बुधवार, 21 जून 2017

चंडी देवी कवचं

चंडी देवी कवचं

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ॐ नमश्चंडिकायै

न्यासः
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अस्य श्री चंडी कवचस्य । ब्रह्मा ऋषिः । अनुष्टुप् छंदः ।चामुंडा देवता । अंगन्यासोक्त मातरो बीजम् । नवावरणो मंत्रशक्तिः । दिग्बंध देवताः तत्वम् । श्री जगदंबा प्रीत्यर्थे सप्तशती पाठांगत्वेन जपे विनियोगः ॥

ॐ नमश्चंडिकायै

मार्कंडेय उवाच ।
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ॐ यद्गुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणाम् ।
यन्न कस्यचिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥

ब्रह्मोवाच ।
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अस्ति गुह्यतमं विप्र सर्वभूतोपकारकम् ।
देव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुष्व महामुने ॥ २ ॥

प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी ।
तृतीयं चंद्रघंटेति कूष्मांडेति चतुर्थकम् ॥ ३ ॥

पंचमं स्कंदमातेति षष्ठं कात्यायनीति च ।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम् ॥ ४ ॥

नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः ।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना ॥ ५ ॥

अग्निना दह्यमानस्तु शत्रुमध्ये गतो रणे ।
विषमे दुर्गमे चैव भयार्ताः शरणं गताः ॥ ६ ॥

न तेषां जायते किंचिदशुभं रणसंकटे ।
नापदं तस्य पश्यामि शोकदुःखभयं न हि ॥ ७ ॥

यैस्तु भक्त्या स्मृता नूनं तेषां वृद्धिः प्रजायते ।
ये त्वां स्मरंति देवेशि रक्षसे तान्नसंशयः ॥ ८ ॥

प्रेतसंस्था तु चामुंडा वाराही महिषासना ।
ऐंद्री गजसमारूढा वैष्णवी गरुडासना ॥ ९ ॥

माहेश्वरी वृषारूढा कौमारी शिखिवाहना ।
लक्ष्मीः पद्मासना देवी पद्महस्ता हरिप्रिया ॥ १० ॥

श्वेतरूपधरा देवी ईश्वरी वृषवाहना ।
ब्राह्मी हंससमारूढा सर्वाभरणभूषिता ॥ ११ ॥

इत्येता मातरः सर्वाः सर्वयोगसमन्विताः ।
नानाभरणाशोभाढ्या नानारत्नोपशोभिताः ॥ १२ ॥

दृश्यंते रथमारूढा देव्यः क्रोधसमाकुलाः ।
शंखं चक्रं गदां शक्तिं हलं च मुसलायुधम् ॥ १३ ॥

खेटकं तोमरं चैव परशुं पाशमेव च ।
कुंतायुधं त्रिशूलं च शार्ंगमायुधमुत्तमम् ॥ १४ ॥

दैत्यानां देहनाशाय भक्तानामभयाय च ।
धारयंत्यायुधानीत्थं देवानां च हिताय वै ॥ १५ ॥

नमस्ते‌உस्तु महारौद्रे महाघोरपराक्रमे ।
महाबले महोत्साहे महाभयविनाशिनि ॥ १६ ॥

त्राहि मां देवि दुष्प्रेक्ष्ये शत्रूणां भयवर्धिनि ।
प्राच्यां रक्षतु मामैंद्री आग्नेय्यामग्निदेवता ॥ १७ ॥

दक्षिणे‌உवतु वाराही नैरृत्यां खड्गधारिणी ।
प्रतीच्यां वारुणी रक्षेद्वायव्यां मृगवाहिनी ॥ १८ ॥

उदीच्यां पातु कौमारी ऐशान्यां शूलधारिणी ।
ऊर्ध्वं ब्रह्माणी मे रक्षेदधस्ताद्वैष्णवी तथा ॥ १९ ॥

एवं दश दिशो रक्षेच्चामुंडा शववाहना ।
जया मे चाग्रतः पातु विजया पातु पृष्ठतः ॥ २० ॥

अजिता वामपार्श्वे तु दक्षिणे चापराजिता ।
शिखामुद्योतिनी रक्षेदुमा मूर्ध्नि व्यवस्थिता ॥ २१ ॥

मालाधरी ललाटे च भ्रुवौ रक्षेद्यशस्विनी ।
त्रिनेत्रा च भ्रुवोर्मध्ये यमघंटा च नासिके ॥ २२ ॥

शंखिनी चक्षुषोर्मध्ये श्रोत्रयोर्द्वारवासिनी ।
कपोलौ कालिका रक्षेत्कर्णमूले तु शांकरी ॥ २३ ॥

नासिकायां सुगंधा च उत्तरोष्ठे च चर्चिका ।
अधरे चामृतकला जिह्वायां च सरस्वती ॥ २४ ॥

दंतान् रक्षतु कौमारी कंठदेशे तु चंडिका ।
घंटिकां चित्रघंटा च महामाया च तालुके ॥ २५ ॥

कामाक्षी चिबुकं रक्षेद्वाचं मे सर्वमंगला ।
ग्रीवायां भद्रकाली च पृष्ठवंशे धनुर्धरी ॥ २६ ॥

नीलग्रीवा बहिः कंठे नलिकां नलकूबरी ।
स्कंधयोः खड्गिनी रक्षेद्बाहू मे वज्रधारिणी ॥ २७ ॥

हस्तयोर्दंडिनी रक्षेदंबिका चांगुलीषु च ।
नखाञ्छूलेश्वरी रक्षेत्कुक्षौ रक्षेत्कुलेश्वरी ॥ २८ ॥

स्तनौ रक्षेन्महादेवी मनःशोकविनाशिनी ।
हृदये ललिता देवी उदरे शूलधारिणी ॥ २९ ॥

नाभौ च कामिनी रक्षेद्गुह्यं गुह्येश्वरी तथा ।
पूतना कामिका मेढ्रं गुदे महिषवाहिनी ॥ ३० ॥

