गुरुवार, 8 जून 2017

भक्ति मार्ग

भक्ति मार्ग
ज्ञान को सर्वोत्तम वस्तु समझना चाहिए उसके पास तक किसी अन्य पदार्थ की गति नहीं है इस प्रकार वह परम अलभ्य कहा जाता है उसी को मेरा स्वरूप ब्रह्म जानना चाहिए जिस तपस्या तथा आराधना का आश्रय लेकर जीवधारी पवित्र हो जाते हैं उसे ज्ञान की पदवी समझना चाहिए भक्ति तथा ज्ञान में कोई अंतर नहीं है।
जो मनुष्य इन दोनों में अंतर देखते हैं उन्हें दुख उठाना पड़ता है जो लोग भक्ति के विरुद्ध वचन कह  कर ज्ञान को प्रधानता देते हैं उन्हें महान कष्ट उठाना पड़ता है।
भक्ति को परम तत्व का ज्ञान प्रदान करने वाली समझना चाहिए वह मुझे अत्यंत प्रिय है।भक्ति के समान सीधा तथा भय हीन मार्ग अन्य कोई नहीं है क्योंकि उसके द्वारा परम तत्व की प्राप्ति होती है इस रीति को "पिपीलिका" कहा जाता है क्योंकि इसमें बिना किसी आधार के भी ब्रह्म पर चढ़कर फल प्राप्त किया जा सकता है।इसके विपरीत निर्गुण के मार्ग को "भीष्म" कहते हैं क्योंकि उसमें किसी वस्तु का आधार ना होने के कारण अत्यंत परिश्रम तथा कष्ट भोगने के पश्चात ही फल की प्राप्ति होती है भक्ति मन को प्रसन्नता प्रदान करने वाली है और मैं सदैव उसी के अधीन रहता हूं जो प्राणी ईह में भक्ति करता है उसे मैं लोक में आनंद तथा परलोक में मुक्ति प्रदान करता हूं ।मुझे कुल तथा जाति से कोई प्रयोजन नहीं है चारों युगों युगों में मुझे भक्त प्रिय है,परंतु कलयुग में तो अपने भक्तों को अत्यंत स्नेह करता हूं मैं अपने भक्तों की सदैव सहायता करता हूं और उनकी प्रसन्नता के निमित्त अनेक प्रकार के श्रेष्ठ चरित्र दिखाता हूं अतः हे देवी भक्ति की महिमा सबसे बड़ी जानकर तुम उसी को अपनाओ.....||शिव-उवाचः ||
श्री शिव महापुराण-६६
🚩🚩 JAISHREEJAI MAHAKAL OSGY🚩🚩

Rahulnath Osgy

सोमवार, 5 जून 2017

गुरु महिमा

गुरु महिमा
अपने ह्रदय के रहस्य को मात्र गुरु के समक्ष ही प्रकट करना चाहिए, जितना अधिक आप ऐसा करेंगे उतना ही अधिक आपको अपने गुरु से सहायता और सहानुभूतियां प्राप्त होगी।इस सहानुभूति का अर्थ है पाप और प्रलोभन के विरुद्ध संघर्ष में शक्ति की वृद्धि।गुरु के अतिरिक्त किसी अन्य के समक्ष रहस्यो को प्रगट करने से "अज्ञानियों" द्वारा हास्यरूपी प्रतिक्रिया प्राप्त हो सकती है जिससे आत्म विश्वास का ह्रास होने की संभावना होती है।

।।"तुम गुरु को साष्टांग प्रणाम करके उनसे परी प्रश्न करके तथा उनकी सेवा करके इसे सीखो ज्ञानी ब्रह्मनिष्ठ गुरु तुम्हें ज्ञान में निर्देश प्रदान करेंगे"।।गीता:4/34

जिस प्रकार चिड़िया अपने अंडों को अपने पंखों के नीचे दबा के रखती है जिससे उसके स्पर्श से मिलने वाली गर्मी से अंडे पक जाते हैं मछलियां अंडे देने के बाद उसको देखती रहती है और वह मछली की दृष्टि मात्र से पक जाते हैं कछुआ अंडा देता है और उसके बारे में सोचता रहता है और उसके सोचने मात्रा से अंडे पक जाते हैं इसी प्रकार गुरु द्वारा शिष्य को अध्यात्मिक शक्तियां, चिड़ियों की तरह स्पर्श द्वारा मछलियों की भांति दृष्टि से एवं कछुओं की भांति संकल्प से संप्रेषित हो जाती है।

🚩🚩🚩जयश्री महाँकाल 🚩🚩🚩
।।राहुलनाथ।।©₂₀₁₇
भिलाई,छत्तीसगढ़,भारत
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तेलगु भूत का आतंक.

