गुरुवार, 14 जुलाई 2022

आपके प्रश्न

आपके प्रश्न
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मुझे ख़ुशी है इस बात की ,इतनी भूख तो अभी भी बाकी है मित्रों ज्ञान की।।जहाँ प्रश्न होता है वहा उत्तर भी होता है और उत्तर न होने की अवस्था में ,फिर एक बार ,एक नई खोज प्रारम्भ हो जाती है।
धन्य है आप एवं आपके प्रश्न जो बार बार एक नई खोज के लिए प्रोत्साहित करते है।
🕉️🙏🏻🚩आदेश-जयश्री माहाँकाल 🚩🙏🏻🕉️

👉व्यक्तिगत अनुभूति एवं विचार©२०१७
☯️।।राहुलनाथ।।™🖋️।....भिलाई,३६गढ़,भारत
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भगवान श्री राम के संस्कृत श्लोक एवं मंत्र संग्रह

भगवान श्री राम के संस्कृत श्लोक एवं मंत्र संग्रह
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एक श्लोकी रामायण 
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आदौ राम तपोवनादि गमनं, हत्वा मृगं कांचनम्।
वैदीहीहरणं जटायुमरणं, सुग्रीवसंभाषणम्।।
बालीनिर्दलनं समुद्रतरणं, लंकापुरीदाहनम्।
पश्चाद्‌ रावण कुम्भकर्ण हननम्‌, एतद्धि रामायणम्।।

भावार्थ
श्रीराम वनवास गए, वहां उन्होने स्वर्ण मृग का वध किया। रावण ने सीताजी का हरण कर लिया, जटायु रावण के हाथों मारा गया। श्रीराम और सुग्रीव की मित्रता हुई। श्रीराम ने बालि का वध किया। समुद्र पार किया। लंका का दहन किया। इसके बाद रावण और कुंभकर्ण का वध किया।

श्री राम वंदना श्लोक 
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लोकाभिरामं रणरंगधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम्।
कारुण्यरूपं करुणाकरं तं श्रीरामचन्द्रं शरणं प्रपद्ये।।
मैं सम्पूर्ण लोकों में सुन्दर तथा रणक्रीडा में धीर, कमलनेत्र, रघुवंश नायक, करुणाकी मूर्ति और करुणा के भण्डार रुपी श्रीराम की शरण में हूं।

श्री राम गायत्री मंत्र 
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ॐ दाशरथये विद्महे जानकी वल्लभाय धी महि॥ तन्नो रामः प्रचोदयात्।।

भावार्थ

ॐ, दशरथ के पुत्र का ध्यान करें, माता सीता की सहमति, आज्ञा से मुझे उच्च बुद्धि और शक्ति दें, भगवान् श्री राम मेरे मस्तिस्क को  बुद्धि और तेज़ से प्रकाशित करें, बुद्धि और तेज प्रदान करें।

श्री राम ध्यान मंत्र 
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ॐ आपदामप हर्तारम दातारं सर्व सम्पदाम, लोकाभिरामं श्री रामं भूयो भूयो नामाम्यहम।
श्री रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे, रघुनाथाय नाथाय सीताया पतये नमः।।

श्री रामाष्टक 
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हे रामा पुरुषोत्तमा नरहरे नारायणा केशवा।
गोविन्दा गरुड़ध्वजा गुणनिधे दामोदरा माधवा।।
हे कृष्ण कमलापते यदुपते सीतापते श्रीपते।
बैकुण्ठाधिपते चराचरपते लक्ष्मीपते पाहिमाम्।।

राम पर श्लोक
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श्री राम का पाठ करने वाले हर साधक को जीवन में आने वाले कष्टों से राहत मिलती है। भगवान राम के आशीर्वाद साथ साथ हनुमान जी की भी कृपा बनी रहती है। हमने यहाँ पर हर परिस्थितियों के लिए राम पर श्लोक दिए है। जिसके रोजाना पढ़न से आपके जीवन के सारे कष्ट दूर होंगे।

सौभाग्य और सुख प्राप्ति मंत्र:
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श्री राम जय राम जय जय राम। श्री रामचन्द्राय नमः।
राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे।
सहस्त्र नाम तत्तुन्यं राम नाम वरानने।।

गरीबी/दरिद्रता निवारण मंत्र:
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अतिथि पूज्य प्रियतम पुरारि के।
कामद धन दारिद दवारि के।।

सफलता के लिए मंत्र:
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” ॐ राम ॐ राम ॐ राम ह्रीं राम ह्रीं राम श्रीं राम श्रीं राम – क्लीं राम क्लीं राम। फ़ट् राम फ़ट् रामाय नमः ।

धन-प्राप्ति मंत्र:
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जिमि सरिता सागर महुँ जाही। जद्यपि ताहि कामना नाहीं।।
तिमि सुख संपति बिनहिं बोलाएँ। धरमसील पहिं जाहिं सुभाएँ।।

अकाल मृत्यु निवारण मंत्र:
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|| नाम पाहरु दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट ||

|| लोचन निजपद जंत्रित जाहि प्राण केहि बाट ||

संतान प्राप्ति मंत्र:
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प्रेम मगन कौसल्या निसिदिन जात न जान।
सुत सनेह बस माता बालचरित कर गान।।
लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहि बाट।।

श्री राम तारक मंत्र:
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ॐ जानकीकांत तारक रां रामाय नमः।।

तारक मंत्र
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श्री राम, जय राम, जय जय राम।।

श्री राम संस्कृत श्लोक 
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जे सकाम नर सुनहि जे गावहीं।
सुख सम्पति नाना बिधि पावहिं।।

कवन सो काज कठिन जग माहीं। 
जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं।।
राम काज लगि तव अवतारा। 
सुनतहिं भयउ पर्बताकारा।।

हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम।
राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम।।

श्री राम मूल मंत्र 
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ॐ ह्रां ह्रीं रां रामाय नम:।।

श्री राम सरल श्लोक 
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श्री राम शरणं मम्।

श्रीं राम श्रीं राम।

ॐ राम ॐ राम ॐ राम।

क्लीं राम क्लीं राम।

रामाय नमः।

ॐ रामाय हुँ फ़ट् स्वाहा।

ॐ श्री रामचन्द्राय नमः।

ह्रीं राम ह्रीं राम।

श्री राम जय राम जय जय राम।

श्री रामचन्द्राय नमः।

राम राम राम राम रामाय राम।
(संकलित पोस्ट)

🕉️🙏🏻🚩आदेश-जयश्री माहाँकाल 🚩🙏🏻🕉️
☯️राहुलनाथ™ 🖋️....
ज्योतिषाचार्य,भिलाई'३६गढ़,भारत
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#आपके_हितार्थ_नोट:- पोस्ट ज्ञानार्थ एवं शैक्षणिक उद्देश्य हेतु ग्रहण करे।बिना गुरु या मार्गदर्शक के निर्देशन के साधनाए या प्रयोग ना करे।





सोमवार, 16 मई 2022

हनुमान_तांडव_स्त्रोत

||  #हनुमान_तांडव_स्त्रोत ||

वन्दे सिन्दूरवर्णाभं लोहिताम्बरभूषितम् ।
रक्ताङ्गरागशोभाढ्यं शोणापुच्छं कपीश्वरम्॥
 भजे समीरनन्दनं, सुभक्तचित्तरञ्जनं, 
दिनेशरूपभक्षकं, समस्तभक्तरक्षकम् ।
सुकण्ठकार्यसाधकं, विपक्षपक्षबाधकं, 
समुद्रपारगामिनं, नमामि सिद्धकामिनम् ॥ १॥

 
सुशङ्कितं सुकण्ठभुक्तवान् हि यो 
हितं वचस्त्वमाशु धैर्य्यमाश्रयात्र वो भयं कदापि न ।
इति प्लवङ्गनाथभाषितं निशम्य वानराऽधिनाथ 
आप शं तदा, स रामदूत आश्रयः ॥ २॥
 
सुदीर्घबाहुलोचनेन, पुच्छगुच्छशोभिना, 
भुजद्वयेन सोदरीं निजांसयुग्ममास्थितौ ।
कृतौ हि कोसलाधिपौ, कपीशराजसन्निधौ, 
विदहजेशलक्ष्मणौ, स मे शिवं करोत्वरम् ॥ ३॥
 
सुशब्दशास्त्रपारगं, विलोक्य रामचन्द्रमाः, 
कपीश नाथसेवकं, समस्तनीतिमार्गगम् ।
प्रशस्य लक्ष्मणं प्रति, प्रलम्बबाहुभूषितः 
कपीन्द्रसख्यमाकरोत्, स्वकार्यसाधकः प्रभुः ॥ ४॥
 