कट्यां भगवती रक्षेज्जानुनी विंध्यवासिनी ।
जंघे महाबला रक्षेत्सर्वकामप्रदायिनी ॥ ३१ ॥

गुल्फयोर्नारसिंही च पादपृष्ठे तु तैजसी ।
पादांगुलीषु श्री रक्षेत्पादाधस्तलवासिनी ॥ ३२ ॥

नखान् दंष्ट्रकराली च केशांश्चैवोर्ध्वकेशिनी ।
रोमकूपेषु कौबेरी त्वचं वागीश्वरी तथा ॥ ३३ ॥

रक्तमज्जावसामांसान्यस्थिमेदांसि पार्वती ।
अंत्राणि कालरात्रिश्च पित्तं च मुकुटेश्वरी ॥ ३४ ॥

पद्मावती पद्मकोशे कफे चूडामणिस्तथा ।
ज्वालामुखी नखज्वालामभेद्या सर्वसंधिषु ॥ ३५ ॥

शुक्रं ब्रह्माणि! मे रक्षेच्छायां छत्रेश्वरी तथा ।
अहंकारं मनो बुद्धिं रक्षेन्मे धर्मधारिणी ॥ ३६ ॥

प्राणापानौ तथा व्यानमुदानं च समानकम् ।
वज्रहस्ता च मे रक्षेत्प्राणं कल्याणशोभना ॥ ३७ ॥

रसे रूपे च गंधे च शब्दे स्पर्शे च योगिनी ।
सत्त्वं रजस्तमश्चैव रक्षेन्नारायणी सदा ॥ ३८ ॥

आयू रक्षतु वाराही धर्मं रक्षतु वैष्णवी ।
यशः कीर्तिं च लक्ष्मीं च धनं विद्यां च चक्रिणी ॥ ३९ ॥

गोत्रमिंद्राणि! मे रक्षेत्पशून्मे रक्ष चंडिके ।
पुत्रान् रक्षेन्महालक्ष्मीर्भार्यां रक्षतु भैरवी ॥ ४० ॥

पंथानं सुपथा रक्षेन्मार्गं क्षेमकरी तथा ।
राजद्वारे महालक्ष्मीर्विजया सर्वतः स्थिता ॥ ४१ ॥

रक्षाहीनं तु यत्-स्थानं वर्जितं कवचेन तु ।
तत्सर्वं रक्ष मे देवि! जयंती पापनाशिनी ॥ ४२ ॥

पदमेकं न गच्छेत्तु यदीच्छेच्छुभमात्मनः ।
कवचेनावृतो नित्यं यत्र यत्रैव गच्छति ॥ ४३ ॥

तत्र तत्रार्थलाभश्च विजयः सार्वकामिकः ।
यं यं चिंतयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम् ॥ ४४ ॥

परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यते भूतले पुमान् ।
निर्भयो जायते मर्त्यः संग्रामेष्वपराजितः ॥ ४५ ॥

त्रैलोक्ये तु भवेत्पूज्यः कवचेनावृतः पुमान् ।
इदं तु देव्याः कवचं देवानामपि दुर्लभम् ॥ ४६ ॥

यः पठेत्प्रयतो नित्यं त्रिसंध्यं श्रद्धयान्वितः ।
दैवीकला भवेत्तस्य त्रैलोक्येष्वपराजितः । ४७ ॥

जीवेद्वर्षशतं साग्रमपमृत्युविवर्जितः ।
नश्यंति व्याधयः सर्वे लूताविस्फोटकादयः ॥ ४८ ॥

स्थावरं जंगमं चैव कृत्रिमं चैव यद्विषम् ।
अभिचाराणि सर्वाणि मंत्रयंत्राणि भूतले ॥ ४९ ॥

भूचराः खेचराश्चैव जुलजाश्चोपदेशिकाः ।
सहजा कुलजा माला डाकिनी शाकिनी तथा ॥ ५० ॥

अंतरिक्षचरा घोरा डाकिन्यश्च महाबलाः ।
ग्रहभूतपिशाचाश्च यक्षगंधर्वराक्षसाः ॥ ५१ ॥

ब्रह्मराक्षसवेतालाः कूष्मांडा भैरवादयः ।
नश्यंति दर्शनात्तस्य कवचे हृदि संस्थिते ॥ ५२ ॥

मानोन्नतिर्भवेद्राज्ञस्तेजोवृद्धिकरं परम् ।
यशसा वर्धते सो‌உपि कीर्तिमंडितभूतले ॥ ५३ ॥

जपेत्सप्तशतीं चंडीं कृत्वा तु कवचं पुरा ।
यावद्भूमंडलं धत्ते सशैलवनकाननम् ॥ ५४ ॥

तावत्तिष्ठति मेदिन्यां संततिः पुत्रपौत्रिकी ।
देहांते परमं स्थानं यत्सुरैरपि दुर्लभम् ॥ ५५ ॥

प्राप्नोति पुरुषो नित्यं महामायाप्रसादतः ।
लभते परमं रूपं शिवेन सह मोदते ॥ ५६ ॥

॥ इति वाराहपुराणे हरिहरब्रह्म विरचितं देव्याः कवचं संपूर्णम् ॥

देवीकवचं हिंदी भावार्थ
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महर्षि मार्कण्डेयजी बोले – हे पितामह! संसार में जो गुप्त हो और जो मनुष्यों की सब प्रकार से रक्षा करता हो और जो आपने आज तक किसी को बताया ना हो, वह कवच मुझे बताइए। श्री ब्रह्माजी कहने लगे – अत्यन्त गुप्त व सब प्राणियों की भलाई करने वाला कवच मुझसे सुनो, प्रथम शैलपुत्री, दूसरी ब्रह्मचारिणी, तीसरी चन्द्रघंटा, चौथी कूष्माण्डा, पाँचवीं स्कन्दमाता। छठी कात्यायनी, सातवीं कालरात्री, आठवीं महा गौरी, नवीं सिद्धि दात्री यह देवी की नौ मूर्त्तियाँ, “नवदुर्गा” कहलाती हैं। आग में जलता हुआ, रण में शत्रु से घिरा हुआ, विषम संकट में फँसा हुआ मनुष्य यदि दुर्गा के नाम का स्मरण करे तो उसको कभी भी हानि नहीं होती। रण में उसके लिए कुछ भी आपत्ति नहीं और ना उसे किसी प्रकार का दुख या डर ही होता है।