तेलगु भूत का आतंक..{सत्य घटना}
कृपया इस पोस्ट को एक बार अवश्य पढ़ें
हमारे बिहारी भाई शर्मा जी बहुत परेशानी में एक दिन मिलने आये और बताया कि उनके रिश्तेदार की पत्नी को कुछ दिनो से भूत-प्रेत की बाधा हो गई है और उसे तेलगु -भूत ने उसे पकड़ रखा है जब उसे बाधा होने लगती है तो वो गालियाँ देने लगती है मार-पिट करने लगती है और सबसे अचम्भे की बात कि वो तेलगु भाषा बोलने लगती और दो-चार क्वाटर दारू पी जाती है।
शर्मा जी के अनुसार उस स्त्री के पति ने मनोचिकित्सक,बाबा-तांत्रिक,ओझा-गुनिया,मंदिर-मस्जिद सब जगह दिखाया और निराश हो के अब जो होता है ईश्वर की मर्जी समझ कर ,बर्दाश्त कर रहे है।
शर्मा जी चाहते थे कि एक बार मैं उस परिवार की परेशानी समझने का प्रयास करू, जिससे कि समस्या का समाधान हो।
मित्रों यहां पहले एक बात आपको अपने विषय मे बता दु की भूत-प्रेत उतारना मेरा काम नही है किंतु हां "आत्मा-परमात्मा,तंत्र-मंत्र,अध्यात्म-दर्शन "मेरा अध्यन का विषय होने के कारण ,ऐसी बहुत से घटनाओ को देखने समझने और सीखने का मुझे अवसर प्राप्त हुआ ।भूत प्रेतों के अस्तित्व को नकारा नहीं जा सकता सभी जाति धर्म के लोग कही ना कही इनकी उपस्थिति को स्वीकार करते है।मैंने अपने अध्ययन में भगवान-शैतान,भूत-प्रेत,देवी-देवता,सिद्ध-साधुओ की उपस्थिति स्वीकार किया है और इनकी बातो की सत्य होते भी पाया है।इस संबंध में एक घटना आपको बताना चाहूंगा कि
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2009 में नौरात्री के समय 125000 मंत्रो के जाप का संकल्प-अनुष्ठान मैंने प्रारम्भ किया था,अनुष्ठान के दौरान मैं नित्य किये जाप एवं हवन की संख्या को एक डायरी में लिखा करता था इसके अलावा किसी को भी इस बात की जानकारी नही रहती थी कि मैं कौन रुप मे ईश्वर को पूज रहा हूँ और कौन सा मंत्र कितनी बार जप चुका हूं।
अभी मैं नित्य जाप में 9200 मंत्र जाप तक पहुचा ही था कि,एक सज्जन जिनकी 17 वार्षिक कन्या ने 5 दिन से भोजन नहीं खाया और किसी से कुछ बातचीत नही करती सिर्फ छत और दिवालो को बहुत कम पलके झुकाए देखती रहती है।
संध्या 7 बजे के आस-पास मै उस कन्या के घर,उसके सामने खड़ा था।मैंने कन्या को प्रणाम किया और दो अगरबत्ती देवी के नाम से उसके सामने जला दी।अगरबत्ती जलने के मिनट भर बाद वो कन्या अपने बिस्तर से उठी और जमीन पे आ कर बैठ गई अपने गुंथे हुए बालों को उसने खोला और सिर को जोर-जोर से गोल घुमाने लगी।मेरे पूछने पर उसने बताया कि वो वही देवी है जिसके मंत्रो का मैं रोज जाप कर रहा हूँ और उस कन्या ने मेरे अभी तक किये जाप की संख्या भी बताई और मेरा संकल्प जाप करने का कारण भी ,जो सिर्फ मेरे ही ज्ञान म् था।देवी ने ये भी कहा था कि जब भी कोई मुझे आत्मा की आवाज से बुलायेगा तो मुझे किसी ना किसी रूप से उससे मिलने जाना ही होगा,बस उसके पास मुझे पहचाने की दृष्टि होनी चाहिए।देवी के अनुसार कन्या 5 दिन पहले दुर्गा जी के मंदिर गई थी तभी से वो उसके साथ है।
उसके बाद देवि ने उस परिवार के साथ-साथ मुझे भी आशीर्वाद दिआ और जाप निरंतर करने का आदेश दे कर ,करीब 16-17 मिनट के बाद वो चले गई ।
