बुधवार, 12 जुलाई 2017

मृत्यु के बाद -भाग 2

मृत्यु के बाद -भाग 2
पूर्ण मृत्यु के बाद भी,चाहे उनको जला दिया जाए,गाढ़ दिया जाए या फिर पंछियो को खिला दिया जाए फिर भी उनका कुछ अंश जैसे उनका नाम और सूरत शेष रह जाते है इनके द्वारा उन्हें पुनः बुला के संपर्क किया जा सकता है ।
व्यक्तिगत अनुभूति एवं विचार ©2017
राहुलनाथ,भिलाई
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क्रमशः

मृत्यु के बाद भाग -०१

मरा व्यक्ति किसी का सगा-संबंधी नही होता है वो मरने के बाद मरे लोगो को पसंद करने लगता है और मानवो का 90%शत्रु हो जाता है हा यदि आप किसी विधि द्वारा प्रसन्न कर सके तो,अपनी योनि की शक्ति के अनुसार वह आपकी सहायता कर सकता है।
व्यक्तिगत अनुभूति एवं विचार©2017
राहुलनाथ,भिलाई
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.क्रमशः

बारह राशियां एवं उनके भाग्यशाली मंत्र

https://youtu.be/rXj-fewUs5E

मंगलवार, 11 जुलाई 2017

श्रीयंत्र रहस्य

श्रीयंत्र रहस्य
आप चाहे जितना इसे हल्दी कुंकु चंदन लगा के पूजन कर लो या घीस लो ,गले मे लटका लो,तिजोरी में रख लो,ये अल्लादीन का चिराग नही है जो सब दे देगा।जब तक इसमे दिए गए दोनों त्रिकोण जो ,ऊपर और नीचे से आगे बढते है इनको मिलाने की विधि नही जान पाओगे कुछ प्राप्त नही होगा।स्मरण रहे ये दोनों त्रिकोण धन(+)एवं (-) के एवं पुरुष एवं स्त्री के प्रतीक है।
300 से 3000 तक मिलने वाले यंत्र से व्यक्ति धनपति या श्री पति बन जाता तो फिर हमारे देश मे गरीबी क्यो है ऐसे में तो रिक्शा वाला भी 2 या 3 दिन की रोजी बचाये तो वह इसे स्थापित कर ,धनपति बन सकता है क्या ऐसा हो रहा है?
   व्यक्तिगत अनुभूति एवं।विचार©₂₀₁₇
।।  राहुलनाथ।।™
भिलाई,छत्तीसगढ़,भारत
पेज लिंक:-https://www.facebook.com/rahulnathosgybhilai/
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चेतावनी:-इस लेख में वर्णित सभी नियम ,सूत्र एवं व्याख्याए,एवं तथ्य हमारी निजी अनुभूतियो के स्तर पर है जिसे मानने के लिए आप बाध्य नहीं है।अतः हमारी मौलिक संपत्ति है।विश्व में कही भी,किसी भी भाषा में ये इस रूप में उपलब्ध नहीं है|लेख को पढ़कर कोई भी प्रयोग बिना मार्ग दर्शन के न करे । तंत्र-मंत्रादि की जटिल एवं पूर्ण विश्वास से  साधना-सिद्धि गुरु मार्गदर्शन में होती है अतः बिना गुरु के निर्देशन के साधनाए ना करे।बिना लेखक की लिखितअनुमति के लेख के किसी भी अंश का कही भी प्रकाषित करना वर्जित है।न्यायलय क्षेत्र दुर्ग छत्तीसगढ़(©कॉपी राइट एक्ट 1957)
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उच्चिस्ट गणपति साधना


उच्चिस्ट गणपति साधन ।।
व्यवसाय एवं नौकरी के लिए अमोघ प्रयोग

मित्रों भगवान शिव एवं गौरी पुत्र भगवान गणपति समस्त विघ्नों का नाश करने वाले,सभी कार्यों में सिद्धि देने वाले, तथा जीवन में सभी प्रकार से सुख सम्पदा देने वाले हैं।शास्त्रो में “कलौ चंडी विनायको” इस वचन के द्वारा कहा है कि कलियुग में दुर्गा और गणेश ही पूर्ण सफलता देने वाले भगवान हैं……

