सोमवार, 9 मई 2022

प्रेम और प्रार्थना

प्रेम और प्रार्थना
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प्रेम और प्रार्थना का आनंद उनमें ही है- उनके बाहर नहीं। जो उनके द्वारा उनसे कुछ चाहता है, उसे उनके रहस्य का पता नहीं है। प्रेम में डूब जाना ही प्रेम का फल है। और, प्रार्थना की तन्मयता और आनंद ही उसका पुरस्कार है।
ईश्वर का एक प्रेमी अनेक वर्षो से साधना में था। एक रात्रि उसने स्वप्न में सुना कि कोई कह रहा है,प्रभु तेरे भाग्य में नहीं, व्यर्थ श्रम और प्रतीक्षा मत कर।उसने इस स्वप्न की बात अपने मित्रों से कही। किंतु, न तो उसके चेहरे पर उदासी आई और न ही उसकी साधाना ही बंद हुई।
उसके मित्रों ने उससे कहा,जब तूने सुन लिया कि तेरे भाग्य का दरवाजा बंद है, तो अब क्यों व्यर्थ प्रार्थनाओं में लगा हुआ है?
उस प्रेमी ने कहा,व्यर्थ प्रार्थनाएं? पागलों! प्रार्थना तो स्वयं में ही आनंद है- कुछ या किसी के मिलने या न मिलने से उसका क्या संबंध है? और, जब कोई अभिलाषा रखने वाला एक दरवाजे से निराश हो जाता है, तो दूसरा दरवाजा खटखटाता है, लेकिन मेरे लिए दूसरा दरवाजा कहां है? प्रभु के अतिरिक्त कोई दरवाजा नहीं।
उस रात्रि उसने देखा था कि प्रभु उसे आलिंगन में लिए हुए हैं।
प्रभु के अतिरिक्त जिनकी कोई चाह नहीं है, असंभव है कि वे उसे न पा लें। सब चाहों का एक चाह बन जाना ही मनुष्य के भीतर उस शक्ति को पैदा करता है, जो कि उसे स्वयं को अतिक्रमण कर भागवत चैतन्य में प्रवेश के लिए समर्थ बनाती है।
🕉️🙏🏻🚩आदेश-जयश्री माहाँकाल 🚩🙏🏻🕉️

👉व्यक्तिगत अनुभूति एवं विचार©२०१६
☯️।।राहुलनाथ।।™🖋️।....भिलाई,३६गढ़,भारत
संपर्कसूत्र:➕9⃣1⃣9⃣8⃣2⃣7⃣3⃣7⃣4⃣0⃣7⃣4⃣(w)

जगतगुरु एवं समर्पित शिष्य

जगतगुरु एवं समर्पित शिष्य
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एक कहावत है कि 
"मानव गुरु शिष्य के कान में मंत्र उच्चारण करता है,जबकी जगद्गुरु भक्त के हृ्दय में बोलता है!"
 साधक में अध्यात्म चेतना का द्वार जागरण होने पर सच्ची दीक्षा होती है! सच्चा गुरु सर्वव्यापी भगवान,अन्तर्यामी परमात्मा है।जो संसार की गती,भर्ता,प्रभू,साक्षी,निवास,शरण,सुहृ्द,प्रभव और प्रलय,अधार,समस्त ज्ञान का निदान और अव्यक्त बीज  है!

"गतिर्भर्ता प्रभु: सा़ई निवास: शरणं सुहृ्त! 
प्रभव: प्रलय: स्थानं निधानं बीजमव्ययम्!!"
 
साधारण गुरु और शिष्य परस्पर मिलने पर एक-दूसरे में भगवान को देखने का प्रयास करते है! शिष्य गुरु को गुरुओं के गुरु परमात्मा का एक विग्रह समझता है,जिसके माध्यम से भगवत्कृ्पा प्रवाहित होती है! वह इसी रुप में उनकी सेवा तथा उपासना करता है,तथा उनकी आग्या का पालन करता है! भारत में हजारों लोगों द्वारा पाठ किये जाने वाले प्रसिद्ध श्लोकों मेंयह बात व्यक्त हुई है!! 
अग्यानतिमिरान्ध्स्य ग्यामांजनशलाकया!

"चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्री गुरुवे नम:!!
अनेकजन्मसम्पाप्तकर्मबन्धविदाहिने!
आत्मग्यानप्रदानेन तस्मै श्री ग्गुरुवे नम:!!"