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तो चलते है तेलगु भूत के पास।संध्या के समय शर्मा जी के साथ मैं उस स्त्री के घर पहुचा,वहां देखता हूं कि बड़ा भारी माहौल बना हुआ है 10-12 लोग भी वहां नारियल-निम्बू उस स्त्री को चढ़ा रहे थे साथ ही साथ गुलाल ,सिंदूर आदि का टीका लगा रहे थे।मैंने उन्हें प्रणाम किया और कौन है वो उनसे पूछा।उन्होंने कोई जवाब भी नही दिया।उस स्त्री पे मंत्र-प्रार्थना का भी कोई असर नहीं होता था।बस उसने मुझे तेलगु मे बोलना शुरू की,मुझे उसकी भाषा समझ नही आ रही थी तो मैंने किसी से पूछा ये क्या कह रही है,तो उन्होंने कहा महाराज गाली दे रहीं है।
मैं वहां से घर आ गया।दो दिन एक स्वयं से विचार विमर्श कर मैं इस नतीजे पे पहुचा की उस स्त्री को कोई बाधा नही है।फिर ये प्रश्न भी मेरे भीतर उठने लगा कि वो स्त्री ऐसा काम क्यो कर रही है?
दो दिन बाद मैं उस स्त्री के घर पहुचा और उसको प्रणाम कर मैने उसके पति को कहा कि भाई तू एक काम कर एक "खराटा झाड़ू" ले ले, और देवि का नाम ले कर जब तक आज भूत ना उतर जाए तब तक झाड़ू चलाते रहना।करीब करीब 25 झाड़ू पड़े होंगे अभी की वो भूत भाग गया।
ऐसा पहली बार हुआ था कि भूत भागा था इसीलिए उस परिवार के लोग बहुत खुश थे।
इस घटना के 2 दिन बाद मुझे उस स्त्री ने फोन किया और अपनी परेशानी बताई ।उस स्त्री के अनुसार ,उसका मायका बिहार से है जब तक वो माता पिता के साथ रही आनंद में रही, अच्छी पढ़ाई की,अच्छे कपडे पहने और कोई रोक-टोक नही थी।और जब से शादी हुई है सिवाय रोक टोक के कुछ नही है।संयुक्त परिवार में रहना है दिन भर घूंघट में।पति के साथ कही आना जाना नही है जीवन मे प्रेम जैसा कुछ नही है।पति ही कि अपनी माता की बात पे विश्वास करता है मेरा कोई वजूद नही था।इसीलिए जब मैं पिछली बार बिहार गई तब एक बाबा जी महाराज से मिली थी उनकी अपनी परेशानी बताने से उन्होंने बताया कि कोई परेशानी की बात नही है।तुम सिर्फ रोज शाम को अपने पे भूत चढ़ा लिया करो,गाली-गलौज किया करो ,जिस-जिस पे घुस्सा आये उसे मारा करो।सब ठीक हो जाएगा।उस स्त्री ने वैसा ही किया और अब वह बहुत खुश है ना कोई काम बताता है ,ना डाँटता है,घूंघट का अब टेंशन ही नहीं ,घर की बाकी महिलाएं भूत ना पकड़ ले यह सोच कर खुद घूंघट में रहती है।घर मे जो भी भोजन बनता है सबसे पहले मुझे ही मिलता है ,जो पति कभी घूमने नही ले जाता था अब महीने में 4 या 5 बार मंदिर-मस्जिद घुमाने ले जाता है।सब कुछ सही चल रहा था मेरी जिंदगी में की आप आ गए ,पूरा किये कराए पे आपने पानी फेर दिया ।
मैंने पूछा और वो तेलगु भाषा और शराब?
स्त्री ने कहा महाराज ,अब 7 साल से तेलगु मोहल्ले में रह रहे है तो इतना तेलगु तो सिख ही गए है और शराब के बिना कॉन्फिडेंस पैदा नहीं होता,दो-चार गाली निकालते ही शराब हाजिर हो जाती है।
मैंने कहा धन्य है देवी!आप, अब ये बताओ कि मुझे क्यो फोन किया अपने।उसने कहा कि महाराज आप कृपया मेरे घर मे मत आना कृपा होगी बस।
मैंने कहा ठीक है मैं तुम्हारी बात मान लेटा हु किन्तु तुम्हे भी मेरी बात माननी पढ़ेगी।मैंने कहा तुम रोज रोज घर-मोहल्ले वालों को परेशान ना किया करो।
महीने में एक दिन अमावस्या को भूत चढ़ा लिया करो।अन्यथा मुझे आना होगा ।
वो स्त्री मेरी बात मान गईं, अब अमावस अमावस को ही भूत चढ़ता है।सब कुछ पहले जैसा ही है।
बस उस स्त्री के पति को मैंने एक उपाय बताया है कि घर के मुख्य दरवाजे के पास खड़ी अवस्था मे "खराटा झाड़ू"
रख दे ताकि उसकी पत्नी झाड़ू देखे संयम में रहे।
महिला मित्रों से निवेदन है इस पोस्ट को अन्यथा ना लेते हुए इसे सकारात्मक रूप से ले एवं इस विधि का उपयोग निजी रूप से ना करे।