प्रचण्डवेगधारिणं, नगेन्द्रगर्वहारिणं, फणीशमातृगर्वहृद्दृशास्यवासनाशकृत् ।
विभीषणेन सख्यकृद्विदेह जातितापहृत्, 
सुकण्ठकार्यसाधकं, नमामि यातुधतकम् ॥ ५॥
 
नमामि पुष्पमौलिनं, सुवर्णवर्णधारिणं 
गदायुधेन भूषितं, किरीटकुण्डलान्वितम् ।
सुपुच्छगुच्छतुच्छलंकदाहकं सुनायकं विपक्षपक्षराक्षसेन्द्र-सर्ववंशनाशकम् ॥ ६॥
 
रघूत्तमस्य सेवकं नमामि लक्ष्मणप्रियं 
दिनेशवंशभूषणस्य मुद्रीकाप्रदर्शकम् ।
विदेहजातिशोकतापहारिणम् प्रहारिणम् 
सुसूक्ष्मरूपधारिणं नमामि दीर्घरूपिणम् ॥ ७॥
 
नभस्वदात्मजेन भास्वता त्वया कृता महासहा 
यता यया द्वयोर्हितं ह्यभूत्स्वकृत्यतः ।
सुकण्ठ आप तारकां रघूत्तमो विदेहजां 
निपात्य वालिनं प्रभुस्ततो दशाननं खलम् ॥ ८॥
 
इमं स्तवं कुजेऽह्नि यः पठेत्सुचेतसा नरः
कपीशनाथसेवको भुनक्तिसर्वसम्पदः ।
प्लवङ्गराजसत्कृपाकताक्षभाजनस्सदा
न शत्रुतो भयं भवेत्कदापि तस्य नुस्त्विह ॥ ९॥
 
नेत्राङ्गनन्दधरणीवत्सरेऽनङ्गवासरे ।
लोकेश्वराख्यभट्टेन हनुमत्ताण्डवं कृतम् ॥ १०॥
 
ॐ इति श्री हनुमत्ताण्डव स्तोत्रम्॥

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ज्योतिषाचार्य,भिलाई'३६गढ़,भारत

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शनिवार, 14 मई 2022

श्रीसूर्यस्तुति_आदित्यह्रदय_स्तोत्र_सूर्यस्तोत्र_श्रीसूर्यचालीसा

#श्रीसूर्यस्तुति_आदित्यह्रदय_स्तोत्र_सूर्यस्तोत्र_श्रीसूर्यचालीसा
★★★★★★★★★★★★★★★★★★★★★★★
#श्रीसूर्य_स्तुति
★★★★★★★
 जय कश्यप-नन्दन, ॐ जय अदिति नन्दन ।।
 त्रिभुवन-तिमिर-निकन्दन, भक्त-हृदय-चन्दन॥
 जय कश्यप-नन्दन, ॐ जय अदिति नन्दन।।
 सप्त-अश्वरथ राजित, एक चक्रधारी।
 दु:खहारी, सुखकारी, मानस-मल-हारी॥
 जय कश्यप-नन्दन, ॐ जय अदिति नन्दन।।
 सुर-मुनि-भूसुर-वन्दित, विमल विभवशाली।
 अघ-दल-दलन दिवाकर, दिव्य किरण माली॥
जय कश्यप-नन्दन, ॐ जय अदिति नन्दन।।सकल-सुकर्म-प्रसविता, सविता शुभकारी।
विश्व-विलोचन मोचन, भव-बन्धन भारी॥
जय कश्यप-नन्दन, ॐ जय अदिति नन्दन।।
कमल-समूह विकासक, नाशक त्रय तापा।
सेवत साहज हरत अति मनसिज-संतापा॥
जय कश्यप-नन्दन, ॐ जय अदिति नन्दन।।
नेत्र-व्याधि हर सुरवर, भू-पीड़ा-हारी।
वृष्टि विमोचन संतत, परहित व्रतधारी॥
जय कश्यप-नन्दन, ॐ जय अदिति नन्दन।।
सूर्यदेव करुणाकर, अब करुणा कीजै।
हर अज्ञान-मोह सब, तत्वज्ञान दीजै॥
जय कश्यप-नन्दन, ॐ जय अदिति नन्दन।। 

#आदित्यह्रदय_स्तोत्र
★★★★★★★★★

ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम्‌ । 
रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम्‌ ॥1॥
दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम्‌ । 
उपगम्याब्रवीद् राममगस्त्यो भगवांस्तदा ॥2॥
राम राम महाबाहो श्रृणु गुह्मं सनातनम्‌ । 
येन सर्वानरीन्‌ वत्स समरे विजयिष्यसे ॥3॥
आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम्‌ । 
जयावहं जपं नित्यमक्षयं परमं शिवम्‌ ॥4॥
सर्वमंगलमागल्यं सर्वपापप्रणाशनम्‌ । चिन्ताशोकप्रशमनमायुर्वर्धनमुत्तमम्‌ ॥5॥
रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम्‌ । 
पुजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम्‌ ॥6॥
सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावन: । एष देवासुरगणांल्लोकान्‌ पाति गभस्तिभि: ॥7॥
एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिव: स्कन्द: प्रजापति: । 
महेन्द्रो धनद: कालो यम: सोमो ह्यापां पतिः ॥8॥
पितरो वसव: साध्या अश्विनौ मरुतो मनु: । 
वायुर्वहिन: प्रजा प्राण ऋतुकर्ता प्रभाकर: ॥9॥
आदित्य: सविता सूर्य: खग: पूषा गभस्तिमान्‌ । 
सुवर्णसदृशो भानुर्हिरण्यरेता दिवाकर: ॥10॥
हरिदश्व: सहस्त्रार्चि: सप्तसप्तिर्मरीचिमान्‌ । 
तिमिरोन्मथन: शम्भुस्त्वष्टा मार्तण्डकोंऽशुमान्‌ ॥11॥
हिरण्यगर्भ: शिशिरस्तपनोऽहस्करो रवि: । 
अग्निगर्भोऽदिते: पुत्रः शंखः शिशिरनाशन: ॥12॥
व्योमनाथस्तमोभेदी ऋग्यजु:सामपारग: । 
घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथीप्लवंगमः ॥13॥
आतपी मण्डली मृत्यु: पिगंल: सर्वतापन:। 
कविर्विश्वो महातेजा: रक्त:सर्वभवोद् भव: ॥14॥
नक्षत्रग्रहताराणामधिपो विश्वभावन: । 
तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन्‌ नमोऽस्तु ते ॥15॥
नम: पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नम: । 
ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नम: ॥16॥
जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नम: । 
नमो नम: सहस्त्रांशो आदित्याय नमो नम: ॥17॥
नम उग्राय वीराय सारंगाय नमो नम: । 
नम: पद्मप्रबोधाय प्रचण्डाय नमोऽस्तु ते ॥18॥
ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सुरायादित्यवर्चसे । 
भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नम: ॥19॥
तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने । 
कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नम: ॥20॥
तप्तचामीकराभाय हरये विश्वकर्मणे । 
नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे ॥21॥
नाशयत्येष वै भूतं तमेष सृजति प्रभु: । 
पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभि: ॥22॥
एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठित: । 
एष चैवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम्‌ ॥23॥
देवाश्च क्रतवश्चैव क्रतुनां फलमेव च । 
यानि कृत्यानि लोकेषु सर्वेषु परमं प्रभु: ॥24॥
एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च । 
कीर्तयन्‌ पुरुष: कश्चिन्नावसीदति राघव ॥25॥
पूजयस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगप्ततिम्‌ । 
एतत्त्रिगुणितं जप्त्वा युद्धेषु विजयिष्यसि ॥26॥
अस्मिन्‌ क्षणे महाबाहो रावणं त्वं जहिष्यसि । 
एवमुक्ता ततोऽगस्त्यो जगाम स यथागतम्‌ ॥27॥
एतच्छ्रुत्वा महातेजा नष्टशोकोऽभवत्‌ तदा ॥ 
धारयामास सुप्रीतो राघव प्रयतात्मवान्‌ ॥28॥
आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वेदं परं हर्षमवाप्तवान्‌ । 
त्रिराचम्य शूचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान्‌ ॥29॥
रावणं प्रेक्ष्य हृष्टात्मा जयार्थं समुपागतम्‌ । 
सर्वयत्नेन महता वृतस्तस्य वधेऽभवत्‌ ॥30॥
अथ रविरवदन्निरीक्ष्य रामं मुदितमना: परमं प्रहृष्यमाण: । निशिचरपतिसंक्षयं विदित्वा सुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति ॥31॥
।।सम्पूर्ण ।।

#सूर्यस्तोत्र
★★★★★
 
विकर्तनो विवस्वांश्च मार्तण्डो भास्करो रविः।
लोक प्रकाशकः श्री मांल्लोक चक्षुर्मुहेश्वरः॥
लोकसाक्षी त्रिलोकेशः कर्ता हर्ता तमिस्रहा।
तपनस्तापनश्चैव शुचिः सप्ताश्ववाहनः॥
गभस्तिहस्तो ब्रह्मा च सर्वदेवनमस्कृतः।