हे देवी! जिसने श्रद्धा पूर्वक तुम्हारा स्मरण किया है उसकी वृद्धि होती है। और जो तुम्हारा चिन्तन करते हैं उनकी तुम नि:सन्देह रक्षा करने वाली हो। चामुण्डा प्रेत पर, वाराही भैंसे पर, रौद्री हाथी पर, वैष्णवी गरुड़ पर अपना आसन जमाती है। माहेश्वरी बैल पर, कौमारी मोर पर, और हाथ में कमल लिए हुए विष्णु प्रिया लक्ष्मी जी कमल के आसन पर विराजती है। बैल पर बैठी हुई ईश्वरी देवी ने श्वेत रूप धारण कर रखा है और सब प्रकार के आभूषणों से विभूषित ब्राह्मी देवी हंस पर बैठती है और इस प्रकार यह सब देवियाँ सब प्रकार के योगों से युक्त और अनेक प्रकार के रत्न धारण किये हुए है।

भक्तों की रक्षा के लिए संपूर्ण देवियाँ रथ मेंबैठी तथा क्रोध में भरी हुई दिखाई देती हैं तथा चक्र, गदा, शक्ति, हल और मूसल, खेटक और तोमर, परशु तथा पाश, भाला और त्रिशूल एवं उत्तम शारंग आदि शस्त्रों को दैत्यों के नाश के लिए और भक्तों की रक्षा करने के लिए और देवताओं के कल्याण के लिए धारण किया है। हे महारौद्रे! अत्यन्त घोर पराक्रम, महान बल और महान उत्साह वाली देवी! तुमको मैं नमस्कार करता हूँ। हे देवि! तुम्हारा दर्शन दुर्लभ है तथा आप शत्रुओं के भय को बढ़ाने वाली हैं।

हे जगदम्बिके! मेरी रक्षा करो। पूर्व दिशा में ऎंन्द्री मेरी रक्षा करें, अग्निकोण में शक्ति, दक्षिण कोण में वाराही देवी, नैऋत्यकोण में खड्ग धारिणी देवी मेरी रक्षा करें। वारुणी पश्चिम दिशा में, वायुकोण में मृगवाहिनी, उत्तर में कौमारी और ईशान में शूलधारिणी देवी मेरी रक्षा करें, ब्राह्मणी ऊपर की ओर से मेरी रक्षा करें और वैष्णवी देवी नीचे की ओर से मेरी रक्षा करें और इसी प्रकार शव पर बैठ चामुण्डा देवी दसों दिशाओं में मेरी रक्षा करें।

जया देवी आगे, विजया पीछे की ओर, अजिता बायीं ओर, अपराजिता दाहिनी ओर मेरी रक्षा करें, उद्योतिनी देवी शिखा की रक्षा करें तथा उमा शिर में स्थित होकर मेरी करें, इसी प्रकार मस्तक में मालाधारी देवी रक्षा करें और यशस्विनी देवी मेरी भौंहों का संरक्षण करें। भौंहों के मध्य भाग में त्रिनेत्रा, नथुनों की यमघण्टा देवी रक्षा करे, नेत्रों के मध्य में शंखिनी देवी और द्वारवासिनी देवी कानों की रक्षा करें, सुगंधा नासिका में और चर्चिका ऊपर के होंठ में, अमृतकला नीचे के होंठ की, सरस्वती देवी जीभ की रक्षा करे, कौमारी देवी दाँतों की और चण्डिका कण्ठ प्रदेश की रक्षा करे, चित्रघण्टा गले की घण्टी की और महामाया तालु की रक्षा करे, कामाक्षी ठोढ़ी की, सर्वमंगला वाणी की रक्षा करे।

भद्रकाली गर्दन की और धनुर्धरी पीठ के मेरुदण्ड की रक्षा करें, कण्ठ के बाहरी भाग की नील ग्रीवा और कण्ठ की नली की नलकूबरी रक्षा करे, दोनो कन्धों की खड्गिनी और वज्रधारिणी मेरी दोनों बाहों की रक्षा करे, दण्डिनी दोनों हाथों की और अम्बिकादेवी समस्त अंगुलियों की रक्षा करे, शूलेश्वरी देवी संपूर्ण नखोंकी, कुलेश्वरी देवी मेरी कुक्षि की रक्षा करे, महादेवी दोनों स्तनों की, शोक विनाशिनी मन की रक्षा करे, ललितादेवी ह्रदय की, शूलधारिणी उदर की रक्षा करे।

कामिनी देवी नाभि की गुह्येश्वरी गुह्य स्थान की, पूतना और कामिका लिंग की और महिषवाहिनी गुदा की रक्षा करे, सम्पूर्ण इच्छाओं को पूर्ण करने वाली महाबलादेवी दोनों जंघाओं की रक्षा करे, विन्ध्यावासिनी दोनों घुटनों की और तैजसी देवी दोनों पाँवों के पृष्ठ भग की, श्रीधरी पाँवों की अंगुलियों की, स्थलवासिनी तलुओं की, दंष्ट्रा करालिनीदेवी नखों की, ऊर्ध्वकेशिनी केशों की, बागेश्वरी वाणी की रक्षा करे, रोमाबलियों के छिद्रों की कौबेरी और त्वचा की बागेश्वरी देवी रक्षा करे। पार्वती देवी रक्त, मज्जा, वसा, मांस, हड्डी की रक्षा करे।