व्यक्तिगत अनुभूति एवं।विचार©₂₀₁₇
।। राहुलनाथ।।™भिलाई,छत्तीसगढ़,भारत
पेज लिंक:-https://www.facebook.com/rahulnathosgybhilai/
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🚩🚩🚩जयश्री महाँकाल 🚩🚩🚩
इस लेख में वर्णित सभी नियम ,सूत्र एवं व्याख्याए,एवं तथ्य हमारी निजी अनुभूतियो के स्तर पर है अतः हमारी मौलिक संपत्ति है।विश्व में कही भी,किसी भी भाषा में ये इस रूप में उपलब्ध नहीं है।इसकी किसी भी प्रकार से चोरी,कॉप़ी-पेस्टिंग आदि में शोध का अतिलंघन समझ कार्यवाही की जायेगी।

चेतावनी-
हमारे लेखो को पढने के बाद पाठक उसे माने ,इसके लिए वे बाध्य नहीं है।हमारे हर लेख का उद्देश्य केवल प्रस्तुत विषय से संबंधित जानकारी प्रदान करना है।यहां वैदिक-साबर-तांत्रिक ग्रंथो एवं स्वयं के अभ्यास अनुभव के आधार पर कुछ मंत्र-तंत्र संभंधित पोस्ट दी जाती है जो हामरे पूर्वज ऋषि-मुनियों की धरोहर है इसे ज्ञानार्थ ही ले ।लेख को पढ़कर कोई भी प्रयोग बिना मार्ग दर्शन के न करे । किसी गंभीर रोग अथवा उसके निदान की दशा में अपने योग्य विशेषज्ञ से अवश्य परामर्श ले। साधको को चेतावनी दी जाती है की तंत्र-मंत्रादि की जटिल एवं पूर्ण विश्वास से  साधना सिद्धि गुरु मार्गदर्शन में होती है अतः बिना गुरु के निर्देशन के साधनाए ना करे।
बिना लेखक की लिखितअनुमति के लेख के किसी भी अंश का कॉपी-पेस्ट ,या कही भी प्रकाषित करना वर्जित है।न्यायलय क्षेत्र दुर्ग छत्तीसगढ़(©कॉपी राइट एक्ट 1957)