अर्थात:-"अग्यानान्धकार से अन्ध व्यक्ति के नेत्रों कौ ग्यानरुपी अंजन की शलाका से उन्मीलित करने वाले श्री गुरु को मैं प्रणाम करता हूँ! अनेक जन्मों के कर्म बन्धनों कों आत्मग्यान प्रदान करके भस्म करने वाले श्री गुरु को मैं प्रणाम करता हूँ!!
🕉️🙏🏻🚩आदेश-जयश्री माहाँकाल 🚩🙏🏻🕉️

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साधना -पूजा के मूल सूत्र-भाग 2

साधना -पूजा के मूल सूत्र-भाग 2
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जगतगुरु एवं समर्पित शिष्य
एक कहावत है कि 
"मानव गुरु शिष्य के कान में मंत्र उच्चारण करता है,जबकी जगद्गुरु भक्त के हृ्दय में बोलता है!"
 साधक में अध्यात्म चेतना का द्वार जागरण होने पर सच्ची दीक्षा होती है! सच्चा गुरु सर्वव्यापी भगवान,अन्तर्यामी परमात्मा है।जो संसार की गती,भर्ता,प्रभू,साक्षी,निवास,शरण,सुहृ्द,प्रभव और प्रलय,अधार,समस्त ज्ञान का निदान और अव्यक्त बीज  है!

"गतिर्भर्ता प्रभु: सा़ई निवास: शरणं सुहृ्त! 
प्रभव: प्रलय: स्थानं निधानं बीजमव्ययम्!!"
 
साधारण गुरु और शिष्य परस्पर मिलने पर एक-दूसरे में भगवान को देखने का प्रयास करते है! शिष्य गुरु को गुरुओं के गुरु परमात्मा का एक विग्रह समझता है,जिसके माध्यम से भगवत्कृ्पा प्रवाहित होती है! वह इसी रुप में उनकी सेवा तथा उपासना करता है,तथा उनकी आग्या का पालन करता है! भारत में हजारों लोगों द्वारा पाठ किये जाने वाले प्रसिद्ध श्लोकों मेंयह बात व्यक्त हुई है!! 
अग्यानतिमिरान्ध्स्य ग्यामांजनशलाकया!

"चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्री गुरुवे नम:!!
अनेकजन्मसम्पाप्तकर्मबन्धविदाहिने!
आत्मग्यानप्रदानेन तस्मै श्री ग्गुरुवे नम:!!"

अर्थात:-"अग्यानान्धकार से अन्ध व्यक्ति के नेत्रों कौ ग्यानरुपी अंजन की शलाका से उन्मीलित करने वाले श्री गुरु को मैं प्रणाम करता हूँ! अनेक जन्मों के कर्म बन्धनों कों आत्मग्यान प्रदान करके भस्म करने वाले श्री गुरु को मैं प्रणाम करता हूँ!!
🕉️🙏🏻🚩आदेश-जयश्री माहाँकाल 🚩🙏🏻🕉️

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साधना-पूजा के मूल सूत्र-भाग 1

साधना-पूजा के मूल सूत्र-भाग 1
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किसि भी साधना या पूजा को करने के पहले साध को प्राणायाम की साधना करनी चाहिये ये प्राणायाम तीन प्रकार के होते हैं-लघु,मध्यम और उत्तम अनमें प्रथम लघु प्राणायाम 12मात्राऔं का,मध्यम 24 का,तथा उत्तम प्राणायाम 36 मात्राऔं का होता है "आँखो की पलको को खुलने फर बंद होने में जो समयावधि लगती वही एक मात्रा कहलाती है"
इसी प्रकार आसन में बैठने के बाद सर्व प्रथम अपनी गर्दन को 7 बार गोल दाई तरफ से घुमाये फिर 7 बार दाई तरफ से।फिर 7 बार आगे से पीछे की तरफ ले जाएं ।इससे गर्दन के पास की मास पेशियां एवं नसे मुक्त होती है जो कि साधक की साधना में सहयोग प्रदान करती है गर्दन के पीछे का स्थान शक्ति संचार एवं एकत्रीकरण का मूल स्थान उसी प्रकार है जैसे कि मूलाधार का शक्ति स्थान ,जहां सभी नस-नाड़ियो का संग्रह होता है।इस सूत्र का नित्य उपयोग कर हमें साधना करने में बहुत सहायता मिली है।हमारा निजी अनुभव कहता है कि साधक को कुछ दिनों तक इस प्रयोग को अवश्य करके देखना चाहिए।
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नवदुर्गा शक्ति कवच 🎂🚩