कालरात्री आँतों की रक्षा करें, मुकुटेश्वरी देवी पित्त की, पद्मावती कमलकोष की, चूड़ामणि कफ की रक्षा करें, ज्वालामुखी नसों के जल की रक्षा करें, अभेद्यादेवी शरीर के सब जोड़ो की रक्षा करें, बह्माणी मेरे वीर्य की, छत्रेश्वरी छाया की और धर्मधारिणी मेरे अहंकार, मन तथा बुद्धि की रक्षा करें। प्राण अपान, समान, उदान और व्यान की वज्रहस्ता देवी रक्षा करें, कल्याण शोभना मेरे प्राण की रक्षा करे, रस, रूप, गन्ध शब्द और स्पर्श इन विषयों का अनुभव करते समय योगिनी देवी मेरी रक्षा करें तथा मेरे सत्वगुण, रजोगुण, तमोगुण की रक्षा नारायणी देवी करें।

आयु की रक्षा बाराही देवी करे, वैष्णवी धर्म की तथा चक्रिणी देवी मेरी यश, कीर्ति, लक्ष्मी, धन, विद्या की रक्षा करे, इन्द्राणी मेरे शरीर की रक्षा करे और हे चण्डिके! आप मेरे पशुओं की रक्षा करिये। महालक्ष्मी मेरे पुत्रों की रक्षा करे और भैरवी मेरी पत्नी की रक्षा करे, मेरे पथ की सुपथा तथा मार्ग की क्षमाकरी देवी रक्षा करे, राजा के दरबार में महालक्ष्मी तथा सब ओर व्याप्त रहने वाली विजया देवी चारों ओर से मेरी रक्षा करे।

जो स्थान रक्षा से रहित हो और कवच में रह गया हो उसकी पापों का नाश करने वाली जयन्ती देवी रक्षा करे। अपना शुभ चाहने वाले मनुष्य को बिना कवच के एक पग भी कहीं नहीं जाना चाहिए क्योंकि कवच रखने वाला मनुष्य जहाँ-जहाँ भी जाता हैं, वहाँ-वहाँ उसे अवश्य धन लाभ होता है तथा विजय प्राप्त करता है। वह जिस अभीष्ट वस्तु की इच्छा करता है वह उसको इस कवच के प्रभाव से अवश्य मिलती हैऔर वह इसी संसार में महा ऎश्वर्य को प्राप्त होता है, कवचधारी मनुष्य निर्भय होता है, और वह तीनों लोकों में माननीय होता है, देवी का यह कवच देवताओं के लिए भी कठिन है।

जो नित्य प्रति नियम पूर्वक तीनों संध्याओं को श्रद्धा के साथ इसका पठन-पाठन करता है उसे देव-शक्ति प्राप्त होती है, वह तीनों लोकों को जीत सकता है तथा अकाल मृत्यु से रहित होकर सौ वर्षों तक जीवित रहता है, उसकी लूता, चर्मरोग, विस्फोटक आदि समस्त व्याधियाँ समूल नष्ट हो जाती हैं और स्थावर, जंगम तथा कृत्रिम विष दूर होकर उनका कोई असर नहीं होता है तथा समस्त अभिचारक प्रयोग और इस तरह के जितने यन्त्र, मन्त्र, तन्त्र इत्यादि होते हैं इस कवच के हृदय में धारण कर लेने पर नष्ट हो जाते हैं।

इसके अतिरिक्त पृथ्वी पर विचरने वाले भूचर, नभचर, जलचर प्राणी उपदेश मात्र से, सिद्ध होने वाले निम्न कोटि के देवता, जन्म के साथ प्रकट होने वाले देवता, कुल देवता, कण्ठमाला आदि डाँकिनी शाँकिनी अन्तरिक्ष में विचरने वाली अत्यन्त बलवती भयानक डाँकिनियाँ, गृह, भूत, यक्ष, गन्धर्व, राक्षस, ब्रह्मराक्षस वैताल, कूष्माण्ड और भैरव आदि अनिष्टकारक देवता भी उस मनुष्य को जिसने कि अपने हृदय में यह कवच धारण किया हुआ है, देखते ही भाग जाते हैं। इस कवच के धारण करने से मान और तेज बढ़ता है।

जो मनुष्य इस कवच का पाठ करके उसके पश्चात सप्तशती चंडीका का पाठ करता है उसका यश जगत में विख्यात होता है, और जब तक वन पर्वत और काननादि इस भूमण्डल पर स्थित हैं, तब तक यहाँ पुत्र पौत्र आदि सन्तान परम्परा बनी रहती है, फिर देहान्त होने पर मनुष्य परम पद को प्राप्त होता है जो देवताओं के लिए भी कठिन है और अन्त में सुन्दर रूप को धारण करके भगवान शंकर के साथ आनन्द करता हुआ परम मोक्ष को प्राप्त होता है।

सोमवार, 19 जून 2017

हनुमान चालीसा पढ़ने की गुप्त एव्म रहस्यमय विधि!

हनुमान चालीसा पढ़ने की  गुप्त एव्म रहस्यमय विधि!!
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यदि हनुमान चालीसा पाठ करने से पूर्ण लाभ ना होने से एक बार ये विधि अवश्य पढ़े ये विधि आपकी इच्छाओ को पूरा कर सकती है!
मुझसे बहुत मित्रो और भक्तों ने कहा की वे लगातार हनुमान चालिसा पड़ते आ रहे है किन्तु उन्हें पूर्ण लाभ नजर नही आता कारण क्या है??
कोई भी चालिसा हो उसके पड़ने का एक मुख्य नियम है जो गुप्त है।किन्तु समाज के कल्याणार्थ ,भक्तों के कल्याणार्थ मैं इस रहस्य को प्रगट करता हूँ!!
रहस्य मात्र इतना है की जब भी आप किसी चालीसा को पढ़ते हैं तो उस चालीसा में कही न कही भक्त का नाम का उल्लेख होता है !जैसे श्री हनुमान चालिसा के अंतिम जो दोहा है !
।।दोहा।।
"तुलसीदास"सदा हरि चेरा ।
कीजै नाथ हृदय महँ डेरा ॥४०॥ 