गुरुवार, 1 जून 2017

काला टिका,काला तंत्र,सुरक्षा माता की

काला टिका,काला तंत्र,सुरक्षा माता की
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याद करिए किसने सबसे पहले आपपे तंत्र किया था!
एक थाली में किसी के साथ भोजन खाना तंत्रानुसार मना है यदि किसी कारण वश भोजन खाना भी पड़े तो ,पहला एवं अंतिम निवाला स्वयं ग्रहण करे।
तंत्र अधिकतर प्रेम एवं ममता में ही किया जाता है
या शत्रुता में
याद करिए पहली बार किसने आपपे तंत्र किया था!
याद आया ?
नही ना????
याद दिलाने का प्रयास करता हूं।
याद करिए वो जन्म के बाद का पहला काला टिका,
जो आपकी माता ने आपके मुख मंडल पे पहली बार लगाया था इस आशा से की कही आपको नजर ना लग जाये।वो काला टिका क्या तंत्र नही था।।
हिंदुस्तान में तंत्र की शुरुआत विरासत में जन्म से प्राप्त होती है इससे चाहके भी बच पाना मुश्किल है।अब ये आपपे निर्भर करता है आप तंत्र का उपयोग सकारात्मक करते है जैसे माता ने किया था या नकारात्मक करते है।

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सोमवार, 29 मई 2017

नवार्ण मंत्र साधना द्वारा नवग्रह शांति

नवार्ण मंत्र साधना द्वारा नवग्रह शांति
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ज्योतिष का मुख्य आधार नवग्रह के ऊपर निर्भर करता है ये नवग्रह हमारे भीतर नव अलग अलग विचारो का निर्माण करते है जिसके अनुसार जीवन संचालित होता है इन नवग्रहों को पूर्ण रूप से नितंत्रित करने की शक्ति नवार्ण मंत्र में समाहित है।नवार्ण मंत्र के नित्य जाप पूजन से देवी के आशीर्वाद से नवग्रह जातक पर अपना सकारात्मक प्रभाव बनाये रखते है।नवार्ण मंत्र के किस अक्षर से कौन से ग्रह का नियंत्रण होता है इसका विवरण नीचे आपको दिया जा रहा है।

ऐं - शैलपुत्री-सूर्य ग्रह को नियंत्रित करने की शक्ति
ह्रीं - ब्रह्मचारिणी-चन्द्र ग्रह को नियंत्रित करने की शक्ति क्लीं -चंद्रघंटा-मंगल ग्रह को नियंत्रित करने की शक्ति
चा - कुष्मांडा-बुध ग्रह को नियंत्रित करने की शक्ति
मुं - स्कंदमाता-बृहस्पति ग्रह को नियंत्रित करने की शक्ति
डा-कात्यायनी-शुक्र ग्रह को नियंत्रित करने की शक्ति
यै-कालरात्रि -शनि ग्रह को नियंत्रित करने की शक्ति
वि -महागौरी-राहु ग्रह को नियंत्रित करने की शक्ति
चै -सिद्धीदात्री-केतु ग्रह को नियंत्रित करने की शक्ति समायी हुई है l

मां दुर्गा के नवरुपों की उपासना के मंत्र
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1. शैलपुत्री
वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम् ।
वृषारुढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम् ॥

2. ब्रह्मचारिणी
दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू ।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा ॥

3. चन्द्रघण्टा
पिण्डजप्रवरारुढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता ।
प्रसादं तनुते मह्यां चन्द्रघण्टेति विश्रुता ॥

4. कूष्माण्डा
सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च ।
दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे ॥

5. स्कन्दमाता
सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया ।
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी ॥

6. कात्यायनी
चन्द्रहासोज्वलकरा शार्दूलवरवाहना ।
कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी ॥

7. कालरात्रि एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता ।
लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी ॥
वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा ।
वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयङ्करी ॥

8. महागौरी
श्वेते वृषे समारुढा श्वेताम्बरधरा शुचिः ।
महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा ॥

9. सिद्धिदात्री
सिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि ।
सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी ॥

