रविवार, 8 मई 2022

श्री शिव स्तुति

श्री शिव स्तुति 

शीश गंग अर्धांग पार्वती सदा विराजत कैलासी!
नंदी भृंगी नृत्य करत है, गुणभक्त  शिव की दासी!!

सीतल मद्सुगंध पवन बहे बैठी हैं शिव अविनाशी!
करत गान गन्धर्व सप्त सुर, राग - रागिनी सब गासी!!

अक्ष रक्ष भैरव जह डोलत बोलत है अनेक वासी!
कोयल शब्द सुनावत सुन्दर, भ्रमर करत है गुन्जासी!!

कल्प वृक्ष अरु पारिजात लग रहे हैं लक्षासी!
सूर्य कांति सम पर्वत शोभित, चन्द्रकान्ति नव मीमासी!!

छहों ऋतु नित फलत फुलत है पुष्प चढत है वर्षा सी!
देव मुनि जन की भीड़ पडत, निगम रहत जो नितगासी !!

ब्रह्मा विष्णु जाको ध्यान धरत है, कछु शिव हमको परमसी!
ऋद्धि-सिद्धि के दाता शंकर, सदा आनंदित सुखरासी!!

जिनके सुमिरन सेवा करते टूट जाये यम की फांसी!
त्रिशूल फरसा का ध्यान निरंतर, मन लगाये कर जो ध्यासी!!

दूर करे विपदा शिव तिनकी जन्म सफल शिव्पदपासी!
कैलाशी काशी के वासी, अविनाशी सुध मेरी लीज्यो!
सेवक जान सदा चरनन को अपनी जान दरस दीज्यो!!

तुम तो प्रभु सदा सयाने, अवगुण मेरे सदा ढकियो!
सब अपराध क्षमा कर राहुलनाथ किंकर की विनती सुनियो!!
🕉️🙏🏻🚩जयश्री माहाँकाल 🚩🙏🏻🕉️

☯️।।राहुलनाथ।।™🖋️।....
  भिलाई,३६गढ़,भारत

नीलकंठ_स्तोत्रम्

#नीलकंठ_स्तोत्रम्
विनियोग: – 
ॐ अस्य श्री भगवान नीलकंठ सदा-शिव-स्तोत्र मंत्रस्य श्री ब्रह्मा ऋषिः, अनुष्ठुप छन्दः, श्री नीलकंठ सदाशिवो देवता, ब्रह्म बीजं, पार्वती शक्तिः, मम समस्त पापक्षयार्थं क्षेम-स्थै-आर्यु-आरोग्य-अभिवृद्धयर्थंमोक्षादि-चतुर्वर्ग-साधनार्थं च श्री नीलकंठ-सदाशिव-प्रसाद-सिद्धयर्थे जपे विनियोगः।

ऋष्यादि-न्यास: –
श्री ब्रह्मा ऋषये नमः शिरसि। अनुष्टुप छन्दसेनमः मुखे। श्री नीलकंठ सदाशिव देवतायै नमः हृदि।

ब्रह्म बीजाय नमः लिंगे। पार्वती शक्त्यैनमः नाभौ। मम समस्त पापक्षयार्थंक्षेम-स्थै-आर्यु-आरोग्य-अभिवृद्धयर्थं

मोक्षादि-चतुर्वर्ग-साधनार्थंच श्रीनीलकंठ-सदाशिव-प्रसाद-सिद्धयर्थे च विनियोगाय नमः सर्वांगे।
#स्तोत्र
ॐ नमो नीलकंठाय, श्वेत-शरीराय, सर्पा लंकार भूषिताय, भुजंग परिकराय, नागयज्ञो पवीताय, अनेक मृत्यु विनाशाय नमः। युग युगांत काल प्रलय-प्रचंडाय, प्र ज्वाल-मुखाय नमः। दंष्ट्राकराल घोर रूपाय हूं हूं फट् स्वाहा। ज्वालामुखाय, मंत्र करालाय, प्रचंडार्क सहस्त्रांशु चंडाय नमः। कर्पूर मोद परिमलांगाय नमः।

ॐ ह्रां ह्रीं ह्रीं स्फुर अघोर रूपाय रथ रथ तंत्र तंत्र चट् चट् कह कह मद मद दहन दाहनाय ह्रीं स्फुर स्फुर प्रस्फुर प्रस्फुर घोर घोर तनुरूप चट चट प्रचट प्रचट कह कह वम वम बंध बंध घातय घातय हूं फट् जरा मरण भय हूं हूं फट् स्वाहा।