#सूर्यकवचम'
 
याज्ञवल्क्य उवाच-
 
श्रणुष्व मुनिशार्दूल सूर्यस्य कवचं शुभम्।
शरीरारोग्दं दिव्यं सव सौभाग्य दायकम्।1।
याज्ञवल्क्यजी बोले- हे मुनि श्रेष्ठ! सूर्य के शुभ कवच को सुनो, जो शरीर को आरोग्य देने वाला है तथा संपूर्ण दिव्य सौभाग्य को देने वाला है।

देदीप्यमान मुकुटं स्फुरन्मकर कुण्डलम।
ध्यात्वा सहस्त्रं किरणं स्तोत्र मेततु दीरयेत् ।2।
चमकते हुए मुकुट वाले डोलते हुए मकराकृत कुंडल वाले हजार किरण (सूर्य) को ध्यान करके यह स्तोत्र प्रारंभ करें।

शिरों में भास्कर: पातु ललाट मेडमित दुति:।
नेत्रे दिनमणि: पातु श्रवणे वासरेश्वर: ।3।
 
मेरे सिर की रक्षा भास्कर करें, अपरिमित कांति वाले ललाट की रक्षा करें। नेत्र (आंखों) की रक्षा दिनमणि करें तथा कान की रक्षा दिन के ईश्वर करें।
 
ध्राणं धर्मं धृणि: पातु वदनं वेद वाहन:।
जिव्हां में मानद: पातु कण्ठं में सुर वन्दित: ।4।
 
मेरी नाक की रक्षा धर्मघृणि, मुख की रक्षा देववंदित, जिव्हा की रक्षा मानद् तथा कंठ की रक्षा देव वंदित करें।
 
सूर्य रक्षात्मकं स्तोत्रं लिखित्वा भूर्ज पत्रके।
दधाति य: करे तस्य वशगा: सर्व सिद्धय: ।5।
 
सूर्य रक्षात्मक इस स्तोत्र को भोजपत्र में लिखकर जो हाथ में धारण करता है तो संपूर्ण सिद्धियां उसके वश में होती हैं।
 
सुस्नातो यो जपेत् सम्यग्योधिते स्वस्थ: मानस:।
सरोग मुक्तो दीर्घायु सुखं पुष्टिं च विदंति ।6।
 
स्नान करके जो कोई स्वच्छ चित्त से कवच पाठ करता है वह रोग से मुक्त हो जाता है, दीर्घायु होता है, सुख तथा यश प्राप्त होता है।
 

#श्रीसूर्य_चालीसा
दोहा
 
कनक बदन कुंडल मकर, मुक्ता माला अंग।
पद्मासन स्थित ध्याइए, शंख चक्र के संग।।
 
#चौपाई
 
जय सविता जय जयति दिवाकर, सहस्रांशु सप्ताश्व तिमिरहर।
भानु, पतंग, मरीची, भास्कर, सविता, हंस, सुनूर, विभाकर।
 
विवस्वान, आदित्य, विकर्तन, मार्तण्ड, हरिरूप, विरोचन।
अम्बरमणि, खग, रवि कहलाते, वेद हिरण्यगर्भ कह गाते।
सहस्रांशु, प्रद्योतन, कहि कहि, मुनिगन होत प्रसन्न मोदलहि।
अरुण सदृश सारथी मनोहर, हांकत हय साता चढ़ि रथ पर।
मंडल की महिमा अति न्यारी, तेज रूप केरी बलिहारी।
उच्चैश्रवा सदृश हय जोते, देखि पुरन्दर लज्जित होते।
 
मित्र, मरीचि, भानु, अरुण, भास्कर, सविता,
सूर्य, अर्क, खग, कलिहर, पूषा, रवि,
आदित्य, नाम लै, हिरण्यगर्भाय नमः कहिकै।
द्वादस नाम प्रेम सो गावैं, मस्तक बारह बार नवावै।
चार पदारथ सो जन पावै, दुख दारिद्र अघ पुंज नसावै।
नमस्कार को चमत्कार यह, विधि हरिहर कौ कृपासार यह।
 
सेवै भानु तुमहिं मन लाई, अष्टसिद्धि नवनिधि तेहिं पाई।
बारह नाम उच्चारन करते, सहस जनम के पातक टरते।
उपाख्यान जो करते तवजन, रिपु सों जमलहते सोतेहि छन।
छन सुत जुत परिवार बढ़तु है, प्रबलमोह को फंद कटतु है।
अर्क शीश को रक्षा करते, रवि ललाट पर नित्य बिहरते।
सूर्य नेत्र पर नित्य विराजत, कर्ण देश पर दिनकर छाजत।
 
भानु नासिका वास करहु नित, भास्कर करत सदा मुख कौ हित।
ओठ रहैं पर्जन्य हमारे, रसना बीच तीक्ष्ण बस प्यारे।
कंठ सुवर्ण रेत की शोभा, तिग्मतेजसः कांधे लोभा।
पूषा बाहु मित्र पीठहिं पर, त्वष्टा-वरुण रहम सुउष्णकर।
युगल हाथ पर रक्षा कारन, भानुमान उरसर्मं सुउदरचन।
बसत नाभि आदित्य मनोहर, कटि मंह हंस, रहत मन मुदभर।
 
जंघा गोपति, सविता बासा, गुप्त दिवाकर करत हुलासा।
विवस्वान पद की रखवारी, बाहर बसते नित तम हारी।
सहस्रांशु, सर्वांग सम्हारै, रक्षा कवच विचित्र विचारे।
अस जोजजन अपने न माहीं, भय जग बीज करहुं तेहि नाहीं।
दरिद्र कुष्ट तेहिं कबहुं न व्यापै, जोजन याको मन मंह जापै।
अंधकार जग का जो हरता, नव प्रकाश से आनन्द भरता।
 
ग्रह गन ग्रसि न मिटावत जाही, कोटि बार मैं प्रनवौं ताही।
मन्द सदृश सुतजग में जाके, धर्मराज सम अद्भुत बांके।
धन्य-धन्य तुम दिनमनि देवा, किया करत सुरमुनि नर सेवा।
भक्ति भावयुत पूर्ण नियम सों, दूर हटत सो भव के भ्रम सों।
परम धन्य सो नर तनधारी, हैं प्रसन्न जेहि पर तम हारी।
अरुण माघ महं सूर्य फाल्गुन, मध वेदांगनाम रवि उदय।
 
भानु उदय वैसाख गिनावै, ज्येष्ठ इन्द्र आषाढ़ रवि गावै।
यम भादों आश्विन हिमरेता, कातिक होत दिवाकर नेता।
अगहन भिन्न विष्णु हैं पूसहिं, पुरुष नाम रवि हैं मलमासहिं।
 
#दोहा
******
भानु चालीसा प्रेम युत, गावहिं जे नर नित्य।
सुख सम्पत्ति लहै विविध, होंहि सदा कृतकृत्य।।

#सूर्य_के_12_नाम
*****************
1- ॐ सूर्याय नम:।
2- ॐ मित्राय नम:।
3- ॐ रवये नम:।
4- ॐ भानवे नम:।
5- ॐ खगाय नम:।
6- ॐ पूष्णे नम:।
7- ॐ हिरण्यगर्भाय नम:।
8- ॐ मारीचाय नम:।
9- ॐ आदित्याय नम:।
10- ॐ सावित्रे नम:।
11- ॐ अर्काय नम:।
12- ॐ भास्कराय नम:।  

#सूर्य_के_रथ_को_खींचने_वाले_सात_घोड़ो_के_नाम
★★★★★★★★★★★★★★★★★★★★★
सूर्य देव हर सुबह अपने रथ पर सवार होकर पूर्व दिशा से दिन का प्रकाश लेकर आते हैं। पुराणों में बताया गया है कि सूर्य देव के रथ के सारथी #अरुण हैं। अरुण भगवान #विष्णु के वाहन #गरुड़ के भाई हैं।

ऋग्वेद में कहा गया है कि 
'सप्तयुज्जंति रथमेकचक्रमेको अश्वोवहति सप्तनामा' 
यानी सूर्य चक्र वाले रथ पर सवार होते हैं जिसे सात नामों वाले घोड़े खींचते हैं।पुराणों में उल्लेख मिलता है कि सूर्य के रथ में जुते हुए घोड़े के नाम हैं 
०१-गायत्री, 
०२-3वृहति, 
०३-उष्णिक, 
०४-जगती, 
०५-त्रिष्टुप, 
०६-अनुष्टुप और 
०७-पंक्ति।' 
यह सात नाम सात छंद हैं। यानी सात छंत हैं जो अश्व रुप में सूर्य के रथ को खींचते हैं।