इस श्लोको में "तुलसीदास "जो नाम लिखा वो आपका नहीं है इस स्थान पे आप अपने नाम का उच्चारण करे!और चालिसा के पन्नों में भी व्हाइटनर लगा के ऊपर अपना नाम लिखे एवं तुलसीदासजी को प्रणाम कर दो अगरबत्ती लगा कर इस चालीसा को प्रदान करने हेतु,धन्यवाद कर पाठ प्रारम्भ करे।
जैसे यदि मैं पाठ करता हूँ तो-
।।दोहा।।
"राहुलनाथ"सदा हरि चेरा ।
कीजै नाथ हृदय महँ डेरा ॥४०॥ 

बस इतना सा परिवर्तन आपको हनुमान चालीसा से चमत्कारी लाभ प्रदान करेगा एवम् आपको हनुमानजी की कृपा पूर्ण रूप से प्राप्त होगी!!
विशेष:-किसी भी चालिसा का पाठ करने से पहले अपने गुरुदेव से,ज्योतिष्य से,या किसी इस विषय के मर्मज्ञ से जानकारी प्राप्त कर लेना चाहिए की किसी चालीसा के पाठ करने से आपको लाभ होगा!अपनी इच्छा से किसी भी देवता की चालिसा पढ़ने से लाभ के स्थान पर हानि हो सकती है!इसी प्रकार से सभी मंत्रो के रहस्य होते है चाँबी होती है!!इसी प्रकार से भगवान शिव ने सारे मंत्रो तंत्रो का किलन किया हुआ है!जो गुरु शिष्य परम्परा में प्रदान करना मान्य हैं!

आदेश यह पोस्ट मेरे निजी अनुभव के अनुसार है !! ये मेरी अपनी अनुभुतियों का स्तर है !! यदी आपको ये पोस्ट सही लगे तो कमेंट में लिखे ! इसके आगे कि जानकारी क्रमश : मै आपको देने का प्रयास करुगा !! मेरा संकल्प समाज से धर्म के नाम पे आडम्बर फैलाने वालो का सफ़ाया कर धर्म एवं पूजा-साधना विधिकी सही जानकारी का प्रचार करना रहा है !
क्रमश:

तो आओ भक्तो 43 दिन हनुमान चालीसा का पाठ करे.......

।।॥दोहा॥

श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि ।
बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि ॥

बुद्धिहीन तनु जानिके सुमिरौं पवन-कुमार ।
बल बुधि बिद्या देहु मोहिं हरहु कलेस बिकार ॥

॥चौपाई॥

जय हनुमान ज्ञान गुन सागर ।
जय कपीस तिहुँ लोक उजागर ॥१॥

राम दूत अतुलित बल धामा ।
अञ्जनि-पुत्र पवनसुत नामा ॥२॥

महाबीर बिक्रम बजरङ्गी ।
कुमति निवार सुमति के सङ्गी ॥३॥

कञ्चन बरन बिराज सुबेसा ।
कानन कुण्डल कुञ्चित केसा ॥४॥

हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै ।
काँधे मूँज जनेउ साजै ॥५॥

सङ्कर सुवन केसरीनन्दन ।
तेज प्रताप महा जग बन्दन ॥६॥

बिद्यावान गुनी अति चातुर ।
राम काज करिबे को आतुर ॥७॥

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया ।
राम लखन सीता मन बसिया ॥८॥

सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा ।
बिकट रूप धरि लङ्क जरावा ॥९॥

भीम रूप धरि असुर सँहारे ।
रामचन्द्र के काज सँवारे ॥१०॥

लाय सञ्जीवन लखन जियाये ।
श्रीरघुबीर हरषि उर लाये ॥११॥

रघुपति कीह्नी बहुत बड़ाई ।
तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई ॥१२॥

सहस बदन तुह्मारो जस गावैं ।
अस कहि श्रीपति कण्ठ लगावैं ॥१३॥

सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा ।
नारद सारद सहित अहीसा ॥१४॥

जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते ।
कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते ॥१५॥

तुम उपकार सुग्रीवहिं कीह्ना ।
राम मिलाय राज पद दीह्ना ॥१६॥

तुह्मरो मन्त्र बिभीषन माना ।
लङ्केस्वर भए सब जग जाना ॥१७॥

जुग सहस्र जोजन पर भानु ।
लील्यो ताहि मधुर फल जानू ॥१८॥

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं ।
जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं ॥१९॥

दुर्गम काज जगत के जेते ।
सुगम अनुग्रह तुह्मरे तेते ॥२०॥

राम दुआरे तुम रखवारे ।
होत न आज्ञा बिनु पैसारे ॥२१॥

सब सुख लहै तुह्मारी सरना ।
तुम रच्छक काहू को डर ना ॥२२॥

आपन तेज सह्मारो आपै ।
तीनों लोक हाँक तें काँपै ॥२३॥

भूत पिसाच निकट नहिं आवै ।
महाबीर जब नाम सुनावै ॥२४॥

नासै रोग हरै सब पीरा ।
जपत निरन्तर हनुमत बीरा ॥२५॥

सङ्कट तें हनुमान छुड़ावै ।
मन क्रम बचन ध्यान जो लावै ॥२६॥

सब पर राम तपस्वी राजा ।
तिन के काज सकल तुम साजा ॥२७॥

और मनोरथ जो कोई लावै ।
सोई अमित जीवन फल पावै ॥२८॥

चारों जुग परताप तुह्मारा ।
है परसिद्ध जगत उजियारा ॥२९॥

साधु सन्त के तुम रखवारे ।
असुर निकन्दन राम दुलारे ॥३०॥

अष्टसिद्धि नौ निधि के दाता ।
अस बर दीन जानकी माता ॥३१॥

राम रसायन तुह्मरे पासा ।
सदा रहो रघुपति के दासा ॥३२॥

तुह्मरे भजन राम को पावै ।
जनम जनम के दुख बिसरावै ॥३३॥

अन्त काल रघुबर पुर जाई ।
जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई ॥३४॥

और देवता चित्त न धरई ।
हनुमत सेइ सर्ब सुख करई ॥३५॥

सङ्कट कटै मिटै सब पीरा ।
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा ॥३६॥