तुलसीदासजी ने राम चरित मानस में कहा है कि—-
“जो सुमिरत सिद्धि होय, गण नायक करिवर वदन |
करउ अनुग्रह सोई, बुद्धि राशि शुभ गुण सदन ||”
भारत के ही नहीं वरन विश्व के सभी साधक अपने कार्यों और समस्त साधना में सिद्धि हेतु गणपति की साधना करते ही हैं…..
भक्तों एवं साधको को जीवन में एक बार ये साधना अवश्य करनी चाहिए।

।।।साधना विधि ।।
यह प्रयोग शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी से प्रारम्भ करे. यह प्रयोग दिन या रात्रि के समय कर सकते है.इस साधना में आपको रक्तवर्णी लाल वस्त्र,आसान,पुष्प,फल एवं मिष्ठान का उपयोग करना चाहिए।साधना काल में उत्तर की ओर मुख कर,अपनी इच्छानुसार वस्तु का सेवन करे 
जैसे:-
***किसी विशेष मनोकामना की पूर्णता के लिए सुपारी का प्रयोग करे।
***अन्न एवं धन-सम्पदा एवं नौकरी की प्राप्ति के लिए गुड़ का प्रयोग करे।
***सर्वसिद्धि के लिए मीठा पान(ताम्बूल)का प्रयोग करे।
***वशिकरण के लिए लौंग का प्रयोग करे।
एवं बिना पानी पिए या मुख शुद्धि के इस प्रयोग को प्रारम्भ करे।किन्तु मेरे गुरुदेव के कथनानुसार पूरी साधना में अपनी मनोकामना के अनुसार ,जो सामग्री बताई गई है वह मुख में लगातार रहनी चाहिए।

साधक सर्वप्रथम अपने समक्ष लकड़ी के तख्ते,चौरंग या बाजोट पर लाल रेशमी या साटन का वस्त्र बिछा दे।उस पर सवा मिट्ठी चावल को कुमकुम एवं गंगाजल मिलाकर रंगने के उपरान्त चौरंग पे एक ढेरी बनाए।उस चावल की ढ़ेरी के ऊपर सिद्ध प्राण प्रतिष्ठित नीम,सफ़ेद आक या रक्त चन्दन के अंगूठे के गणपति की स्थापना करे।नीम ,सफ़ेद आक या रक्त चन्दन के गणपति उपलब्ध ना होने की अवस्था में आप सिद्ध व प्राण-प्रतिष्ठित पारद गणपति विग्रह को स्थापित कर पूजन प्रारम्भ करना चाहिए।
।।गुरु पूजन।।
अब सर्वप्रथम सहस्त्रार स्थित श्री गुरुदेव के चरणों के विग्रह का ध्यान कर ,गुरु द्वारा प्रदत्त गुरु मंत्र का 108 बार जाप करना चाहिए।
गुरु मंत्र न होने की स्थिति में

गुरु ब्रह्मा गुरुर्विष्णु: गुरुदेव महेश्वर:।
गुरु साक्षात्परब्रह्म तस्मैश्री गुरुवे नम:।।
कह कर "श्री गुरुभ्यो नमः"इस मंत्र का जाप करना चाहिए।गुरु को प्रसाद स्वरूप केसर युक्त खीर का भोग निवेदन करना चाहिए।
।।गणपति पूजन विधि ।।
।।करन्यास।।
**क्षां अङ्गुष्ठाभ्यां नमः
**क्षीं तर्जनीभ्यां नमः
**ह्रीं सर्वानन्दमयि मध्यमाभ्यां नमः
**हूं अनामिकाभ्यां नमः
**कों कनिष्टकाभ्यां नमः
**कैं करतल करपृष्ठाभ्यां नमः

।।हृदयादिन्यास।।
**क्षां हृदयाय नमः
**क्षीं शिरसे स्वाहा
**ह्रीं शिखायै वषट्
**हूं कवचाय हूं
**कों नेत्रत्रयाय वौषट्
**कैं अस्त्राय फट्

।।श्री गणपति ध्यान तथा आवाहन।।
विघ्नेश्वराय वरदाय सुरप्रियाय,
लम्बोदराय सकलाय जगत्‌ हिताय ।
नागाननाय श्रुतियज्ञभूषिताय,
गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते ॥

ॐ भूर्भुवः स्वः गणपते !
इहागच्छ इहातिष्ठ सुप्रतिष्ठो भव
मम पूजा गृहाण !