#सूर्य_के_सात_शक्तिशाली_मंत्र
★★★★★★★★★★★★★
०१-ॐ घृ‍णिं सूर्य्य: आदित्य:
०२-ॐ ह्रीं ह्रीं सूर्याय सहस्रकिरणराय मनोवांछित 
      फलम् देहि देहि स्वाहा.
०३-ॐ ऐहि सूर्य सहस्त्रांशों तेजो राशे जगत्पते, 
      अनुकंपयेमां भक्त्या, गृहाणार्घय दिवाकर:
०४-ॐ ह्रीं घृणिः सूर्य आदित्यः क्लीं ॐ
०५-ॐ ह्रीं ह्रीं सूर्याय नमः
०६-ॐ सूर्याय नम:
०७-ॐ घृणि सूर्याय नम:

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लेखन-सम्पादन-संकलन
☯️राहुलनाथ™ 🖋️....
ज्योतिषाचार्य,भिलाई'३६गढ़,भारत

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शुक्रवार, 13 मई 2022

श्रीलक्ष्मीनृसिंह_स्तोत्र_एवं_श्रीलक्ष्मीनृसिंह_सर्वसिद्धिकर_ऋणमोचन_स्तोत्र

#श्रीनृसिंह_एवं_छिन्नमस्तिका_जयंती_जन्मोत्सव_की_हार्दिक_शुभकामनाएं

#श्रीलक्ष्मीनृसिंह_स्तोत्र 
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श्रीमत् पयॊनिधिनिकॆतन चक्रपाणॆ    भॊगीन्द्रभॊगमणिरञ्जितपुण्यमूर्तॆ ।
 यॊगीश शाश्वत शरण्य भवाब्धिपॊत 
लक्ष्मीनृसिंह मम दॆहि करावलम्बम् ॥ १ ॥
ब्रह्मॆन्द्ररुद्रमरुदर्ककिरीटकॊटि-   सङ्घट्टिताङ्घ्रिकमलामलकान्तिकान्त ।
 लक्ष्मीलसत्कुच्सरॊरुहराजहंस 
लक्ष्मीनृसिंह मम दॆहि करावलम्बम् ॥ २ ॥
 संसारघॊरगहनॆ चरतॊ मुरारॆ 
मारॊग्रभीकरमृगप्रवरार्दितस्य ।
 आर्तस्यमत्सरनिदाघनिपीडितस्य 
लक्ष्मीनृसिंह मम दॆहि करावलम्बम् ॥ ३ ॥
 संसारकूपमतिघॊरमगाधमूलम् 
संप्राप्य दुःखशतसर्पसमाकुलस्य ।
दीनस्य दॆव कृपणापदमागतस्य 
लक्ष्मीनृसिंह मम दॆहि करावलम्बम् ॥ ४ ॥
संसारसागरविशालकरालकाल- 
नक्रग्रहग्रसननिग्रह विग्रहस्य ।
व्यग्रस्य रागरसनॊर्मिनिपीडितस्य 
लक्ष्मीनृसिंह मम दॆहि करावलम्बम् ॥ ५ ॥
संसारवृक्षमघबीजमनन्तकर्म- 
शाखाशतं करणपत्रमनङ्गपुष्पम् ।
आरुह्यदुःखफलितं पततॊ दयालॊ 
लक्ष्मीनृसिंह मम दॆहि करावलम्बम् ॥ ६ ॥संसारसर्पघनवक्त्रभयॊग्रतीव्र- 
दंष्ट्राकरालविषदग्द्धविनष्टमूर्तॆः ।
नागारिवाहन सुधाब्धिनिवास शौरॆ 
लक्ष्मीनृसिंह मम दॆहि करावलम्बम् ॥ ७ ॥संसारदावदहनातुरभीकरॊरु- 
ज्वालावलीभिरतिदग्धतनूरुहस्य ।
त्वत्पादपद्मसरसीशरणागतस्य 
लक्ष्मीनृसिंह मम दॆहि करावलम्बम् ॥ ८ ॥
संसारजालपतितस्य जगन्निवास 
सर्वॆन्द्रियार्थबडिशार्थझषॊपमस्य ।
प्रॊत्खण्डितप्रचुरतालुकमस्तकस्य 
लक्ष्मीनृसिंह मम दॆहि करावलम्बम् ॥ ९ ॥संसारभीकरकरीन्द्रकराभिघात- 
निष्पिष्टमर्म वपुषः सकलार्तिनाश ।         प्राणप्रयाणभवभीतिसमाकुलस्य 
लक्ष्मीनृसिंह मम दॆहि करावलम्बम् ॥ १० ॥
अन्धस्य मॆ हृतविवॆकमहाधनस्य चॊरैः 
प्रभॊ बलिभिरिन्द्रियनामधॆयैः ।
मॊहांधकारकुहरॆ विनिपातितस्य 
लक्ष्मीनृसिंह मम दॆहि करावलम्बम् ॥ ११ ॥
लक्ष्मीपतॆ कमलनाभ सुरॆश विष्णॊ 
वैकुण्ठ कृष्ण मधुसूदन पुष्कराक्ष ।
ब्रह्मण्य कॆशव जनार्दन वासुदॆव दॆवॆश 
दॆहि कृपणस्य करावलम्बम् ॥ १२ ॥
यन्माययॊजितवपुः प्रचुरप्रवाह- 
मग्नार्थमत्र निवहॊरुकरावलम्बम् ।
लक्ष्मीनृसिंहचरणाब्जमधुव्रतॆन स्तॊत्रं 
कृतं सुखकरं भुवि शंकरॆण ॥ १३ ॥

   
#श्रीलक्ष्मीनृसिंह_सर्वसिद्धिकर_ऋणमोचन_स्तोत्र
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देवकार्य सिध्यर्थं सभस्तंभं समुद् भवम ।
श्री नृसिंहं महावीरं नमामि ऋणमुक्तये ॥
लक्ष्म्यालिन्गितं वामांगं, भक्ताम्ना वरदायकं ।
श्री नृसिंहं महावीरं नमामि ऋणमुक्तये ॥
अन्त्रांलादरं शंखं, गदाचक्रयुध धरम् ।
श्री नृसिंहं महावीरं नमामि ऋणमुक्तये ॥
स्मरणात् सर्व पापघ्नं वरदं मनोवाञ्छितं ।
श्री नृसिंहं महावीरं नमामि ऋणमुक्तये ॥
सिहंनादेनाहतं, दारिद्र्यं बंद मोचनं ।
श्री नृसिंहं महावीरं नमामि ऋणमुक्तये ॥
प्रल्हाद वरदं श्रीशं, धनः कोषः परिपुर्तये ।
श्री नृसिंहं महावीरं नमामि ऋणमुक्तये ॥
क्रूरग्रह पीडा नाशं, कुरुते मंगलं शुभम् ।
श्री नृसिंहं महावीरं नमामि ऋणमुक्तये ॥
वेदवेदांगं यद्न्येशं, रुद्र ब्रम्हादि वंदितम् ।
श्री नृसिंहं महावीरं नमामि ऋणमुक्तये ॥
व्याधी दुखं परिहारं, समूल शत्रु निखं दनम् ।
श्री नृसिंहं महावीरं नमामि ऋणमुक्तये ॥
विद्या विजय दायकं, पुत्र पोत्रादि वर्धनम् ।
श्री नृसिंहं महावीरं नमामि ऋणमुक्तये ॥
भुक्ति मुक्ति प्रदायकं, सर्व सिद्धिकर नृणां ।
श्री नृसिंहं महावीरं नमामि ऋणमुक्तये ॥
उर्ग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तम् सर्वतोमुखं ।
नृसिंह भीषणं भद्रं मृत्य मृत्युं नमाम्यहम॥
य: पठेत् इंद् नित्यं संकट मुक्तये ।
अरुणि विजयी नित्यं, धनं शीघ्रं माप्नुयात् ॥
॥ श्री शंकराचार्य विरचित सर्वसिद्धिकर 
ऋणमोचन स्तोत्र संपूर्णं ॥

🕉️🙏🏻🚩आदेश-जयश्री माहाँकाल 🚩🙏🏻🕉️
लेखन-सम्पादन-संकलन
☯️राहुलनाथ™ भिलाई 🖋️

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श्रीतारा_महाविद्या

#श्रीतारा_महाविद्या
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ध्यान स्तुति

प्रत्यालीढपदार्पिताङ्घ्रिशवहृद्घोराट्टहासा परा ।
खड्गेन्दीवरकर्त्रिखर्परभुजा हुङ्कारबीजोद्भवा ॥
खर्वा नीलविशालपिङ्गलजटाजूटैकनागैर्युता ।
जाड्यं न्यस्य कपालके त्रिजगतां हन्त्युग्रतारा स्वयम् ॥

#श्रीतारा_के_कुछ_मंत्र-
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०१।।ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं फट्‘।।