नवदुर्गा शक्ति कवच 🎂🚩
सर्व-कामना-सिद्धि स्तोत्र
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श्री हिरण्य-मयी हस्ति-वाहिनी, सम्पत्ति-शक्ति-दायिनी।
मोक्ष-मुक्ति-प्रदायिनी, सद्-बुद्धि-शक्ति-दात्रिणी।।१
सन्तति-सम्वृद्धि-दायिनी, शुभ-शिष्य-वृन्द-प्रदायिनी।
नव-रत्ना नारायणी, भगवती भद्र-कारिणी।।२
धर्म-न्याय-नीतिदा, विद्या-कला-कौशल्यदा।
प्रेम-भक्ति-वर-सेवा-प्रदा, राज-द्वार-यश-विजयदा।।३
धन-द्रव्य-अन्न-वस्त्रदा, प्रकृति पद्मा कीर्तिदा।
सुख-भोग-वैभव-शान्तिदा, साहित्य-सौरभ-दायिका।।४
वंश-वेलि-वृद्धिका, कुल-कुटुम्ब-पौरुष-प्रचारिका।
स्व-ज्ञाति-प्रतिष्ठा-प्रसारिका, स्व-जाति-प्रसिद्धि-प्राप्तिका।।५
भव्य-भाग्योदय-कारिका, रम्य-देशोदय-उद्भाषिका।
सर्व-कार्य-सिद्धि-कारिका, भूत-प्रेत-बाधा-नाशिका।
अनाथ-अधमोद्धारिका, पतित-पावन-कारिका।
मन-वाञ्छित॒फल-दायिका, सर्व-नर-नारी-मोहनेच्छा-पूर्णिका।।७
साधन-ज्ञान-संरक्षिका, मुमुक्षु-भाव-समर्थिका।
जिज्ञासु-जन-ज्योतिर्धरा, सुपात्र-मान-सम्वर्द्धिका।।८
अक्षर-ज्ञान-सङ्गतिका, स्वात्म-ज्ञान-सन्तुष्टिका।
पुरुषार्थ-प्रताप-अर्पिता, पराक्रम-प्रभाव-समर्पिता।।९
स्वावलम्बन-वृत्ति-वृद्धिका, स्वाश्रय-प्रवृत्ति-पुष्टिका।
प्रति-स्पर्द्धी-शत्रु-नाशिका, सर्व-ऐक्य-मार्ग-प्रकाशिका।।१०
जाज्वल्य-जीवन-ज्योतिदा, षड्-रिपु-दल-संहारिका।
भव-सिन्धु-भय-विदारिका, संसार-नाव-सुकानिका।।११
चौर-नाम-स्थान-दर्शिका, रोग-औषधी-प्रदर्शिका।
इच्छित-वस्तु-प्राप्तिका, उर-अभिलाषा-पूर्णिका।।१२
श्री देवी मङ्गला, गुरु-देव-शाप-निर्मूलिका।
आद्य-शक्ति इन्दिरा, ऋद्धि-सिद्धिदा रमा।।१३
सिन्धु-सुता विष्णु-प्रिया, पूर्व-जन्म-पाप-विमोचना।
दुःख-सैन्य-विघ्न-विमोचना, नव-ग्रह-दोष-निवारणा।।१४
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं श्रीसर्व-कामना-सिद्धि महा-यन्त्र-देवता-स्वरुपिणी श्रीमहा-माया महा-देवी महा-शक्ति महालक्ष्म्ये नमो नमः।
ॐ ह्रीं श्रीपर-ब्रह्म परमेश्वरी। भाग्य-विधाता भाग्योदय-कर्त्ता भाग्य-लेखा भगवती भाग्येश्वरी ॐ ह्रीं।
कुतूहल-दर्शक, पूर्व-जन्म-दर्शक, भूत-वर्तमान-भविष्य-दर्शक, पुनर्जन्म-दर्शक, त्रिकाल-ज्ञान-प्रदर्शक, दैवी-ज्योतिष-महा-विद्या-भाषिणी त्रिपुरेश्वरी। अद्भुत, अपुर्व, अलौकिक, अनुपम, अद्वितीय, सामुद्रिक-विज्ञान-रहस्य-रागिनी, श्री-सिद्धि-दायिनी। सर्वोपरि सर्व-कौतुकानि दर्शय-दर्शय, हृदयेच्छित सर्व-इच्छा पूरय-पूरय ॐ स्वाहा।
ॐ नमो नारायणी नव-दुर्गेश्वरी। कमला, कमल-शायिनी, कर्ण-स्वर-दायिनी, कर्णेश्वरी, अगम्य-अदृश्य-अगोचर-अकल्प्य-अमोघ-अधारे, सत्य-वादिनी, आकर्षण-मुखी, अवनी-आकर्षिणी, मोहन-मुखी, महि-मोहिनी, वश्य-मुखी, विश्व-वशीकरणी, राज-मुखी, जग-जादूगरणी, सर्व-नर-नारी-मोहन-वश्य-कारिणी, मम करणे अवतर अवतर, नग्न-सत्य कथय-कथय।
अतीत अनाम वर्तनम्। मातृ मम नयने दर्शन। ॐ नमो श्रीकर्णेश्वरी देवी सुरा शक्ति-दायिनी। मम सर्वेप्सित-सर्व-कार्य-सिद्धि कुरु-कुरु स्वाहा। ॐ श्रीं ऐं ह्रीं क्लीं श्रीमहा-माया महा-शक्ति महा-लक्ष्मी महा-देव्यै विच्चे-विच्चे श्रीमहा-देवी महा-लक्ष्मी महा-माया महा-शक्त्यै क्लीं ह्रीं ऐं श्रीं ॐ।
ॐ श्रीपारिजात-पुष्प-गुच्छ-धरिण्यै नमः। ॐ श्री ऐरावत-हस्ति-वाहिन्यै नमः। ॐ श्री कल्प-वृक्ष-फल-भक्षिण्यै नमः। ॐ श्री काम-दुर्गा पयः-पान-कारिण्यै नमः। ॐ श्री नन्दन-वन-विलासिन्यै नमः। ॐ श्री सुर-गंगा-जल-विहारिण्यै नमः। ॐ श्री मन्दार-सुमन-हार-शोभिन्यै नमः। ॐ श्री देवराज-हंस-लालिन्यै नमः। ॐ श्री अष्ट-दल-कमल-यन्त्र-रुपिण्यै नमः। ॐ श्री वसन्त-विहारिण्यै नमः। ॐ श्री सुमन-सरोज-निवासिन्यै नमः। ॐ श्री कुसुम-कुञ्ज-भोगिन्यै नमः। ॐ श्री पुष्प-पुञ्ज-वासिन्यै नमः। ॐ श्री रति-रुप-गर्व-गञ्हनायै नमः। ॐ श्री त्रिलोक-पालिन्यै नमः। ॐ श्री स्वर्ग-मृत्यु-पाताल-भूमि-राज-कर्त्र्यै नमः।