नवार्ण मंत्र साधना विधी:-

विनियोग:

ll ॐ अस्य श्रीनवार्णमंत्रस्य
ब्रम्हाविष्णुरुद्राऋषय:गायत्र्युष्णिगनुष्टुभश्छंन्दांसी,श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासर
स्वत्यो देवता: , ऐं बीजम , ह्रीं शक्ति: ,क्लीं कीलकम श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वत्यो देवता प्रीत्यर्थे जपे विनियोग: ll

विलोम बीज न्यास:-

ॐ च्चै नम: गूदे ।
ॐ विं नम: मुखे ।
ॐ यै नम: वाम नासा पूटे ।
ॐ डां नम: दक्ष नासा पुटे ।
ॐ मुं नम: वाम कर्णे ।
ॐ चां नम: दक्ष कर्णे ।
ॐ क्लीं नम: वाम नेत्रे ।
ॐ ह्रीं नम: दक्ष नेत्रे ।
ॐ ऐं ह्रीं नम: शिखायाम ॥

ब्रम्हारूप न्यास:-

ॐ ब्रम्हा सनातन: पादादी नाभि पर्यन्तं मां पातु ॥
ॐ जनार्दन: नाभेर्विशुद्धी पर्यन्तं नित्यं मां पातु ॥
ॐ रुद्र स्त्रीलोचन: विशुद्धेर्वम्हरंध्रातं मां पातु ॥
ॐ हं स: पादद्वयं मे पातु ॥
ॐ वैनतेय: कर इयं मे पातु ॥
ॐ वृषभश्चक्षुषी मे पातु ॥
ॐ गजानन: सर्वाड्गानी मे पातु ॥
ॐ सर्वानंन्द मयोहरी: परपरौ देहभागौ मे पातु ॥

माला पूजन
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“ऐं ह्रीं अक्षमालिकायै नंम:’’

ॐ मां माले महामाये सर्वशक्तिस्वरूपिनी ।
चतुर्वर्गस्त्वयि न्यस्तस्तस्मान्मे सिद्धिदा भव ॥
ॐ अविघ्नं कुरु माले त्वं गृहनामी दक्षिणे
करे । जपकाले च सिद्ध्यर्थ प्रसीद मम सिद्धये ॥
ॐ अक्षमालाधिपतये सुसिद्धिं देही देही सर्वमन्त्रार्थसाधिनी साधय साधय सर्वसिद्धिं परिकल्पय परिकल्पय मे स्वाहा।

ध्यान मंत्र
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खड्गमं चक्रगदेशुषुचापपरिघात्र्छुलं भूशुण्डीम शिर: शड्ख संदधतीं करैस्त्रीनयना सर्वाड्ग भूषावृताम ।
नीलाश्मद्दुतीमास्यपाददशकां सेवे महाकालीकां यामस्तौत्स्वपिते हरौ कमलजो हन्तुं मधु कैटभम ॥

नवार्ण मंत्र
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ll ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ll
******श्री दुर्गा सप्तशती अनुसार******
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।। राहुलनाथ ©₂₀₁₇।।™,भिलाई,छत्तीसगढ़,भारत
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शनिवार, 27 मई 2017