०२.उग्र तारा महामंत्र:-
।। ॐ ह्ल्रीं ह्ल्रीं उग्र तारे क्रीं क्रीं फट् ।।

०३.तारा महाविद्या महामंत्र    
ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं फट

०४.देवी एक्जता मंत्र-
ह्रीं त्री हुं फट

०५.नील सरस्वती मंत्र-
ह्रीं त्री हुं

०६.शत्रु नाशक मंत्र
ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं सौ: हुं उग्रतारे फट

०७.जादू टोना नाशक मंत्र
ॐ हुं ह्रीं क्लीं सौ: हुं फट


०८.लम्बी आयु का मंत्र
ॐ हुं ह्रीं क्लीं हसौ: हुं फट

०९.सुरक्षा कवच का मंत्र
ॐ हुं ह्रीं हुं ह्रीं फट




#अक्षोभ्यमंत्र:-

।। ॐ स्त्रीं आं अक्षोभ्य स्वाहा ।।
।।ॐ भ्रौं भ्रौं स: अक्षोभ्य भैरवाय ह्रौय ह्रौय भं हुं फट।।


#शाबरमंत्र-
ॐ तारा तारा महातारा, ब्रह्म-विष्णु-महेश उधारा, चौदह भुवन आपद हारा, जहाँ भेजों तहां जाहि, बुद्धि-रिद्धि ल्याव, तीनो लोक उखाल डार-डार, न उखाले तो अक्षोभ्य की आन, सब सौ कोस चहूँ ओर, मेरा शत्रु तेरा बलि, खः फट फुरो मंत्र, इश्वरो वाचा.

#मां_ताराकवच-
★★★★★★★★
ॐ कारो मे शिर: पातु ब्रह्मारूपा महेश्वरी ।
ह्रींकार: पातु ललाटे बीजरूपा महेश्वरी ।।
स्त्रीन्कार: पातु वदने लज्जारूपा महेश्वरी ।
हुन्कार: पातु ह्रदये भवानीशक्तिरूपधृक् ।
फट्कार: पातु सर्वांगे सर्वसिद्धिफलप्रदा ।
नीला मां पातु देवेशी गंडयुग्मे भयावहा ।
लम्बोदरी सदा पातु कर्णयुग्मं भयावहा ।।
व्याघ्रचर्मावृत्तकटि: पातु देवी शिवप्रिया ।
पीनोन्नतस्तनी पातु पाशर्वयुग्मे महेश्वरी ।।
रक्त  वर्तुलनेत्रा च कटिदेशे सदाऽवतु ।
ललज्जिहव सदा पातु नाभौ मां भुवनेश्वरी ।।
करालास्या सदा पातु लिंगे देवी हरप्रिया ।
पिंगोग्रैकजटा पातु जन्घायां विघ्ननाशिनी ।।
खड्गहस्ता महादेवी जानुचक्रे महेश्वरी ।
नीलवर्णा सदा पातु जानुनी सर्वदा मम ।।
नागकुंडलधर्त्री च पातु पादयुगे तत: ।
नागहारधरा देवी सर्वांग पातु सर्वदा ।।

#श्रीमहोग्रताराष्टकस्तोत्रं 
★★★★★★★★★★
मातर्नीलसरस्वति प्रणमतां सौभाग्यसम्पत्प्रदे 
प्रत्यालीढपदस्थिते शवहृदि स्मेराननाम्भोरुहे ।
 फुल्लेन्दीवरलोचनत्रययुते कर्तीकपालोत्पले 
खड्गं चादधती त्वमेव शरणं त्वामीश्वरीमाश्रये॥ १॥
वाचामीश्वरि भक्तकल्पलतिके सर्वार्थसिद्धीश्वरि सद्यः प्राकृतगद्यपद्यरचनासर्वार्थसिद्धिप्रदे। 
 नीलेन्दीवरलोचनत्रययुते कारुण्यवारांनिधे 
सौभाग्यामृतवर्षणेन कृपया सिञ्च त्वमस्मादृशम्॥ २॥
खर्वे गर्वसमहपूरिततनो सर्पादिभूषोज्ज्वले व्याघ्रत्वक्परिवीतसुन्दरकटिव्याधूतघण्टाङ्किते।
सद्यःकृत्तगलद्रजःपरिलसन्मुण्डद्वयीमूर्धज ग्रन्थिश्रेणिनृमुण्डदामललिते भीमे भयं नाशय॥ ३॥
मायानङ्गविकाररूपललनाबिन्द्वर्धचन्द्रात्मिकेहुंफट्कारमयि 
त्वमेव शरणं मन्त्रात्मिके मादृशः।
मूर्तिस्ते जननि त्रिधामघटिता स्थूलातिसूक्ष्मा 
परावेदनां नहि गोचरा कथमपि प्राप्तां नु तामाश्रये॥ ४॥
त्वत्पादाम्बुजसेवया सुकृतिनो गच्छन्ति सायुज्यतांतस्य श्रीपरमेश्वरी त्रिनयनब्रह्मादिसौम्यात्मनः।
संसाराम्बुधिमज्जने पटुतनून् देवेन्द्रमुख्यान् सुरान्मातस्त्वत्पदसेवने हि विमुखान् को मन्दधीः सेवते॥ ५॥मातस्त्वत्पदपङ्कजद्वयरजोमुद्राङ्ककोटीरिणस्ते 
देवासुरसंगरे विजयिनो निःशङ्कमङ्के गताः।
देवोऽहं भुवने न मे सम इति स्पर्द्धां वहन्तः परेतत्तुल्या 
नियतं तथा चिरममी नाशं व्रजन्ति स्वयम्॥ ६॥
त्वन्नामस्मरणात् पलायनपरा द्रष्टुं च शक्ता न ते भूतप्रेतपिशाचराक्षसगणा यक्षाश्च नागाधिपाः।
दैत्या दानवपुङ्गवाश्च खचरा व्याघ्रादिका जन्तवोडाकिन्यः कुपितान्तकाश्च मनुजा मातः क्षणं भूतले॥ ७॥
लक्ष्मीः सिद्धगणाश्च पादुकमुखाः सिद्धास्तथा 
वारिणांस्तम्भश्चापि रणाङ्गणे गजघटास्तम्भस्तथा मोहनम्।
मातस्त्वत्पदसेवया खलु नृणां सिद्ध्यन्ति ते ते गुणाः कान्तिः कान्ततरा भवेच्च महती मूढोऽपि वाचस्पतिः॥ ८॥
ताराष्टकमिदं रम्यं भक्तिमान् यः पठेन्नरः। 
प्रातर्मध्याह्नकाले च सायाह्ने नियतः शुचिः॥ ९॥
लभते कवितां दिव्यां सर्वशास्त्रार्थविद् भवेत्। 
लक्ष्मीमनश्वरां प्राप्य भुक्त्वा भोगान् यथेप्सितान्॥ १०॥
कीर्ति कान्तिं च नैरुज्यं सर्वेषां प्रियतां व्रजेत्।
विख्यातिं चैव लोकेषु प्राप्यान्ते मोक्षमाप्नुयात्॥ ११॥
     ।।श्रीमहोग्रताराष्टकस्तोत्रं सुसंपूर्णम्।।


#श्रीतारा_शतनाम_स्तोत्रम् 
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श्रीशिव उवाच ॥