श्री लक्ष्मी-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीशक्ति-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीदेवी-यन्त्रेभ्यो नमः। श्री रसेश्वरी-यन्त्रेभ्यो नमः। श्री ऋद्धि-यन्त्रेभ्यो नमः। श्री सिद्धि-यन्त्रेभ्यो नमः। श्री कीर्तिदा-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीप्रीतिदा-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीइन्दिरा-यन्त्रेभ्यो नमः। श्री कमला-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीहिरण्य-वर्णा-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीरत्न-गर्भा-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीसुवर्ण-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीसुप्रभा-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीपङ्कनी-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीराधिका-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीपद्म-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीरमा-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीलज्जा-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीजया-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीपोषिणी-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीसरोजिनी-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीहस्तिवाहिनी-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीगरुड़-वाहिनी-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीसिंहासन-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीकमलासन-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीरुष्टिणी-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीपुष्टिणी-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीतुष्टिनी-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीवृद्धिनी-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीपालिनी-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीतोषिणी-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीरक्षिणी-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीवैष्णवी-यन्त्रेभ्यो नमः।
श्रीमानवेष्टाभ्यो नमः। श्रीसुरेष्टाभ्यो नमः। श्रीकुबेराष्टाभ्यो नमः। श्रीत्रिलोकीष्टाभ्यो नमः। श्रीमोक्ष-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीभुक्ति-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीकल्याण-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीनवार्ण-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीअक्षस्थान-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीसुर-स्थान-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीप्रज्ञावती-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीपद्मावती-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीशंख-चक्र-गदा-पद्म-धरा-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीमहा-लक्ष्मी-यन्त्रेभ्यो नमः। श्रीलक्ष्मी-नारायण-यन्त्रेभ्यो नमः। ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं श्रीमहा-माया-महा-देवी-महा-शक्ति-महा-लक्ष्मी-स्वरुपा-श्रीसर्व-कामना-सिद्धि महा-यन्त्र-देवताभ्यो नमः।
ॐ विष्णु-पत्नीं, क्षमा-देवीं, माध्वीं च माधव-प्रिया। लक्ष्मी-प्रिय-सखीं देवीं, नमाम्यच्युत-वल्लभाम्। ॐ महा-लक्ष्मी च विद्महे विष्णु-पत्नि च धीमहि, तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात्। मम सर्व-कार्य-सिद्धिं कुरु-कुरु स्वाहा।
विधि:-सामान्य रूप से नित्य कम से कम 3 पाठ करना उचित होता है दिन रविवार या मंगलवार से प्रारंभ करें।सर्व प्रथम देवी के मंदिरमे जा कर पंचोपचार विधि से पूजन करे।फल-फूल प्रदान करे।प्रसाद में खीर या इच्छानुसार मिष्ठान प्रदान कर मंदिर में ही 3 पाठ कर नित्य 3 पाठ करने की माता से अनुमति प्रदान करे।विधि प्रारम्भ करने के पहले हनुमानजी को प्रणाम करें एवं पूजा सम्पन्न होने पर श्री भैरव जी को प्रणाम करें।इनके बाद रोज अपने निवास स्थान पे एक नियमित समय पे पाठ करे।
ये सामान्य विधि है माता का आशीर्वाद अवश्य प्राप्त हो शारिरिक मानसिक एवं आध्यात्मिक रक्षा प्राप्त होती हैं।इसके अलावा जटिल विधि भी है सिद्ध करने की किन्तु इसे सिर्फ गुरु आदेश से और हो सके तो गुरु सानिध्य में ही कि जा सकती है।इस स्तोत्र मव भगवती आदिशक्ति नवदुर्गा जी शक्ति विद्यमान है।जिससे शारिक रक्षा,दुखो को दूर करने की शाक्ति है।किसी भी प्रकार के रोग ऋण शत्रु से मुक्ति प्राप्त होती है।यदि आपको लगता है कि आपके या आपके परिवार के ऊपर बाहर की बाधा हो,नजर दोष हो,तो इस कवच का पाठ अवश्य करे।यदि आप चाहे तो संकल्प प्रदान कर इस कवक्ज6 का जाप अनुष्ठान करा कर ,इसे कवच के रूप में धारण किया जा सकता है।किंतु स्मरण रहे अनुष्ठान हेतु अनुष्ठानकर्ता अनुभवी एवं सिद्ध हो।।
🕉️🙏🏻🚩आदेश-जयश्री माहाँकाल 🚩🙏🏻🕉️