अनंताघोर ज्वर मरण भय क्षय कुष्ठ व्याधि विनाशाय, शाकिनी डाकिनी ब्रह्मराक्षस दैत्य दानव बंधनाय, अपस्मार भूत बैताल डाकिनी शाकिनी सर्व ग्रह विनाशाय, मंत्र कोटि प्रकटाय पर विद्योच्छेदनाय, हूं हूं फट् स्वाहा। आत्म मंत्र सरंक्षणाय नमः।

ॐ ह्रां ह्रीं हौं नमो भूत डामरी ज्वालवश भूतानां द्वादश भू तानांत्रयो दश षोडश प्रेतानां पंच दश डाकिनी शाकिनीनां हन हन।

दहन दारनाथ! एकाहिक द्वयाहिक त्र्याहिक चातुर्थिक पंचाहिक व्याघ्य पादांत वातादि वात सरिक कफ पित्तक काश श्वास श्लेष्मादिकं दह दह छिन्धि छिन्धि श्रीमहादेव निर्मित स्तंभन मोहन वश्याकर्षणोच्चाटन कीलना द्वेषण इति षट् कर्माणि वृत्य हूं हूं फट् स्वाहा।

वात-ज्वर मरण-भय छिन्न छिन्न नेह नेह भूतज्वर प्रेतज्वर पिशाचज्वर रात्रिज्वर शीतज्वर तापज्वर बालज्वर कुमारज्वर अमितज्वर दहनज्वर ब्रह्मज्वर विष्णुज्वर रूद्रज्वर मारीज्वर प्रवेशज्वर कामादि विषमज्वर मारी ज्वर प्रचण्ड घराय प्रमथेश्वर! शीघ्रं हूं हूं फट् स्वाहा।

#नीलकंठ_मंत्र 
।।ॐ नमो नीलकंठाय, दक्षज्वरध्वंसनाय श्री नीलकंठाय नमः।।

।।इतिश्री नीलकंठ स्तोत्र संपूर्ण:।।

सूर्यकवचम_सहित_आदित्य_हृदय_स्तोत्र

#सूर्यकवचम_सहित_आदित्य_हृदय_स्तोत्र
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अथ सूर्यकवचम ।।
****सूर्य स्तुति*****
1- श्रणुष्व मुनिशार्दूल सूर्यस्य कवचं शुभम्।
शरीरारोग्दं दिव्यं सव सौभाग्य दायकम्।।

अर्थात- यह सूर्य कवच शरीर को आरोग्य देने वाला है 
तथा संपूर्ण दिव्य सौभाग्य को देने वाला है।

2- देदीप्यमान मुकुटं स्फुरन्मकर कुण्डलम।
ध्यात्वा सहस्त्रं किरणं स्तोत्र मेततु दीरयेत्।।

अर्थात- चमकते हुए मुकुट वाले डोलते हुए मकराकृत कुंडल वाले हजार किरण (सूर्य) को ध्यान करके यह स्तोत्र प्रारंभ करें।

3- शिरों में भास्कर: पातु ललाट मेडमित दुति:।
नेत्रे दिनमणि: पातु श्रवणे वासरेश्वर:।।

अर्थात- मेरे सिर की रक्षा भास्कर करें, अपरिमित कांति वाले ललाट की रक्षा करें। नेत्र (आंखों) की रक्षा दिनमणि करें तथा कान की रक्षा दिन के ईश्वर करें।

4- ध्राणं धर्मं धृणि: पातु वदनं वेद वाहन:।
जिव्हां में मानद: पातु कण्ठं में सुर वन्दित:।।

अर्थात- मेरी नाक की रक्षा धर्मघृणि, मुख की रक्षा देववंदित, जिव्हा की रक्षा मानद् तथा कंठ की रक्षा देव वंदित करें।

5- सूर्य रक्षात्मकं स्तोत्रं लिखित्वा भूर्ज पत्रके।
दधाति य: करे तस्य वशगा: सर्व सिद्धय:।।

अर्थात- सूर्य रक्षात्मक इस स्तोत्र को भोजपत्र में लिखकर जो हाथ में धारण करता है तो संपूर्ण सिद्धियां उसके वश में होती है।

6- सुस्नातो यो जपेत् सम्यग्योधिते स्वस्थ: मानस:।
सरोग मुक्तो दीर्घायु सुखं पुष्टिं च विदंति।।