गणानान्त्वा गणपति (गुँ) हवामहे
प्रियाणान्त्वा प्रियपति (गुँ) हवामहे
निधिनान्त्वा निधिपति (गुँ) हवामहे
वसो मम ।
आहमजानि गर्भधमात्वमजासि गर्भधम्‌ ॥

देवों के प्रिय विघ्ननियन्ता, लम्बोदर भव-भय हारी ।
गिरिजानन्दन देव गजानन, यज्ञ-विभूषित श्रुतिधारी ॥
मंगलकारी दुःख-विदारी, तेजोमय जय वरदायक ।
बार-बार जय नमस्कार, स्वीकार करो हे गणनायक ॥

देव आइये यहाँ बैठिये, पूजा को करिये स्वीकार ।
भूर्भुवः स्वः सुख समृद्धि के, खोल दीजिये मंगल द्वार ॥

गणनायक वर बुद्धि विधायक, सदा सहायक भय-भंजन ।
प्रियपति, अति प्रिय वस्तु प्रदायक, जगत्राता जन-मन-रंजन ॥
निधिपति, नव-निधियों के दाता, भाग्य-विधाता भव-भावन ।
श्रद्धा से हम करते सादर, देव! आपका आवाहन ॥
विश्व उदर में टिका आपके, विश्वरूप गणराज महान ।
सर्व शक्ति संचारक तारक, दो अपने स्वरूप का ज्ञान ॥

न्यास ,ध्यान एवं आह्वाहन के बाद साधक निम्न मन्त्र की २१ माला जाप करे. यह जाप साधक रक्त चन्दन की माला से या मूंगा की माला से करे.

।।मंत्र ।।

01. ॐ क्षां क्षीं ह्रीं हूं कों कैं फट् स्वाहा

02. ॐ ऐम् ह्रीं क्लीं हस्तिपिशाचिलिखे स्वाहा।।
(दोनों मंत्र में से किसी एक का ही प्रयोग करे)

जाप पूर्ण होने पर साधक इसी मन्त्र के द्वारा आम की लकड़ी से अग्नि प्रज्वलित कर 227 आहुति लाल चन्दन के बुरादे से प्रदान करे.इस प्रकार ये एक दिन का प्रयोग हुआ,ऐसा 21 दिन लगातार करे।रोज हवन नहीं होने की स्थिति में 21 वे दिन 4647 आहुतिया दे कर प्रयोग संपन्न करे।
यह प्रयोग मेरे गुरुदेव द्वारा मुझे 2003 में बताया गया था।धन,नाम ,सम्मान,व्यावसायिक एवं नौकरी की समस्या में यह प्रयोग अमोघ है।

व्यक्तिगत अनुभूति एवं विचार©2015
।। राहुलनाथ।।™
भिलाई,छत्तीसगढ़,भारत
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चेतावनी:-इस लेख में वर्णित सभी नियम ,सूत्र एवं व्याख्याए,एवं तथ्य हमारी निजी अनुभूतियो के स्तर पर है अतः हमारी मौलिक संपत्ति है।विश्व में कही भी,किसी भी भाषा में ये इस रूप में उपलब्ध नहीं है|लेख को पढ़कर कोई भी प्रयोग बिना मार्ग दर्शन के न करे । तंत्र-मंत्रादि की जटिल एवं पूर्ण विश्वास से साधना-सिद्धि गुरु मार्गदर्शन में होती है अतः बिना गुरु के निर्देशन के साधनाए ना करे।बिना लेखक की लिखितअनुमति के लेख के किसी भी अंश का कही भी प्रकाषित करना वर्जित है।न्यायलय क्षेत्र दुर्ग छत्तीसगढ़(©कॉपी राइट एक्ट 1957)
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शनिवार, 1 जुलाई 2017

