-जंतु,वृक्ष-पौधे सब कुछ जल कर एक प्रकार ही हो जाते है उसी प्रकार भस्मी साधक अपने विकारों को भस्म कर एकीकार हो गया है।
जो लोग इस प्रकार से धर्म ग्रंथो को समझते है उनके लिए सिद्धि का मार्ग प्रशस्त हो जाता है और जो नही समझते वे अपने भय के कारण,अपने मोह के कारण पाखंडियो-ढोंगियों के जाल में फस जाते है।क्योकि एक सामान्य व्यक्ति स्मशान में जाना नही चाहता और इसका ही फायदा कुछ पाखंडी साधक स्मशान और स्मशान पूजा सामग्री के नाम से एक बड़ी रकम वसूल कर लेते है।ये बात अलग है कि आप कही भी किसी से मिलने जाए तो कुछ सामग्री ले जाना चाहिए ,खाली हाथ नही जाना चाहिए ।ऐसे में वो सामग्री कितने की होती है महज 100 या 150 रु की ,या अच्छी से अच्छी मिठाई भी ली तो 500 रु की बस।ये सामग्री भी मन को समझाने के लिए हीं होती है क्योंकि हमने बचपन से सुन रखा होता है कि कोई वहां होता है यदि हा, तो कोई फर्क नही पड़ता साधक को इस अवस्था को प्राप्त करने हेतु 500 रु खर्च भी हो जाये।
लेकिन मैं कहु की मैं आपके वैराग्य की प्राप्ति के लिए साधना करूँगा तो ये सरासर मूर्खता ही होगी क्योंकि जिसको भूख लगती है उसको ही भोजन खाने से तृप्ति मिलती है आपके बदले यदि मैने भोजन ग्रहण कर भी लिया तो आपको तृप्ति नही मिलेगी।
हा इसमे ये बात अलग से विचारणीय है कि यदि आप किसी की अंतिम यात्रा में गए ही नही है तो आप इस अवस्था को समझ ही नही पाएंगे इसीकारण कुछ साधक गण अनुभूति की प्राप्ति के लिए स्मशान में जाकर उस अवस्था को आत्म साध करने का प्रयास करते है जिससे कि आवश्यकता पड़ने पे वे किसी भी स्थान पे आंखे बंद कर मानसिक रूप से उस अवस्था को प्राप्त कर सकते है।इस अवस्था की प्राप्ति के लिए अच्छा होगा कि आप अपने परिचय में मृत्यु होने से उनकी अंतिम यात्रा में अवश्य जाए एवम उस वैराग्य को महसूस करे,उस परिजन के मानसिक व आत्मिक दुःख को समझते हुए भीतर के वैराग्य को जन्म लेने दे।उस मृत आत्मा की सद्गति के लिए प्रार्थना करे क्योकि वो आज कही गया है यह सत्य है और वो फिर कभी नही आएगा ये भी सत्य है और इन दोनों सत्य के ऊपर ये जानना है कि हमे भी एक दिन वही जाना है।बस ये समझते ही साधक वैराग का जनक बन जाता है।
लेख में दिखाए गए भगवान शिव के छाया चित्र का संकलन गुगुल द्वारा किया गया है।