👉व्यक्तिगत अनुभूति एवं विचार©२०१६
☯️।।राहुलनाथ।।™🖋️।....भिलाई,३६गढ़,भारत
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रविवार, 8 मई 2022

श्रीबगलामुखी_ध्यान_पंचास्त्र_शाबर_एवं_अन्य_मंत्र

#श्रीबगलामुखी_जयंती_की_हार्दिक_शुभकामनाएं
🚩🙏🏻🕉️🚩🙏🏻🕉️🚩🙏🏻🕉️🚩🙏🏻🕉️🚩🙏🏻🕉️

#श्रीबगलामुखी_ध्यान_पंचास्त्र_शाबर_एवं_अन्य_मंत्र
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ध्यान -1

मध्ये सुधाब्धिमणिमण्डपरत्नवेद्यां
सिंहासनोपरिगतां परिपीतवर्णाम्।
पीताम्बराभरणमाल्यबिभूतिषताङ्गी
देवीं स्मरामि धृतमुद्गर वैरिजिह्वाम्॥
चतुर्भुजां त्रिनयनां कमलासन संस्थितां।
त्रिशूलं पान पात्रं च गदा जिह्वां च विभ्रतीम्॥
बिम्बोष्ठी कंबुकण्ठीं च सम पीन पयोधरां।
पीताम्बरां मदाघूर्णां ध्यायेद् ब्रह्मास्व देवताम्॥

ध्यान -2
सौवर्णामनसंस्थितां त्रिनयनां पीतांशुकोल्लसिनीम्
हेमावांगरूचि शशांक मुकुटां सच्चम्पकस्रग्युताम्
हस्तैर्मुद़गर पाशवज्ररसना सम्बि भ्रति भूषणै
व्याप्तांगी बगलामुखी त्रिजगतां सस्तम्भिनौ चिन्तयेत्।

★ {बगलामुखी पंचास्त्र} ★
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※1※[वडवामुखी अथवा वडवास्त्र]-रण-स्तम्भन कारक है।
※2※[ उल्कामुखी अस्त्र]- तीनों लोकों का स्तम्भन करने में सक्षम है।
※3※[ज्वालामुखी अस्त्र]- देवताओं तथा ऋषियों का स्तम्भन करने में समर्थ है।
※4※[जातवेद मुखी अस्त्र]-ब्रह्मा-विष्णु-महेश का स्तम्भन एवं उनसे रक्षा हेतु ‘जातवेदमुखी’ का प्रयोग किया जाता है।
※5※[बृहदभानमुखी अस्त्र]-सभी प्रकार के काम्य प्रयोगों के लिए ‘वृहदभानुमुखी’ अस्त्र का प्रयोग किया है! यह इतना प्रभावशाली है कि इसके प्रयोग से सवा करोड़ त्रिपुरा समुदाय, 50 करोड़ भैरव, राक्षसों, नारसिंह का तथा करोड़ों पूतनाओं का स्तम्भन बिना किसी विशेष प्रयास के ही हो जाता है।
★★जय श्री पीतांबरा माई की★★