जय जय जय हनुमान गोसाईं ।
कृपा करहु गुरुदेव की नाईं ॥३७॥

जो सत बार पाठ कर कोई ।
छूटहि बन्दि महा सुख होई ॥३८॥

जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा ।
होय सिद्धि साखी गौरीसा ॥३९॥

तुलसीदास सदा हरि चेरा ।
कीजै नाथ हृदय महँ डेरा ॥४०॥ 

॥दोहा॥

पवनतनय सङ्कट हरन मङ्गल मूरति रूप ।
राम लखन सीता सहित हृदय बसहु सुर भूप ॥

*****जयश्री महाकाल****
******स्वामी राहुलनाथ********
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भिलाई, छत्तीसगढ़
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गुरुवार, 8 जून 2017

भक्ति मार्ग

भक्ति मार्ग
ज्ञान को सर्वोत्तम वस्तु समझना चाहिए उसके पास तक किसी अन्य पदार्थ की गति नहीं है इस प्रकार वह परम अलभ्य कहा जाता है उसी को मेरा स्वरूप ब्रह्म जानना चाहिए जिस तपस्या तथा आराधना का आश्रय लेकर जीवधारी पवित्र हो जाते हैं उसे ज्ञान की पदवी समझना चाहिए भक्ति तथा ज्ञान में कोई अंतर नहीं है।
जो मनुष्य इन दोनों में अंतर देखते हैं उन्हें दुख उठाना पड़ता है जो लोग भक्ति के विरुद्ध वचन कह  कर ज्ञान को प्रधानता देते हैं उन्हें महान कष्ट उठाना पड़ता है।
भक्ति को परम तत्व का ज्ञान प्रदान करने वाली समझना चाहिए वह मुझे अत्यंत प्रिय है।भक्ति के समान सीधा तथा भय हीन मार्ग अन्य कोई नहीं है क्योंकि उसके द्वारा परम तत्व की प्राप्ति होती है इस रीति को "पिपीलिका" कहा जाता है क्योंकि इसमें बिना किसी आधार के भी ब्रह्म पर चढ़कर फल प्राप्त किया जा सकता है।इसके विपरीत निर्गुण के मार्ग को "भीष्म" कहते हैं क्योंकि उसमें किसी वस्तु का आधार ना होने के कारण अत्यंत परिश्रम तथा कष्ट भोगने के पश्चात ही फल की प्राप्ति होती है भक्ति मन को प्रसन्नता प्रदान करने वाली है और मैं सदैव उसी के अधीन रहता हूं जो प्राणी ईह में भक्ति करता है उसे मैं लोक में आनंद तथा परलोक में मुक्ति प्रदान करता हूं ।मुझे कुल तथा जाति से कोई प्रयोजन नहीं है चारों युगों युगों में मुझे भक्त प्रिय है,परंतु कलयुग में तो अपने भक्तों को अत्यंत स्नेह करता हूं मैं अपने भक्तों की सदैव सहायता करता हूं और उनकी प्रसन्नता के निमित्त अनेक प्रकार के श्रेष्ठ चरित्र दिखाता हूं अतः हे देवी भक्ति की महिमा सबसे बड़ी जानकर तुम उसी को अपनाओ.....||शिव-उवाचः ||
श्री शिव महापुराण-६६
🚩🚩 JAISHREEJAI MAHAKAL OSGY🚩🚩

Rahulnath Osgy

सोमवार, 5 जून 2017

गुरु महिमा

गुरु महिमा
अपने ह्रदय के रहस्य को मात्र गुरु के समक्ष ही प्रकट करना चाहिए, जितना अधिक आप ऐसा करेंगे उतना ही अधिक आपको अपने गुरु से सहायता और सहानुभूतियां प्राप्त होगी।इस सहानुभूति का अर्थ है पाप और प्रलोभन के विरुद्ध संघर्ष में शक्ति की वृद्धि।गुरु के अतिरिक्त किसी अन्य के समक्ष रहस्यो को प्रगट करने से "अज्ञानियों" द्वारा हास्यरूपी प्रतिक्रिया प्राप्त हो सकती है जिससे आत्म विश्वास का ह्रास होने की संभावना होती है।

।।"तुम गुरु को साष्टांग प्रणाम करके उनसे परी प्रश्न करके तथा उनकी सेवा करके इसे सीखो ज्ञानी ब्रह्मनिष्ठ गुरु तुम्हें ज्ञान में निर्देश प्रदान करेंगे"।।गीता:4/34

जिस प्रकार चिड़िया अपने अंडों को अपने पंखों के नीचे दबा के रखती है जिससे उसके स्पर्श से मिलने वाली गर्मी से अंडे पक जाते हैं मछलियां अंडे देने के बाद उसको देखती रहती है और वह मछली की दृष्टि मात्र से पक जाते हैं कछुआ अंडा देता है और उसके बारे में सोचता रहता है और उसके सोचने मात्रा से अंडे पक जाते हैं इसी प्रकार गुरु द्वारा शिष्य को अध्यात्मिक शक्तियां, चिड़ियों की तरह स्पर्श द्वारा मछलियों की भांति दृष्टि से एवं कछुओं की भांति संकल्प से संप्रेषित हो जाती है।

🚩🚩🚩जयश्री महाँकाल 🚩🚩🚩
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तेलगु भूत का आतंक.