  
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बुधवार, 2 अगस्त 2017

आओ जोड़े आध्यात्मिक षड्यंत्र की कड़ियाँ

आओ जोड़े आध्यात्मिक षड्यंत्र की कड़ियाँ
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"कही की ईंट कही का रोड़ा ,भानमती ने कुनबा जोड़ा"
आज से सैकड़ो वर्ष पूर्व जब ज्ञान की कमी थी या कह सकते है कि जब विज्ञान ने अपने स्तर पे सफलता नही पाई थी ।उस समय के सीधे साधे लोगो को मूर्ख बना कर बहुत से रसायनिक चमत्कार दिखाकर बहुत से लोगो ने अपने कुनबो और पीठो का निर्माण किया ,कुछ झूठे रासायनिक चमत्कारों को दिखा के लोगो को आकर्षित कर धर्म परिवर्तन भी किया गया और इस कार्य मे अध्यात्म का पूरा सहारा लिया गया,ये उस समय की बात है जब छाप खाने भी नही हुआ करते थे जो भी लिखा जाता था भोज पत्र या इस प्रकार के अन्य पत्रों की सहायता से गुप्त भाषा मे लिखा जाता था जो सामान्य व्यक्ति की समझ मे भी नही आता रहा होगा,इन बातों का बहुत बड़ा गुप्त भाग तो लिखा भी नही जाता था वो तो गुरु शिष्य परंपरा में कानो मे बताया जाता रहा होगा ।ये सब चमत्कार किसी फकीरी के,सिद्धि के साधना के नही होते थे ये सब चमत्कार रसायनिक होते थे जिनको देख सामान्य व्यक्ति प्रभावित हो कर अपना धन घर,भूमि आश्रम,मठ या जो भी तात्कालिक शासन होता था उन्हें प्रदान कर देता था ,आपही सोचिये इस युग मे चमत्कार कोई क्यो नही दिखाता जैसे ,गरम कढ़ाई से पुरिया निकालना,सोना बनाना,निम्बू से खून निकालना इस प्रकार के और चमत्कार।उस समय इन चमत्कारियों से यदि सीधे साधे लोग सवाल करते थे तो उनका उत्तर होता था की ये हमारी मंत्र विद्या का चमत्कार है।और मंत्र पूछा जाए तो कहा जाता रहा होगा जैसे कि आज भी कहते  है कि मंत्र गुप्त है ।और किसी ने मंत्र बता भी दिया तो विधि ऐसी बता दी जाती थी कि उसका बाप क्या आने वाली औलाद भी ना कर सके जैसे कि 9 करोड़ मंत्रो से सिद्ध होगा,गड्ढे में बैठ कर सिद्ध होगा,पानी मे डूब कर सिद्ध होगा,200 दिन उपवास से सिद्ध होगा।
इस सब क्रिया कांड में सबसे ज्यादा उपयोग की गया साबरी मंत्रो का,बस कोई भी मंत्र बनाया,जिसका कोई हाथ पैर नही और प्रारम्भ में लिख दिया गया "ॐ गुरुजी"सतनाम आदेश जैसे सबद और अंत मे टिका दी जिसकी जो मर्जी वो कसम और कसम ना मिले तो फिर तो है ही भगवान महादेव कसम खाने के लिए ,लिख दिया फुरो मंत्र ईश्वर वाचा,शव्द साँचा पिंड कांचा,ईश्वर महादेव गौरा की दुहाई।
जबकि ये साबर मंत्र है ही नही गुरु गोरख जी की सबदि पढिये ,देखिये वहां उन्होंने कौन सी कसम दी है,स्वरूप मंत्र,नवनाथ मंत्र और ऐसे बहुत से सिद्ध मंत्र है जहां कोई कसम दी ही नही गई है।तो ये कसमे आई कहा से ये सोचने का विषय है।
सामान्य मानव का लक्ष्य होता ही है भयो से मुक्ति ,रोगों से मुक्ति और सुखों की प्राप्ति और वो भी आसानी से बस इसी लिए मानव इधर उधर अज्ञानता वश भटकाता रहता है और इसका फायदा उठाके ही मायावी गुरुओ का दरबार सजने लगता है चौक चौराहे में विचित्र विचित्र से धर्मावलंबि ओझाओं,बाबाओ,मठाधीशों,संतो,नवाबो,मुल्लो,पिरो, भगवानो ,फकीरों ,सिद्धहो, जिन्नों शैतानो,की चौकी का धंधा पनपने लगता है।
बेचारा परेशान आदमी क्या नही करता उसे बोलो तो अपनी परेशानी की मुक्ति के लिए 100/500 फिट का गड्ढा भी वो खोद ही देगा और आजकल के यांत्रिक युग मे तो वो इतना बैचेन है जल्दबाज है मानव की वो जे सी बी मशीन लगा के गड्ढा खोद देगा।
उस समय जो भी तत्कालिक शासक रहा उनकी चापलूसी करके कोई कोई सिद्ध,गोसाई,मठाधीश्वर,औलिया,हजरत और नवाब वे बन गए जिनकी वंश परंपरा अब भी चल रही है बाकी रही सही कसर छाप खाना आने के बाद प्रकाशकों ने अपनी बिक्री बढ़ाने के लिए उल्टी सीधी बाते,मंत्र और साधनाये लिख कर पूरी कर दी।किंतु स्मरण रहे अब विज्ञान का युग है और यदि आप विज्ञान की कसौटी पे खरे नही उतरे तो आप अपने आप को सिद्ध नही कर पाएंगे इसीकारण आज चमत्कार करने वाले पैदा नही होते क्योकि आजका मानव पढ़ालिखा है और तर्क अपनी जेब मे ले कर घूमता है।क्रमशः

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