|| वडवामुखी मंत्र || 
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|| ॐ ह्लीं हूं ग्लौं बगलामुखि ह्लां ह्लीं ह्लूं सर्वदुष्टानां ह्लैं ह्लौं ह्लः वाचं मुखं स्तंभय ह्लः ह्लौं ह्लैं जिह्वां कीलय ह्लूं ह्लीं ह्लां बुद्धिं विनाशय ग्लौं हूं ह्लीं हुं फट् || विनियोगः- ॐ अस्य श्रीबगलामुखी-मन्त्रस्य वशिष्ठ ऋषिः, पंक्ति छन्दः, बगलामुखी देवता, ह्लीं बीजं, स्वाहा शक्तिः, सर्वशत्रु-क्षयार्थे जपे विनियोगः । ऋष्यादिन्यासः- नारद ऋषये नमः शिरसि । पंक्ति छन्दसे नमः मुखे । बगलामुखी देवतायै नमः हृदि । ह्लीं बीजाय नमः गुह्ये । स्वाहा शक्तये नमः पादयोः ।  सर्वशत्रु-क्षयार्थे जपे विनियोगाय नमः सर्वांगे ।

ध्यान
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हाथ में पीले फूल, पीले अक्षत और जल लेकर ‘ध्यान’ करे – पीताम्बरधरां देवीं द्विसहस्रभुजान्विताम् । अर्द्ध जिह्वां गदां चार्द्धं धारयन्तीं शिवां भजे ।। जपः- १२ लाख जप करें । हरताल की आहुति देवें । 

|| उल्कामुखी मंत्र || 
***************
|| ॐ ह्लीं ग्लौं वगलामुखि ॐ ह्लीं ग्लौं सर्व-दुष्टानां ॐ ह्लीं ग्लौं वाचं मुखं पदं ॐ ह्लीं ग्लौं स्तम्भय स्तम्भय ॐ ह्लीं ग्लौं जिह्वां कीलय ॐ ह्लीं ग्लौं बुद्धिं विनाशय ह्लीं ॐ ग्लौं ह्लीं ॐ स्वाहा || विनियोगः- ॐ अस्य श्रीबगलामुखी-मन्त्रस्य यज्ञवराह ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, ह्लीं बीजं, स्वाहा शक्तिः, ॐ कीलकं सर्वशत्रु-क्षयार्थे जपे विनियोगः । ऋष्यादिन्यासः- यज्ञवराह ऋषये नमः शिरसि । अनुष्टुप् छन्दसे नमः मुखे । ह्लीं बीजाय नमः हृदि । स्वाहा शक्तये नमः गुह्ये । ॐ कीलकाय नमः पादयो । सर्वार्थ सिद्धयर्थे जपे विनियोगाय नमः सर्वांगे ।

ध्यान
*****
हाथ में पीले फूल, पीले अक्षत और जल लेकर ‘ध्यान’ करे – विलयानलसंकाशं वीरावेशन संस्थिता । वीराट्टहास महादेवी स्तम्भनास्त्रं भजाम्यहम् ।। १४ लाख जप । हरताल की १ लाख आहुतियाँ देवे । सांख्यायन तंत्र में वीरावेशन संभृताम् । वीराश्रयां महादेवी स्तंभनार्थं भजाम्यहम् ।। लिखा है । 

|| जातवेदमुखी मंत्र || 
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|| ॐ ह्लीं ह्सौं ह्लीं ॐ वगलामुखि सर्व-दुष्टानां ॐ ह्लीं ह्सौं ह्लीं ॐ वाचं मुखं स्तम्भय स्तम्भय ॐ ह्लीं ह्सौं ह्लीं ॐ जिह्वां कीलय ॐ ह्लीं ह्सौं ह्लीं ॐ बुद्धिं नाशय नाशय ॐ ह्लीं ह्सौं ह्लीं ॐ स्वाहा || पाठान्तर भेद में कहीं “पदं” नहीं है तथा विनाशय के स्थान पर नाशय है । 