रहस्य

रहस्य
"बंद है मुट्ठी लाख की,खुल गई तो खाक की"
सभी का कोई ना कोई राज (secret) होता है यदि राज सकारात्मक हो तो भविष्य में परिणाम सकारात्मक एवं नकारात्मक हो तो भविष्य में नकारात्मक परिणाम प्राप्त होते है इसी कारण वश आध्यात्मिक साधना-पूजा में गुप्तता का विधान है।इष्ट देव एवं मनोकामना की सिद्धि के लिए ,उनकी मूर्ति/फ़ोटो या लिखित मनोकामना को एकांत में भूमि में दबा देना चाहिए एवं इस रहस्य को पत्नी या मित्र तक को नही बताना चाहिए।
"जो इस रहस्य को समझ गया,तो मानो उसे कल्प वृक्ष मिल गया"

व्यक्तिगत अुभूति एवं विचार©2017
Rahulnath Osgy
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सूचना:-इस पोस्ट के किसी भी अंश का नकल copy करना गैर कानूनी होगा।

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शनिवार, 24 जून 2017

52 बावन वीर एवम वीर कंगन साधना

52 बावन वीर एवम वीर कंगन साधना
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वीर मूल रूप से भैरवी के अनुयायी होते है और भगवान भैरव की उपासना करके उनके गण कहलाते है जैसे भगवान भैरव महादेव महाकाल के गण है उसी प्रकार वीर भैरव के गण कहलाते है।भैरव भगवती काली के पुत्र है इसी कारण वीर देवी महाकाली के दूत भी कहलाते है ,जब भी आप शत्रु के सर्वनाश के लिए महाकाली का कोई अनुष्ठान करते है तो सर्वप्रथम शत्रु पर वीर चलाकर एक बार चेतावनी देने का विधान है इस चेतावनी के बाद ही काली की शक्ति शत्रु पे कार्य करती है।
वीर साधना का विधान बहुत ही गुप्त है वीर साधना 61 दिन तक एक कमरे में बंद हो कर करनी पड़ती है जहां साधक का मुख 61 दिन तक गुरु के अलावा कोई नही देख सकता ,साधना काल मे महाकाली एवं भैरव-हनुमान की प्रतिमा के अलावा 52 पुतलियों की आवश्यकता होती है।काला वस्त्र एवं आसान का उपयोग होता है इस साधना काल ने 61 दिन ,दाँतो को साफ करना,बाल काटना,बालो में तेल लगाना,नहाना,खाना खाने के बाद मुख शोधन करना,कपडे बदलना या धोना,नाखून-बाल काटना,नाक-कान साफ करना,झूठे बर्तनों को धोना,जिन बर्तनों में भोजन सामग्री बनाई जाती है उस बर्तन को धोना इत्यादि सब मना होता है।यह साधना स्मशान में ज्यादा फलीभूत होती है किंतु स्मशान में 61 दिन निरंतर साधना करना सामान्य साधको के लिए सुलभ नही होता ऐसे में साधको को स्मशान से मिट्टी या भस्म (नियम विधि)पूर्वक लाकर कमरे में स्थापित कर ,कमरे को स्मशान समझते हुए 61 दिन करनी होती है।इस साधना का एक गुप्त मंत्र है जिसमे 52 विरो के नाम का सम्बोधन किया जाता है उनका आह्वाहन किया जाता है ये साधना बहुत दुष्कर है सभी विरो का भोजन अलग अलग होता है और साधक को ये भोग स्वंय बनाकर देवताओ को अर्पित करना होता है।1994 में गुरुदेव के शिव शंकर नाथ जी के सानिध्य में इस साधना को मैंने किया था किंतु ये साधना उस समय सम्पूर्ण नही हो पाई थी जिस कमरे पे साधना की जा रही थी उस स्थान कमरे के पास रहने वाली दो कन्याओं पे अचानक देवियो का आवेश आ गया था और वो दोनों कन्याये पूजा स्थान पे पहुँच जाती थी और गालियां देती हुई कमरे के दरवाजों पे पत्थर इटे मारना शुरू कर देती थी इससे स्थानीय लोग भयभीत हो गए थे जिससे 43 दिन की साधना के उपरांत साधना को ठंडा करना पड़ा था कालांतर में गुरुदेव के समाधि लेने के बाद ,स्वप्न में गुरुदेव का आदेश मिलने पर 2007 में यह साधना भिलाई से 43 किलोमीटर दूर शिवनाथ नदी के तट पर सम्पन्न की गई थी।जिसमे सफलता प्राप्त हुई थी किन्तु बार-बार विरो को कार्य देने में सक्षम ना होने के कारण मैंने उनका विसर्जन इस वचन के साथ कर दिया था कि जब भी मैं उनका आह्वाहन करू उनको आना होगा ।
कुछ लोग इस साधना द्वारा वीर कंगन एवं वीर मुद्रिका का निर्माण कर विरो को कंगन या मुद्रिका में स्थान दे देते है किंतु इस कंगन को सम्हालना सबके बस की बात नही होती है।इन साधनाओ को करने के बाद मैंने जाना कि इन साधनाओ से लाभ कम समाज की हानि ज्यादा है क्योंकि यहां सहायता के लिए साधना कौन करता है सभी का कोई ना कोई स्वार्थ ही होता है।
चामुंडा जी के सेवक इस साधना को आसानी से कर सकते है।
ये पूर्ण रूप से तांत्रिक शाक्त मत की साधना है तांत्रिको को इसमे सफलता प्राप्त होती है।इस साधना को करने के पूर्व साधक को गुरु के शरण मे रहकर शक्तिशाली शरीर रक्षा मंत्र को सिद्ध करना होता है इस शरीर रक्षा कि सिद्धि पहले ही 43 दिन में कर लेनी चाहिए ,शरीर रक्षा के लिए मैंने गुरु मुख से प्राप्त "साबर लक्ष्मण रेखा मंत्र" का प्रयोग किया था जो लक्ष्मण जी ने सीता जी की सुरक्षा के लिए उपयोग किया था जिसको तोड़ पाना महाप्रतापी रावण के बस में भी नही था।इस साधना को एक बार सिद्ध करने के बाद समाज के कल्याणार्थ बहुत से वीर कंगन या मुद्रिका बनाई जा सकती है इसमें सामग्री कोई ज्यादा मूल्यवान नही होती किन्तु मूल्य 61 दिन के समय एवं जोखिम का हो सकता है।
साधक चाहे तो गुरु आदेश से एक-एक वीर की 7 दिवसीय साधना भी कर के भी सिद्धि प्राप्त कर सकता है किंतु ऐसे में सवा वर्ष का समय लगता है और सवा वर्ष नियम पालन करना सबके बस की बात नही होती।