तेलगु भूत का आतंक..{सत्य घटना}
कृपया इस पोस्ट को एक बार अवश्य पढ़ें
हमारे बिहारी भाई शर्मा जी बहुत परेशानी में एक दिन मिलने आये और बताया कि उनके रिश्तेदार की पत्नी को कुछ दिनो से भूत-प्रेत की बाधा हो गई है और उसे तेलगु -भूत ने उसे पकड़ रखा है जब उसे बाधा होने लगती है तो वो गालियाँ देने लगती है मार-पिट करने लगती है और सबसे अचम्भे की बात कि वो तेलगु भाषा बोलने लगती और दो-चार क्वाटर दारू पी जाती है।
शर्मा जी के अनुसार उस स्त्री के पति ने मनोचिकित्सक,बाबा-तांत्रिक,ओझा-गुनिया,मंदिर-मस्जिद सब जगह दिखाया और निराश हो के अब जो होता है ईश्वर की मर्जी समझ कर ,बर्दाश्त कर रहे है।
शर्मा जी चाहते थे कि एक बार मैं उस परिवार की परेशानी समझने का प्रयास करू, जिससे कि समस्या का समाधान हो।
मित्रों यहां पहले एक बात आपको अपने विषय मे बता दु की भूत-प्रेत उतारना मेरा काम नही है किंतु हां "आत्मा-परमात्मा,तंत्र-मंत्र,अध्यात्म-दर्शन "मेरा अध्यन का विषय होने के कारण ,ऐसी बहुत से घटनाओ को देखने समझने और सीखने का मुझे अवसर प्राप्त हुआ ।भूत प्रेतों के अस्तित्व को नकारा नहीं जा सकता सभी जाति धर्म के लोग कही ना कही इनकी उपस्थिति को स्वीकार करते है।मैंने अपने अध्ययन में भगवान-शैतान,भूत-प्रेत,देवी-देवता,सिद्ध-साधुओ की उपस्थिति स्वीकार किया है और इनकी बातो की सत्य होते भी पाया है।इस संबंध में एक घटना आपको बताना चाहूंगा कि
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2009 में नौरात्री के समय 125000 मंत्रो के जाप का संकल्प-अनुष्ठान मैंने प्रारम्भ किया था,अनुष्ठान के दौरान मैं नित्य किये जाप एवं हवन की संख्या को एक डायरी में लिखा करता था इसके अलावा किसी को भी इस बात की जानकारी नही रहती थी कि मैं कौन रुप मे ईश्वर को पूज रहा हूँ और कौन सा मंत्र कितनी बार जप चुका हूं।
अभी मैं नित्य जाप में 9200 मंत्र जाप तक पहुचा ही था कि,एक सज्जन जिनकी 17 वार्षिक कन्या ने 5 दिन से भोजन नहीं खाया और किसी से कुछ बातचीत नही करती सिर्फ छत और दिवालो को बहुत कम पलके झुकाए देखती रहती है।
संध्या 7 बजे के आस-पास मै उस कन्या के घर,उसके सामने खड़ा था।मैंने कन्या को प्रणाम किया और दो अगरबत्ती देवी के नाम से उसके सामने जला दी।अगरबत्ती जलने के मिनट भर बाद वो कन्या अपने बिस्तर से उठी और जमीन पे आ कर बैठ गई अपने गुंथे हुए बालों को उसने खोला और सिर को जोर-जोर से गोल घुमाने लगी।मेरे पूछने पर उसने बताया कि वो वही देवी है जिसके मंत्रो का मैं रोज जाप कर रहा हूँ और उस कन्या ने मेरे अभी तक किये जाप की संख्या भी बताई और मेरा संकल्प जाप करने का कारण भी ,जो सिर्फ मेरे ही ज्ञान म् था।देवी ने ये भी कहा था कि जब भी कोई मुझे आत्मा की आवाज से बुलायेगा तो मुझे किसी ना किसी रूप से उससे मिलने जाना ही होगा,बस उसके पास मुझे पहचाने की दृष्टि होनी चाहिए।देवी के अनुसार कन्या 5 दिन पहले दुर्गा जी के मंदिर गई थी तभी से वो उसके साथ है।
उसके बाद देवि ने उस परिवार के साथ-साथ मुझे भी आशीर्वाद दिआ और जाप निरंतर करने का आदेश दे कर ,करीब 16-17 मिनट के बाद वो चले गई ।
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तो चलते है तेलगु भूत के पास।संध्या के समय शर्मा जी के साथ मैं उस स्त्री के घर पहुचा,वहां देखता हूं कि बड़ा भारी माहौल बना हुआ है 10-12 लोग भी वहां नारियल-निम्बू उस स्त्री को चढ़ा रहे थे साथ ही साथ गुलाल ,सिंदूर आदि का टीका लगा रहे थे।मैंने उन्हें प्रणाम किया और कौन है वो उनसे पूछा।उन्होंने कोई जवाब भी नही दिया।उस स्त्री पे मंत्र-प्रार्थना का भी कोई असर नहीं होता था।बस उसने मुझे तेलगु मे बोलना शुरू की,मुझे उसकी भाषा समझ नही आ रही थी तो मैंने किसी से पूछा ये क्या कह रही है,तो उन्होंने कहा महाराज गाली दे रहीं है।
मैं वहां से घर आ गया।दो दिन एक स्वयं से विचार विमर्श कर मैं इस नतीजे पे पहुचा की उस स्त्री को कोई बाधा नही है।फिर ये प्रश्न भी मेरे भीतर उठने लगा कि वो स्त्री ऐसा काम क्यो कर रही है?
दो दिन बाद मैं उस स्त्री के घर पहुचा और उसको प्रणाम कर मैने उसके पति को कहा कि भाई तू एक काम कर एक "खराटा झाड़ू" ले ले, और देवि का नाम ले कर जब तक आज भूत ना उतर जाए तब तक झाड़ू चलाते रहना।करीब करीब 25 झाड़ू पड़े होंगे अभी की वो भूत भाग गया।
ऐसा पहली बार हुआ था कि भूत भागा था इसीलिए उस परिवार के लोग बहुत खुश थे।
इस घटना के 2 दिन बाद मुझे उस स्त्री ने फोन किया और अपनी परेशानी बताई ।उस स्त्री के अनुसार ,उसका मायका बिहार से है जब तक वो माता पिता के साथ रही आनंद में रही, अच्छी पढ़ाई की,अच्छे कपडे पहने और कोई रोक-टोक नही थी।और जब से शादी हुई है सिवाय रोक टोक के कुछ नही है।संयुक्त परिवार में रहना है दिन भर घूंघट में।पति के साथ कही आना जाना नही है जीवन मे प्रेम जैसा कुछ नही है।पति ही कि अपनी माता की बात पे विश्वास करता है मेरा कोई वजूद नही था।इसीलिए जब मैं पिछली बार बिहार गई तब एक बाबा जी महाराज से मिली थी उनकी अपनी परेशानी बताने से उन्होंने बताया कि कोई परेशानी की बात नही है।तुम सिर्फ रोज शाम को अपने पे भूत चढ़ा लिया करो,गाली-गलौज किया करो ,जिस-जिस पे घुस्सा आये उसे मारा करो।सब ठीक हो जाएगा।उस स्त्री ने वैसा ही किया और अब वह बहुत खुश है ना कोई काम बताता है ,ना डाँटता है,घूंघट का अब टेंशन ही नहीं ,घर की बाकी महिलाएं भूत ना पकड़ ले यह सोच कर खुद घूंघट में रहती है।घर मे जो भी भोजन बनता है सबसे पहले मुझे ही मिलता है ,जो पति कभी घूमने नही ले जाता था अब महीने में 4 या 5 बार मंदिर-मस्जिद घुमाने ले जाता है।सब कुछ सही चल रहा था मेरी जिंदगी में की आप आ गए ,पूरा किये कराए पे आपने पानी फेर दिया ।
मैंने पूछा और वो तेलगु भाषा और शराब?
स्त्री ने कहा महाराज ,अब 7 साल से तेलगु मोहल्ले में रह रहे है तो इतना तेलगु तो सिख ही गए है और शराब के बिना कॉन्फिडेंस पैदा नहीं होता,दो-चार गाली निकालते ही शराब हाजिर हो जाती है।
मैंने कहा धन्य है देवी!आप, अब ये बताओ कि मुझे क्यो फोन किया अपने।उसने कहा कि महाराज आप कृपया मेरे घर मे मत आना कृपा होगी बस।
मैंने कहा ठीक है मैं तुम्हारी बात मान लेटा हु किन्तु तुम्हे भी मेरी बात माननी पढ़ेगी।मैंने कहा तुम रोज रोज घर-मोहल्ले वालों को परेशान ना किया करो।
महीने में एक दिन अमावस्या को भूत चढ़ा लिया करो।अन्यथा मुझे आना होगा ।
वो स्त्री मेरी बात मान गईं, अब अमावस अमावस को ही भूत चढ़ता है।सब कुछ पहले जैसा ही है।
बस उस स्त्री के पति को मैंने एक उपाय बताया है कि घर के मुख्य दरवाजे के पास खड़ी अवस्था मे "खराटा झाड़ू"
रख दे ताकि उसकी पत्नी झाड़ू देखे संयम में रहे।
महिला मित्रों से निवेदन है इस पोस्ट को अन्यथा ना लेते हुए इसे सकारात्मक रूप से ले एवं इस विधि का उपयोग निजी रूप से ना करे।