तारिणी तरला तन्वी तारा तरुणवल्लरी ।
तीररूपा तरी श्यामा तनुक्षीणपयोधरा ॥ १॥
तुरीया तरला तीव्रगमना नीलवाहिनी ।
उग्रतारा जया चण्डी श्रीमदेकजटाशिराः ॥ २॥
तरुणी शाम्भवीछिन्नभाला च भद्रतारिणी ।
उग्रा चोग्रप्रभा नीला कृष्णा नीलसरस्वती ॥ ३॥
द्वितीया शोभना नित्या नवीना नित्यनूतना ।
चण्डिका विजयाराध्या देवी गगनवाहिनी ॥ ४॥
अट्टहास्या करालास्या चरास्या दितिपूजिता ।
सगुणा सगुणाराध्या हरीन्द्रदेवपूजिता ॥ ५॥
रक्तप्रिया च रक्ताक्षी रुधिरास्यविभूषिता ।
बलिप्रिया बलिरता दुर्गा बलवती बला ॥ ६॥
बलप्रिया बलरता बलरामप्रपूजिता ।
अर्धकेशेश्वरी केशा केशवासविभूषिता ॥ ७॥
पद्ममाला च पद्माक्षी कामाख्या गिरिनन्दिनी ।
दक्षिणा चैव दक्षा च दक्षजा दक्षिणे रता ॥ ८॥
वज्रपुष्पप्रिया रक्तप्रिया कुसुमभूषिता ।
माहेश्वरी महादेवप्रिया पञ्चविभूषिता ॥ ९ ॥
इडा च पिङ्गला चैव सुषुम्ना प्राणरूपिणी ।
गान्धारी पञ्चमी पञ्चाननादि परिपूजिता ॥ १०॥
तथ्यविद्या तथ्यरूपा तथ्यमार्गानुसारिणी ।
तत्त्वप्रिया तत्त्वरूपा तत्त्वज्ञानात्मिकाऽनघा ॥ ११॥
ताण्डवाचारसन्तुष्टा ताण्डवप्रियकारिणी ।
तालदानरता क्रूरतापिनी तरणिप्रभा ॥ १२॥
त्रपायुक्ता त्रपामुक्ता तर्पिता तृप्तिकारिणी ।
तारुण्यभावसन्तुष्टा शक्तिर्भक्तानुरागिणी ॥ १३॥
शिवासक्ता शिवरतिः शिवभक्तिपरायणा ।
ताम्रद्युतिस्ताम्ररागा ताम्रपात्रप्रभोजिनी ॥ १४॥
बलभद्रप्रेमरता बलिभुग्बलिकल्पिनी ।
रामरूपा रामशक्ती रामरूपानुकारिणी ॥ १५॥
इत्येतत्कथितं देवि रहस्यं परमाद्भुतम् ।
श्रुत्वा मोक्षमवाप्नोति तारादेव्याः प्रसादतः ॥ १६॥
य इदं पठति स्तोत्रं तारास्तुतिरहस्यकम् ।
सर्वसिद्धियुतो भूत्वा विहरेत् क्षितिमण्डले ॥ १७॥
तस्यैव मन्त्रसिद्धिः स्यान्ममसिद्धिरनुत्तमा ।
भवत्येव महामाये सत्यं सत्यं न संशयः ॥ १८॥
मन्दे मङ्गलवारे च यः पठेन्निशि संयतः ।
तस्यैव मन्त्रसिद्धिस्स्याद्गाणपत्यं लभेत सः ॥ १९॥
श्रद्धयाऽश्रद्धया वापि पठेत्तारारहस्यकम् ।
सोऽचिरेणैव कालेन जीवन्मुक्तः शिवो भवेत् ॥ २०॥
सहस्रावर्तनाद्देवि पुरश्चर्याफलं लभेत् ।
एवं सततयुक्ता ये ध्यायन्तस्त्वामुपासते ।
ते कृतार्था महेशानि मृत्युसंसारवर्त्मनः ॥ २१॥
॥ इति स्वर्णमालातन्त्रे ताराशतनामस्तोत्रं समाप्तम् ॥


#श्रीतारा_अष्टोत्तर_शतनाम_स्तोत्रम्
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श्रीदेव्युवाच ।
 
 
सर्वं संसूचितं देव नाम्नां शतं महेश्वर ।
यत्नैः शतैर्महादेव मयि नात्र प्रकाशितम् ॥ १॥
पठित्वा परमेशान हठात् सिद्ध्यति साधकः ।
नाम्नां शतं महादेव कथयस्व समासतः ॥ २॥
 
श्रीभैरव उवाच ।
 
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि भक्तानां हितकारकम् ।
यज्ज्ञात्वा साधकाः सर्वे जीवन्मुक्तिमुपागताः ॥ ३॥
कृतार्थास्ते हि विस्तीर्णा यान्ति देवीपुरे स्वयम् ।
नाम्नां शतं प्रवक्ष्यामि जपात् स(अ)र्वज्ञदायकम् ॥ ४॥
नाम्नां सहस्रं संत्यज्य नाम्नां शतं पठेत् सुधीः ।
कलौ नास्ति महेशानि कलौ नान्या गतिर्भवेत् ॥ ५॥
शृणु साध्वि वरारोहे शतं नाम्नां पुरातनम् ।
सर्वसिद्धिकरं पुंसां साधकानां सुखप्रदम् ॥ ६॥
तारिणी तारसंयोगा महातारस्वरूपिणी ।
तारकप्राणहर्त्री च तारानन्दस्वरूपिणी ॥ ७॥
महानीला महेशानी महानीलसरस्वती ।
उग्रतारा सती साध्वी भवानी भवमोचिनी ॥ ८॥
महाशङ्खरता भीमा शाङ्करी शङ्करप्रिया ।
महादानरता चण्डी चण्डासुरविनाशिनी ॥ ९॥
चन्द्रवद्रूपवदना चारुचन्द्रमहोज्ज्वला ।
एकजटा कुरङ्गाक्षी वरदाभयदायिनी ॥ १०॥
महाकाली महादेवी गुह्यकाली वरप्रदा ।
महाकालरता साध्वी महैश्वर्यप्रदायिनी ॥ ११॥
मुक्तिदा स्वर्गदा सौम्या सौम्यरूपा सुरारिहा ।
शठविज्ञा महानादा कमला बगलामुखी ॥ १२॥
महामुक्तिप्रदा काली कालरात्रिस्वरूपिणी ।
सरस्वती सरिच्श्रेष्ठा स्वर्गङ्गा स्वर्गवासिनी ॥ १३॥
हिमालयसुता कन्या कन्यारूपविलासिनी ।
शवोपरिसमासीना मुण्डमालाविभूषिता ॥ १४॥
दिगम्बरा पतिरता विपरीतरतातुरा ।
रजस्वला रजःप्रीता स्वयम्भूकुसुमप्रिया ॥ १५॥
स्वयम्भूकुसुमप्राणा स्वयम्भूकुसुमोत्सुका ।
शिवप्राणा शिवरता शिवदात्री शिवासना ॥ १६॥
अट्टहासा घोररूपा नित्यानन्दस्वरूपिणी ।
मेघवर्णा किशोरी च युवतीस्तनकुङ्कुमा ॥ १७॥
खर्वा खर्वजनप्रीता मणिभूषितमण्डना ।
किङ्किणीशब्दसंयुक्ता नृत्यन्ती रक्तलोचना ॥ १८॥
कृशाङ्गी कृसरप्रीता शरासनगतोत्सुका ।
कपालखर्परधरा पञ्चाशन्मुण्डमालिका ॥ १९॥
हव्यकव्यप्रदा तुष्टिः पुष्टिश्चैव वराङ्गना ।
शान्तिः क्षान्तिर्मनो बुद्धिः सर्वबीजस्वरूपिणी ॥ २०॥
उग्रापतारिणी तीर्णा निस्तीर्णगुणवृन्दका ।
रमेशी रमणी रम्या रामानन्दस्वरूपिणी ॥ २१॥
रजनीकरसम्पूर्णा रक्तोत्पलविलोचना ।
इति ते कथितं दिव्यं शतं नाम्नां महेश्वरि ॥ २२॥
प्रपठेद् भक्तिभावेन तारिण्यास्तारणक्षमम् ।
सर्वासुरमहानादस्तूयमानमनुत्तमम् ॥ २३॥
षण्मासाद् महदैश्वर्यं लभते परमेश्वरि ।
भूमिकामेन जप्तव्यं वत्सरात्तां लभेत् प्रिये ॥ २४॥
धनार्थी प्राप्नुयादर्थं मोक्षार्थी मोक्षमाप्नुयात् ।
दारार्थी प्राप्नुयाद् दारान् सर्वागमदितान् ॥ २५॥
अष्टम्यां च शतावृत्त्या प्रपठेद् यदि मानवः ।
सत्यं सिद्ध्यति देवेशि संशयो नास्ति कश्चन ॥ २६॥
इति सत्यं पुनः सत्यं सत्यं सत्यं महेश्वरि ।
अस्मात् परतरं नास्ति स्तोत्रमध्ये न संशयः ॥ २७॥
नाम्नां शतं पठेद् मन्त्रं संजप्य भक्तिभावतः ।
प्रत्यहं प्रपठेद् देवि यदीच्छेत् शुभमात्मनः ॥ २८॥
इदानीं कथयिष्यामि विद्योत्पत्तिं वरानने ।
येन विज्ञानमात्रेण विजयी भुवि जायते ॥ २९॥
योनिबीजत्रिरावृत्त्या मध्यरात्रौ वरानने ।
अभिमन्त्र्य जलं स्निग्धं अष्टोत्तरशतेन च ॥ ३०॥
तज्जलं तु पिबेद् देवि षण्मासं जपते यदि ।
सर्वविद्यामयो भूत्वा मोदते पृथिवीतले ॥ ३१॥
शक्तिरूपां महादेवीं शृणु हे नगनन्दिनि ।
वैष्णवः शैवमार्गो वा शाक्तो वा गाणपोऽपि वा ॥ ३२॥
तथापि शक्तेराधिक्यं शृणु भैरवसुन्दरि ।
सच्चिदानन्दरूपाच्च सकलात् परमेश्वरात् ॥ ३३॥
शक्तिरासीत् ततो नादो नादाद् बिन्दुस्ततः परम् ।
अथ बिन्द्वात्मनः कालरूपबिन्दुकलात्मनः ॥ ३४॥
जायते च जगत्सर्वं सस्थावरचरात्मकम् ।
श्रोतव्यः स च मन्तव्यो निर्ध्यातव्यः स एव हि ॥ ३५॥
साक्षात्कार्यश्च देवेशि आगमैर्विविधैः शिवे ।
श्रोतव्यः श्रुतिवाक्येभ्यो मन्तव्यो मननादिभिः ॥ ३६॥
उपपत्तिभिरेवायं ध्यातव्यो गुरुदेशतः ।
तदा स एव सर्वात्मा प्रत्यक्षो भवति क्षणात् ॥ ३७॥
तस्मिन् देवेशि प्रत्यक्षे शृणुष्व परमेश्वरि ।
भावैर्बहुविधैर्देवि भावस्तत्रापि नीयते ॥ ३८॥
भक्तेभ्यो नानाघासेभ्यो गवि चैको यथा रसः ।
सदुग्धाख्यसंयोगे नानात्वं लभते प्रिये ॥ ३९॥
तृणेन जायते देवि रसस्तस्मात् परो रसः ।
तस्मात् दधि ततो हव्यं तस्मादपि रसोदयः ॥ ४०॥
स एव कारणं तत्र तत्कार्यं स च लक्ष्यते ।
दृश्यते च महादेन कार्यं न च कारणम् ॥ ४१॥
तथैवायं स एवात्मा नानाविग्रहयोनिषु ।
जायते च ततो जातः कालभेदो हि भाव्यते ॥ ४२॥
स जातः स मृतो बद्धः स मुक्तः स सुखी पुमान् ।
स वृद्धः स च विद्वांश्च न स्त्री पुमान् नपुंसकः ॥ ४३॥
नानाध्याससमायोगादात्मना जायते शिवे ।
एक एव स एवात्मा सर्वरूपः सनातनः ॥ ४४॥
अव्यक्तश्च स च व्यक्तः प्रकृत्या ज्ञायते ध्रुवम् ।
तस्मात् प्रकृतियोगेन विना न ज्ञायते क्वचित् ॥ ४५॥
विना घटत्वयोगेन न प्रत्यक्षो यथा घटः ।
इतराद् भिद्यमानोऽपि स भेदमुपगच्छति ॥ ४६॥
मां विना पुरुषे भेदो न च याति कथञ्चन ।
न प्रयोगैर्न च ज्ञानैर्न श्रुत्या न गुरुक्रमैः ॥ ४७॥
न स्नानैस्तर्पणैर्वापि नच दानैः कदाचन ।
प्रकृत्या ज्ञायते ह्यात्मा प्रकृत्या लुप्यते पुमान् ॥ ४८॥
प्रकृत्याधिष्ठितं सर्वं प्रकृत्या वञ्चितं जगत् ।
प्रकृत्या भेदमाप्नोति प्रकृत्याभेदमाप्नुयात् ॥ ४९॥
नरस्तु प्रकृतिर्नैव न पुमान् परमेश्वरः ।
इति ते कथितं तत्त्वं सर्वसारमनोरमम् ॥ ५०॥
इति श्रीबृहन्नीलतन्त्रे भैरवभैरवीसंवादे ताराशतनाम तत्त्वसारनिरूपणं विंशः पटलः ॥ २०॥