विनियोग
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 ॐ अस्य श्रीबगलामुखी-मन्त्रस्य, कालाग्निरुद्र ऋषिः, पंक्ति छन्दः, ॐ बीजं, ह्रीं शक्तिः, हूं कीलकं ममाभीष्ट सिद्धये जपे विनियोगः । (सांख्या॰ तंत्र में ह्लीं शक्ति, ह्रौं कीलक कहा है) 
ध्यानम् 
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जातवेदमुखीं देवीं देवतां प्राणरुपिणीं । भजेऽहं स्तंभनार्थं च चिन्मयी विश्वरुपिणीम् ।। पुरश्चरणः- ३० लाख जप ।

 || ज्वालामुखी मंत्र || 
****************₹
|| ॐ ह्लीं रां रीं रुं रैं रौं प्रस्फुर प्रस्फुर ज्वाला-मुखि ॐ ह्लीं रां रीं रुं रैं रौं प्रस्फुर प्रस्फुर सर्व-दुष्टानां ॐ ह्लीं रां रीं रुं रैं रौं प्रस्फुर प्रस्फुर वाचं मुखं पदं स्तम्भय स्तम्भय ॐ ह्लीं रां रीं रुं रैं रौं प्रस्फुर प्रस्फुर जिह्वां कीलय कीलय ॐ ह्लीं रां रीं रुं रैं रौं प्रस्फुर प्रस्फुर बुद्धिं विनाशय विनाशय ॐ ह्लीं रां रीं रुं रैं रौं प्रस्फुर प्रस्फुर स्वाहा || पाठान्तर भेद में विनाशय के स्थान पर नाशय हैं तथा कईं आचार्यों का मत है कि ज्वालामुखि के स्थान पर बगलामुखि होना चाहिए । 
विनियोग
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ॐ अस्य श्रीबगलामुखी-मन्त्रस्य, अत्रि ऋषिः, गायत्री छन्दः, ह्लीं बीजं, स्वाहा शक्तिः, ॐ कीलकं सर्वशत्रु स्तंभनार्थे, क्षयार्थे जपे विनियोगः । 
ध्यान
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ज्वलत्पुञ्ज समायुक्तां कालानल समप्रभाम् । चिन्मयीं स्तंभनाद्देवीं भजेऽहं विधिपूर्वकम् ।। १२ लाख जप, हरताल से २ लाख आहुति, गोदुग्ध से तर्पण ४ लाख, ब्राह्मण-भोजन दो हजार करे । 

|| वृहद्भानुमुखी मंत्र || 
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|| ॐ ह्ल्रां ह्ल्रीं ह्ल्रूं ह्ल्रैं ह्ल्रौं ह्ल्रः ह्ल्रां ह्ल्रीं ह्ल्रूं ह्ल्रैं ह्ल्रौं ह्ल्रः ॐ वगलामुखि १४ सर्व-दुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय स्तम्भय १४ जिह्वां कीलय १४ बुद्धिं नाशय १४ ॐ स्वाहा || पाठान्तर भेद “ह्ल्रां ह्ल्रीं” के स्थान पर “ह्लां ह्लीं” तथा विनाशय के स्थान पर नाशय है । 
यह विद्या शत्रु का तेजहरण तथा स्तंभन करती है । परविद्या स्तंभन कर स्वविद्या प्रकाशित करती है ।
 विनियोग
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 ॐ अस्य श्रीबगलामुखी-मन्त्रस्य, अत्रि ऋषिः, गायत्री छन्दः, ह्लीं बीजं, ह्रीं शक्तिः, ॐ कीलकं परसैन्य परविद्या स्तंभनार्थे स्वविद्या प्रकाशनार्थे जपे विनियोगः । 
ध्यान
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 कालानलनिभां देवीं ज्वलत्पुञ्ज शिरोरुहां । कोटिबाहु समायुक्तां वैरिजिह्वां समन्वितान् ।। स्तंभनास्त्रमयीं देवीं दृढपीनपयोधराम् । मदिरामोद संयुक्तां वृहद्भानुमुखीं भजे ।। १२ लाख जप, दशांश तालक हवन, गुडोदक तर्पण दशांश ब्राह्मण भोजन ।

#मां_बगलामुखी_के_विशेष_मंत्र 
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ॐ ह्लीं बगलामुखी देव्यै सर्व दुष्टानाम वाचं मुखं पदम् स्तम्भय जिह्वाम कीलय-कीलय बुद्धिम विनाशाय ह्लीं ॐ नम:

मां बगलामुखी का भयनाशक मंत्र
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ॐ ह्लीं ह्लीं ह्लीं बगले सर्व भयं हर: 

शत्रु नाशक मंत्र
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ॐ बगलामुखी देव्यै ह्लीं ह्रीं क्लीं शत्रु नाशं कुरु