व्यक्तिगत अनुभूति एवं।विचार©₂₀₁₇
।। राहुलनाथ।।™भिलाई,छत्तीसगढ़,भारत
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🚩🚩🚩जयश्री महाँकाल 🚩🚩🚩
इस लेख में वर्णित सभी नियम ,सूत्र एवं व्याख्याए,एवं तथ्य हमारी निजी अनुभूतियो के स्तर पर है अतः हमारी मौलिक संपत्ति है।विश्व में कही भी,किसी भी भाषा में ये इस रूप में उपलब्ध नहीं है।इसकी किसी भी प्रकार से चोरी,कॉप़ी-पेस्टिंग आदि में शोध का अतिलंघन समझ कार्यवाही की जायेगी।

चेतावनी-
हमारे लेखो को पढने के बाद पाठक उसे माने ,इसके लिए वे बाध्य नहीं है।हमारे हर लेख का उद्देश्य केवल प्रस्तुत विषय से संबंधित जानकारी प्रदान करना है।यहां वैदिक-साबर-तांत्रिक ग्रंथो एवं स्वयं के अभ्यास अनुभव के आधार पर कुछ मंत्र-तंत्र संभंधित पोस्ट दी जाती है जो हामरे पूर्वज ऋषि-मुनियों की धरोहर है इसे ज्ञानार्थ ही ले ।लेख को पढ़कर कोई भी प्रयोग बिना मार्ग दर्शन के न करे । किसी गंभीर रोग अथवा उसके निदान की दशा में अपने योग्य विशेषज्ञ से अवश्य परामर्श ले। साधको को चेतावनी दी जाती है की तंत्र-मंत्रादि की जटिल एवं पूर्ण विश्वास से  साधना सिद्धि गुरु मार्गदर्शन में होती है अतः बिना गुरु के निर्देशन के साधनाए ना करे।
बिना लेखक की लिखितअनुमति के लेख के किसी भी अंश का कॉपी-पेस्ट ,या कही भी प्रकाषित करना वर्जित है।न्यायलय क्षेत्र दुर्ग छत्तीसगढ़(©कॉपी राइट एक्ट 1957)

गुरुवार, 1 जून 2017

काला टिका,काला तंत्र,सुरक्षा माता की

काला टिका,काला तंत्र,सुरक्षा माता की
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याद करिए किसने सबसे पहले आपपे तंत्र किया था!
एक थाली में किसी के साथ भोजन खाना तंत्रानुसार मना है यदि किसी कारण वश भोजन खाना भी पड़े तो ,पहला एवं अंतिम निवाला स्वयं ग्रहण करे।
तंत्र अधिकतर प्रेम एवं ममता में ही किया जाता है
या शत्रुता में
याद करिए पहली बार किसने आपपे तंत्र किया था!
याद आया ?
नही ना????
याद दिलाने का प्रयास करता हूं।
याद करिए वो जन्म के बाद का पहला काला टिका,
जो आपकी माता ने आपके मुख मंडल पे पहली बार लगाया था इस आशा से की कही आपको नजर ना लग जाये।वो काला टिका क्या तंत्र नही था।।
हिंदुस्तान में तंत्र की शुरुआत विरासत में जन्म से प्राप्त होती है इससे चाहके भी बच पाना मुश्किल है।अब ये आपपे निर्भर करता है आप तंत्र का उपयोग सकारात्मक करते है जैसे माता ने किया था या नकारात्मक करते है।

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