🕉️🙏🏻🚩आदेश-जयश्री माहाँकाल 🚩🙏🏻🕉️

लेखन-सम्पादन-संकलन
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मान्यताओं और जानकारियों के आधार पर मात्र शैक्षणिक उद्देश्यों हेतु दी जाती है।हम इनकी पुष्टी नही करते,अतः बिना गुरु के निर्देशन के साधनाए या प्रयोग ना करे। किसी भी विवाद की स्थिति न्यायलय क्षेत्र दुर्ग छत्तीसगढ़,भारत।©कॉपी राइट एक्ट 1957)

गुरुवार, 12 मई 2022

#नीलसरस्वती_मंत्र_स्तोत्र_कवच_एवं_साबर_मंत्र_संग्रह

#नीलसरस्वती_मंत्र_स्तोत्र_कवच_एवं_साबर_मंत्र_संग्रह
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#विनियोग :-

॥ ॐ अस्य नील सरस्वती मंत्रस्य ब्रह्म ऋषिः, गायत्री छन्दः, नील सरस्वती देवता, ममाभीष्ट सिद्धयर्थे जपे विनियोगः ॥

#नील_सरस्वती_मंत्र :-
★★★★★★★★★★

1-॥ ॐ श्रीं ह्रीं हसौ: हूँ फट नीलसरस्वत्ये स्वाहा ॥

( 11 माला जाप करे ) मंत्र जाप के बाद स्तोत्र का पाठ करे ।

2- मंत्र
नील सरस्वती मंत्र-ह्रीं त्री हुं।।

3-ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं सौं क्लीं ह्रीं ऐं ब्लूं स्त्रीं
नीलतारे सरस्वती द्रां द्रीं क्लीं ब्लू सः।
ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं सौंः सौः ह्रीं स्वाहा।

#नील_सरस्वती_स्तोत्र
★★★★★★★★★★
 
घोररूपे महारावे सर्वशत्रुभयंकरि।
भक्तेभ्यो वरदे देवि त्राहि मां शरणागतम्।।1।।
 
ॐ सुरासुरार्चिते देवि सिद्धगन्धर्वसेविते।
जाड्यपापहरे देवि त्राहि मां शरणागतम्।।2।।
 
जटाजूटसमायुक्ते लोलजिह्वान्तकारिणि।
द्रुतबुद्धिकरे देवि त्राहि मां शरणागतम्।।3।।
 
सौम्यक्रोधधरे रूपे चण्डरूपे नमोSस्तु ते।
सृष्टिरूपे नमस्तुभ्यं त्राहि मां शरणागतम्।।4।।
 
जडानां जडतां हन्ति भक्तानां भक्तवत्सला।
मूढ़तां हर मे देवि त्राहि मां शरणागतम्।।5।।
 
वं ह्रूं ह्रूं कामये देवि बलिहोमप्रिये नम:।
उग्रतारे नमो नित्यं त्राहि मां शरणागतम्।।6।।
 
बुद्धिं देहि यशो देहि कवित्वं देहि देहि मे।
मूढत्वं च हरेद्देवि त्राहि मां शरणागतम्।।7।।
 
इन्द्रादिविलसदद्वन्द्ववन्दिते करुणामयि।
तारे ताराधिनाथास्ये त्राहि मां शरणागतम्।।8।।
 
अष्टभ्यां च चतुर्दश्यां नवम्यां य: पठेन्नर:।
षण्मासै: सिद्धिमाप्नोति नात्र कार्या विचारणा।।9।।
 
मोक्षार्थी लभते मोक्षं धनार्थी लभते धनम्।
विद्यार्थी लभते विद्यां विद्यां तर्कव्याकरणादिकम।।10।।
 
इदं स्तोत्रं पठेद्यस्तु सततं श्रद्धयाSन्वित:।
तस्य शत्रु: क्षयं याति महाप्रज्ञा प्रजायते।।11।।
 
पीडायां वापि संग्रामे जाड्ये दाने तथा भये।
य इदं पठति स्तोत्रं शुभं तस्य न संशय:।।12।।
 
इति प्रणम्य स्तुत्वा च योनिमुद्रां प्रदर्शयेत।।13।।
 
।।इति नीलसरस्वतीस्तोत्रं सम्पूर्णम्।।
इस स्तोत्र को जो व्यक्ति अष्टमी, नवमी तथा चतुर्दशी के दिन अथवा प्रतिदिन इसका पाठ करता है उसके सभी शत्रुओं का नाश हो जाता है।स्तोत्र के अंत मे देवी को योनि मुद्रा दिखानी चाहिए।नील सरस्वती की साधना करने से पहले देह रक्षा मन्त्र का 11 बार जाप करें.