साबर रक्षा कवच-खुलजा सिम सिम -भाग३

साबर रक्षा कवच-खुलजा सिम सिम -भाग३
किसी भी प्रकार की साधना से पहले ,साधना स्थल को सुरक्षित कर लेने से ,साधना में व्यवधान उत्पन्न नही होते एवं एकाग्रता बनी रहती है।आसन में बैठते ही सर्व प्रथम गुरु को प्रणाम कर ,नीचे लिखे मंत्र का 21 बार जाप करके दसो दिशाओ में फूंक मारने से स्थान बंधन हो जाता है ।इस मंत्र का उपयोग करने से पहले गुरुपूर्णिमा,अमावस्या,दीपावली दशहरा आदि पर्वो पर इस मंत्र को 11111 बार जाप कर सिद्ध कर लेना चाहिए।एवं साधना सम्पन्न होने पे इस कवच को पुनः खोल कर वापस ,कवच के देवता के पास भेज देना चाहिए।पुनः आवश्यकता होने से आह्वाहन कर कार्य सम्पूर्ण होने पर वापस भेज देना चाहिए।कवच के आह्वाहन का मंत्र यहां दिया जा रहा है ।सभी कवचों को धारण करने एवं उतारने की एक विशेष विधि एवं मंत्र होता है।
आप कोई भी कवच धारण करे यदि उसको खोलना नही आता आपको तो आपका जीवन खतरे में पढ़ सकता है अतः कवच तभी धारण करे जब आपको इसका धारण एवं विसर्जन करने का शुद्ध मंत्र ज्ञात हो।इस अज्ञानता के कारण ही साधको को कष्ट का सामना करना पड़ता है।इस संबंध में इससे पूर्व "खुल जाए सिम सिम"नाम की पोस्ट में इसका विश्लेषण किया जा चुका है |"खुल जा सिम सिम" पढ़ने के लिए इस लिंक पे क्लिक करे
लिंक:-https://m.facebook.com/photo.php?fbid=488230004718792&id=100005953891679&set=t.100005953891679&source=42
किंतु आज इस पोस्ट में कुछ बाते गुप्त रखी गई है कारण मात्र ये है कि ,अभी कुछ दिनों पहले एक सज्जन आये थे उन्होंने मुझसे कहा कि क्या आपको कवच खोलने के विधि पता है मेरे हा कहने पे उन्होंने कहा-कितने पैसे लगेंगे?उन्होंने कहा कि उनके गुरुजी ने उनसे कहा है यदि कवच खोलना सीखना चाहते हो तो 10000 रु लगेंगे।उनके गुरु का नाम पूछने पे उन्होंने जो नाम बताया वो हमारी फेसबुक आई डी में हमारे मित्र है और हर पोस्ट पड़ते है लाइक कमेंट नही करते किन्तु हा मेरी पोस्ट से विधि पढ़ कर बेच सकते है।मित्रों आप कोई भी तंत्र की किताबें,लाल-काली किताब या किसी भी मंत्र शास्त्र में कवच खोलने का विधान नाही बताया गया है।ये मुझे स्वप्न के माध्यम से प्राप्त हुआ था।जगत कल्याण की भावना से ये विधि सभी को बताई गई थी,आज उसको मेरे मित्र ही बेच रहे है।इसी प्रकार एक मशहूर लेखक ने भी इस विधि को अपने नाम से प्रकाशित किया एवं बाद में क्षमा माँगी।
मित्रो नीचे दिया मंत्र मुझे बनारस से वापसी के दौरान एक श्री नाथ साधु महाराज ने मेरी सेवा से प्रसन्न हो कर मुझे प्रदान किया था और इसको सिद्ध करने की पूरी विधि बताई थी।यहां पोस्ट ज्ञानार्थ लिखी गई है जो भी व्यक्ति इस मंत्र को सिद्ध करना चाहता हो वो मुझसे निजी रूप से बात कर विधि प्राप्त कर सकता है।

।।मंत्र।।

ॐ आई काली पूरु सिद्धेश्वरी अवतर-अवतर स्वाहा .........ॐ दशांगुली भीन्दलि ।वीरूड हारी मैंरुण्ड-भैरवी विधाराणी । रोला बंद।मुष्टि बंद। बाण बंद ।कृत्य बंद। रूद्र बंद। नेख बंद ।ग्रह बंद। प्रेत बंद ।भूत बंद ।यक्ष बंद ।कंकाल बंद। बेताल बंद। आकाश बंद। पाताल बंध।पूर्व-पश्चिम-उत्तर-दक्षिण सर्व दिशा बंद।ये और ये आछि कह। हस हस अवतर-अवतर। दशा विप्रा-रानी दशांगुलि शातास्त्र बंदिनी।वैदसि हूँ फट् स्वाहा।।

व्यक्तिगत अनुभूति एवं।विचार©₂₀₁₇
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चेतावनी-हमारे हर लेख का उद्देश्य केवल प्रस्तुत विषय से संबंधित जानकारी प्रदान करना है लेख को पढ़कर कोई भी प्रयोग बिना मार्ग दर्शन के न करे । किसी गंभीर रोग अथवा उसके निदान की दशा में अपने योग्य विशेषज्ञ से अवश्य परामर्श ले। साधको को चेतावनी दी जाती है की वे बिना गुरु निर्देशन के साधनाए ना करे। यह केवल सुचना ही नहीं चेतावनी भी है।