सर्व बाधा नाशक मंत्र
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ॐ ह्लीं श्रीं ह्लीं पीताम्बरे तंत्र बाधां नाशय नाशय

शत्रुनाशक मंत्र
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ॐ नम: सर्वांगं श्री बगलामुखी देवता प्रसाद सिद्धयर्थ न्यासे विनियोग: । ॐ ऐं ह्रीं श्रीं बगलामुखी सर्वदृष्टानां मुखं स्तम्भिनि सकल मनोहारिणी अम्बिके इहागच्छ सन्निधि कुरू सर्वार्थ साधय साधय स्वाहा ।

#बगलामुखी_शाबर_मंत्र
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बगलामुखी शाबर मंत्र – 1

ॐ मलयाचल बगला भगवती महाक्रूरी महाकराली राजमुख बन्धनं ग्राममुख बन्धनं ग्रामपुरुष बन्धनं कालमुख बन्धनं चौरमुख बन्धनं व्याघ्रमुख बन्धनं सर्वदुष्ट ग्रह बन्धनं सर्वजन बन्धनं वशीकुरु हुं फट् स्वाहा।

बगलामुखी शाबर मंत्र – 2
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ॐ सौ सौ सुता समुन्दर टापू, टापू में थापा, सिंहासन पीला, सिंहासन पीले ऊपर कौन बैसे? सिंहासन पीला ऊपर बगलामुखी बैसे। बगलामुखी के कौन संगी, कौन साथी? कच्ची बच्ची काक कुतिआ स्वान चिड़िया। ॐ बगला बाला हाथ मुदगर मार, शत्रु-हृदय पर स्वार, तिसकी जिह्ना खिच्चै। बगलामुखी मरणी-करणी, उच्चाटन धरणी , अनन्त कोटि सिद्धों ने मानी। ॐ बगलामुखीरमे ब्रह्माणी भण्डे, चन्द्रसूर फिरे खण्डे-खण्डे, बाला बगलामुखी नमो नमस्कार।

बगलामुखी शाबर मत्रं-3
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ॐ बगलामुखी महाक्रूरी शत्रू की जिह्वा को पकड़कर मुदगर से प्रहार कर , अंग प्रत्यंग स्तम्भ कर घर बाघं व्यापार बांध तिराहा बांध चौराहा बांध चार खूँट मरघट के बांध जादू टोना टोटका बांध दुष्ट दुष्ट्रनी कि बिध्या बांध छल कपट प्रपंचों को बांध सत्य नाम आदेश गुरू का।

बगलामुखी शाबर मंत्र – 4
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कच्ची बच्ची काक कुतिआ स्वान चिड़िया। ॐ बगला बाला हाथ मुदगर मार, शत्रु-हृदय पर स्वार, तिसकी जिह्ना खिच्चै। बगलामुखी मरणी-करणी, उच्चाटन धरणी , अनन्त कोटि सिद्धों ने मानी। ॐ बगलामुखीरमे ब्रह्माणी भण्डे, चन्द्रसूर फिरे खण्डे-खण्डे, बाला बगलामुखी नमो नमस्कार।
संकलित पोस्ट द्वारा
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🕉️🙏🏻🚩आदेश-जयश्री माहाँकाल 🚩🙏🏻🕉️
लेखन-सम्पादन-संकलन
#राहुलनाथ_™ 🖋️....
ज्योतिषाचार्य,भिलाई'३६गढ़,भारत
#आपके_हितार्थ_नोट:- पोस्ट ज्ञानार्थ एवं शैक्षणिक उद्देश्य हेतु ग्रहण करे।बिना गुरु या मार्गदर्शक के निर्देशन के साधनाए या प्रयोग ना करे।

रहस्य secret

रहस्य secret
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जीवन मे हमारे कुछ रहस्य,राज (secret)।
ऐसे होते है जिसे हम स्वयं को भी नही बता सकते।
सकारात्म रहस्य आपको शक्ति-इच्छापूर्ति-प्राण।
ऊर्जाओं को प्रदान करते है।
वही नकारात्मक रहस्य आपके जीवन का।
हनन कर वर्तमान एवं भविष्य में भी। 
हमे दुःख एवं निराशा ही प्रदान करते है।
अतः प्रयास करे कि जीवन रहस्यात्मक 
ना हो और यदि हो भी तो सकारात्मक 
जैसे:-किसी की मदद,दान,भक्ति,सेवा 
एवं बड़ो का सम्मान आदी।
🕉️🙏🏻🚩जयश्री माहाँकाल 🚩🙏🏻🕉️
👉व्यक्तिगत अनुभूति 

☯️राहुलनाथ™ 🖋️।..