#कवच
★★★★
श्रीसरस्वती कवच
श्रीब्रह्मवैवर्त-पुराण के प्रकृतिखण्ड, अध्याय ४ में मुनिवर भगवान नारायण ने मुनिवर नारदजी को बतलाया कि ‘विप्रेन्द्र! श्रीसरस्वती कवच विश्व पर विजय प्राप्त कराने वाला है। जगत्स्त्रष्टा ब्रह्मा ने गन्धमादन पर्वत पर भृगु के आग्रह से इसे इन्हें बताया था।

॥ब्रह्मोवाच॥
श्रृणु वत्स प्रवक्ष्यामि कवचं सर्वकामदम्।
श्रुतिसारं श्रुतिसुखं श्रुत्युक्तं श्रुतिपूजितम्॥
उक्तं कृष्णेन गोलोके मह्यं वृन्दावने वमे।
रासेश्वरेण विभुना वै रासमण्डले॥
अतीव गोपनीयं च कल्पवृक्षसमं परम्।
अश्रुताद्भुतमन्त्राणां समूहैश्च समन्वितम्॥
यद धृत्वा भगवाञ्छुक्रः सर्वदैत्येषु पूजितः।
यद धृत्वा पठनाद ब्रह्मन बुद्धिमांश्च बृहस्पति॥
पठणाद्धारणाद्वाग्मी कवीन्द्रो वाल्मिको मुनिः।
स्वायम्भुवो मनुश्चैव यद धृत्वा सर्वपूजितः॥
कणादो गौतमः कण्वः पाणिनीः शाकटायनः।
ग्रन्थं चकार यद धृत्वा दक्षः कात्यायनः स्वयम्॥
धृत्वा वेदविभागं च पुराणान्यखिलानि च।
चकार लीलामात्रेण कृष्णद्वैपायनः स्वयम्॥
शातातपश्च संवर्तो वसिष्ठश्च पराशरः।
यद धृत्वा पठनाद ग्रन्थं याज्ञवल्क्यश्चकार सः॥
ऋष्यश्रृंगो भरद्वाजश्चास्तीको देवलस्तथा।
जैगीषव्योऽथ जाबालिर्यद धृत्वा सर्वपूजिताः॥

कचवस्यास्य विप्रेन्द्र ऋषिरेष प्रजापतिः।
स्वयं च बृहतीच्छन्दो देवता शारदाम्बिका॥१
सर्वतत्त्वपरिज्ञाने सर्वार्थसाधनेषु च।
कवितासु च सर्वासु विनियोगः प्रकीर्तितः॥२
श्रीं ह्रीं सरस्वत्यै स्वाहा शिरो मे पातु सर्वतः।
श्रीं वाग्देवतायै स्वाहा भालं मे सर्वदावतु॥३
ॐ सरस्वत्यै स्वाहेति श्रोत्रे पातु निरन्तरम्।
ॐ श्रीं ह्रीं भारत्यै स्वाहा नेत्रयुग्मं सदावतु॥४ऐं ह्रीं वाग्वादिन्यै स्वाहा नासां मे सर्वतोऽवतु।
ॐ ह्रीं विद्याधिष्ठातृदेव्यै स्वाहा ओष्ठं सदावतु॥५
ॐ श्रीं ह्रीं ब्राह्मयै स्वाहेति दन्तपङ्क्तीः सदावतु।
ऐमित्येकाक्षरो मन्त्रो मम कण्ठं सदावतु॥६
ॐ श्रीं ह्रीं पातु मे ग्रीवां स्कन्धौ मे श्रीं सदावतु।
ॐ श्रीं विद्याधिष्ठातृदेव्यै स्वाहा वक्षः सदावतु॥७
ॐ ह्रीं विद्यास्वरुपायै स्वाहा मे पातु नाभिकाम्।
ॐ ह्रीं ह्रीं वाण्यै स्वाहेति मम हस्तौ सदावतु॥८
ॐ सर्ववर्णात्मिकायै पादयुग्मं सदावतु।
ॐ वागधिष्ठातृदेव्यै सर्व सदावतु॥९
ॐ सर्वकण्ठवासिन्यै स्वाहा प्राच्यां सदावतु।
ॐ ह्रीं जिह्वाग्रवासिन्यै स्वाहाग्निदिशि रक्षतु॥१०
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं सरस्वत्यै बुधजनन्यै स्वाहा।
सततं मन्त्रराजोऽयं दक्षिणे मां सदावतु॥११
ऐं ह्रीं श्रीं त्र्यक्षरो मन्त्रो नैरृत्यां मे सदावतु।
कविजिह्वाग्रवासिन्यै स्वाहा मां वारुणेऽवतु॥१२
ॐ सर्वाम्बिकायै स्वाहा वायव्ये मां सदावतु।
ॐ ऐं श्रीं गद्यपद्यवासिन्यै स्वाहा मामुत्तरेऽवतु॥१३
ऐं सर्वशास्त्रवासिन्यै स्वाहैशान्यां सदावतु।
ॐ ह्रीं सर्वपूजितायै स्वाहा चोर्ध्वं सदावतु॥१४
ऐं ह्रीं पुस्तकवासिन्यै स्वाहाधो मां सदावतु।
ॐ ग्रन्थबीजरुपायै स्वाहा मां सर्वतोऽवतु॥१५इति ते कथितं विप्र ब्रह्ममन्त्रौघविग्रहम्।
इदं विश्वजयं नाम कवचं ब्रह्मरुपकम्॥
पुरा श्रुतं धर्मवक्त्रात पर्वते गन्धमादने।
तव स्नेहान्मयाऽख्यातं प्रवक्तव्यं न कस्यचित्॥
गुरुमभ्यर्च्य विधिवद वस्त्रालंकारचन्दनैः।
प्रणम्य दण्डवद भूमौ कवचं धारयेत सुधीः॥
पञ्चलक्षजपैनैव सिद्धं तु कवचं भवेत्।
यदि स्यात सिद्धकवचो बृहस्पतिसमो भवेत्॥
महावाग्मी कवीन्द्रश्च त्रैलोक्यविजयी भवेत्।
शक्नोति सर्वे जेतुं स कवचस्य प्रसादतः॥
इदं ते काण्वशाखोक्तं कथितं कवचं मुने।
स्तोत्रं पूजाविधानं च ध्यानं वै वन्दनं तथा॥
॥इति श्रीब्रह्मवैवर्ते ध्यानमन्त्रसहितं विश्वविजय-सरस्वतीकवचं सम्पूर्णम्॥
(प्रकृतिखण्ड ४।६३-९१)

#साबर_मंत्र
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ॐ इक ओंकार, सत नाम करता पुरुष निर्मै निर्वैर अकाल मूर्ति अजूनि सैभं गुर प्रसादि जप आदि सच, जुगादि सच है भी सच, नानक होसी भी सच -
मन की जै जहाँ लागे अख, तहाँ-तहाँ सत नाम की रख ।
चिन्तामणि कल्पतरु आए कामधेनु को संग ले आए, आए आप कुबेर भण्डारी साथ लक्ष्मी आज्ञाकारी, बारां ऋद्धां और नौ निधि वरुण देव ले आए ।
प्रसिद्ध सत-गुरु पूर्ण कियो स्वार्थ, आए बैठे बिच पञ्ज पदार्थ ।
ढाकन गगन, पृथ्वी का बासन, रहे अडोल न डोले आसन, राखे ब्रह्मा-विष्णु-महेश, काली-भैरों-हनु-गणेश ।
सूर्य-चन्द्र भए प्रवेश, तेंतीस करोड़ देव इन्द्रेश ।
सिद्ध चौरासी और नौ नाथ, बावन वीर यति छह साथ ।
राखा हुआ आप निरंकार, थुड़ो गई भाग समुन्द्रों पार ।
अटुट भण्डार, अखुट अपार । खात-खरचत, कछु होत नहीं पार ।
किसी प्रकार नहीं होवत ऊना । देव दवावत दून चहूना ।
गुर की झोली, मेरे हाथ । गुरु-बचनी पञ्ज तत, बेअन्त-बेअन्त-बेअन्त भण्डार ।
जिनकी पैज रखी करतार, नानक गुरु पूरे नमस्कार ।
अन्नपूर्णा भई दयाल, नानक कुदरत नदर निहाल ।
ऐ जप करने पुरुष का सच, नानक किया बखान,
जगत उद्धारण कारने धुरों होआ फरमान ।
अमृत-वेला सच नाम जप करिए ।
कर स्नान जो हित चित्त कर जप को पढ़े, सो दरगह पावे मान ।
जन्म-मरण-भौ काटिए, जो प्रभ संग लावे ध्यान ।
जो मनसा मन में करे, दास नानक दीजे दान ।।”..

 🕉️🙏🏻🚩जयश्री महाकाल🚩🙏🏻

लेखन-सम्पादन-संकलन
☯️राहुलनाथ™ भिलाई 🖋️ 
📞➕9⃣1⃣9⃣8⃣2⃣7⃣3⃣7⃣4⃣0⃣7⃣4⃣(w)
#चेतावनी:-इस लेख में वर्णित नियम ,सूत्र,व्याख्याए,तथ्य स्वयं के अभ्यास-अनुभव के आधार पर है।एवं गुरू-साधु-संतों के कथन,ज्योतिष-वास्तु-वैदिक-तांत्रिक-आध्यात्मिक-साबरी ग्रंथो,मान्यताओं और जानकारियों के आधार पर मात्र शैक्षणिक उद्देश्यों हेतु दी जाती है।हम इनकी पुष्टी नही करते,अतः बिना गुरु के निर्देशन के साधनाए या प्रयोग ना करे। किसी भी विवाद की स्थिति न्यायलय क्षेत्र दुर्ग छत्तीसगढ़,भारत।