52 विरो के नाम
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स्थान एवं जाती भेद के अनुसार इनके नामो में भेद हो सकता है।
01. क्षेत्रपाल वीर
02. कपिल वीर
03. बटुक वीर
04. नृसिंह वीर
05. गोपाल वीर
06. भैरव वीर
07. गरूढ़ वीर
08. महाकाल वीर
09. काल वीर
10. स्वर्ण वीर 
11. रक्तस्वर्ण वीर
12. देवसेन वीर
13. घंटापथ वीर 
14....रुद्रवीर
15. तेरासंघ वीर 
16. वरुण वीर 
17. कंधर्व वीर
18. हंस वीर 
19. लौन्कडिया वीर
20. वहि वीर 
21. प्रियमित्र वीर 
22. कारु वीर
23. अदृश्य वीर 
24. वल्लभ वीर
25. वज्र वीर 
26. महाकाली वीर   
27. महालाभ वीर 
28. तुंगभद्र वीर 
29. विद्याधर वीर
30. घंटाकर्ण वीर 
31. बैद्यनाथ वीर 
32. विभीषण वीर
33. फाहेतक वीर
34. पितृ वीर
35. खड्‍ग वीर 
36. नाघस्ट वीर 
37. प्रदुम्न वीर
38. श्मशान वीर 
39...भरुदग वीर 
40. काकेलेकर वीर 
41. कंफिलाभ वीर
42. अस्थिमुख वीर
43. रेतोवेद्य वीर 
44. नकुल वीर 
45. शौनक वीर 
46. कालमुख 
47. भूतबैरव वीर 
48. पैशाच वीर 
49. त्रिमुख वीर 
50. डचक वीर 
51. अट्टलाद वीर
52. वासमित्र वीर  
(इस पोस्ट में 52 विरो का नामो का संकलन किया गया है)

   व्यक्तिगत अनुभूति एवं।विचार©₂₀₁₇
।। महाकाल राहुलनाथ।।™
भिलाई,छत्तीसगढ़,भारत
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