अर्थात- स्नान करके जो कोई स्वच्छ चित्त से कवच पाठ करता है वह रोग से मुक्त हो जाता है, दीर्घायु होता है, सुख तथा यश प्राप्त होता है।

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#आदित्य_हृदय_स्तोत्र 
विनियोग
ॐ अस्य आदित्यह्रदय स्तोत्रस्य अगस्त्यऋषि: अनुष्टुप्छन्दः आदित्यह्रदयभूतो भगवान् ब्रह्मा देवता निरस्ताशेषविघ्नतया ब्रह्माविद्यासिद्धौ सर्वत्र जयसिद्धौ च विनियोगः

#पूर्व_पिठिता 
ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम्‌ । 
रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम्‌ ॥1॥
दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम्‌ । 
उपगम्याब्रवीद् राममगस्त्यो भगवांस्तदा ॥2॥
राम राम महाबाहो श्रृणु गुह्मं सनातनम्‌ । 
येन सर्वानरीन्‌ वत्स समरे विजयिष्यसे ॥3॥
आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम्‌ ।
 जयावहं जपं नित्यमक्षयं परमं शिवम्‌ ॥4॥
सर्वमंगलमागल्यं सर्वपापप्रणाशनम्‌ । चिन्ताशोकप्रशमनमायुर्वर्धनमुत्तमम्‌ ॥5॥

#मूल_स्तोत्र 
रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम्‌ । पुजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम्‌ ॥6॥

सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावन: । एष देवासुरगणांल्लोकान्‌ पाति गभस्तिभि: ॥7॥
एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिव: स्कन्द: प्रजापति: । 
महेन्द्रो धनद: कालो यम: सोमो ह्यापां पतिः ॥8॥
पितरो वसव: साध्या अश्विनौ मरुतो मनु: ।
 वायुर्वहिन: प्रजा प्राण ऋतुकर्ता प्रभाकर: ॥9॥
आदित्य: सविता सूर्य: खग: पूषा गभस्तिमान्‌ । 
सुवर्णसदृशो भानुर्हिरण्यरेता दिवाकर: ॥10॥
हरिदश्व: सहस्त्रार्चि: सप्तसप्तिर्मरीचिमान्‌ ।
 तिमिरोन्मथन: शम्भुस्त्वष्टा मार्तण्डकोंऽशुमान्‌ ॥11॥
हिरण्यगर्भ: शिशिरस्तपनोऽहस्करो रवि: ।
 अग्निगर्भोऽदिते: पुत्रः शंखः शिशिरनाशन: ॥12॥
व्योमनाथस्तमोभेदी ऋग्यजु:सामपारग: । 
घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथीप्लवंगमः ॥13॥
आतपी मण्डली मृत्यु: पिगंल: सर्वतापन:। 
कविर्विश्वो महातेजा: रक्त:सर्वभवोद् भव: ॥14॥
नक्षत्रग्रहताराणामधिपो विश्वभावन: । 
तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन्‌ नमोऽस्तु ते ॥15॥
नम: पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नम: । 
ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नम: ॥16॥
जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नम: ।
 नमो नम: सहस्त्रांशो आदित्याय नमो नम: ॥17॥
नम उग्राय वीराय सारंगाय नमो नम: ।
 नम: पद्मप्रबोधाय प्रचण्डाय नमोऽस्तु ते ॥18॥
ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सुरायादित्यवर्चसे । 
भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नम: ॥19॥
तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने ।
 कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नम: ॥20॥
तप्तचामीकराभाय हरये विश्वकर्मणे । 
नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे ॥21॥
नाशयत्येष वै भूतं तमेष सृजति प्रभु: । 
पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभि: ॥22॥
एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठित: । 
एष चैवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम्‌ ॥23॥
देवाश्च क्रतवश्चैव क्रतुनां फलमेव च । 
यानि कृत्यानि लोकेषु सर्वेषु परमं प्रभु: ॥24॥
एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च । 
कीर्तयन्‌ पुरुष: कश्चिन्नावसीदति राघव ॥25॥
पूजयस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगप्ततिम्‌ । 
एतत्त्रिगुणितं जप्त्वा युद्धेषु विजयिष्यसि ॥26॥
अस्मिन्‌ क्षणे महाबाहो रावणं त्वं जहिष्यसि । 
एवमुक्ता ततोऽगस्त्यो जगाम स यथागतम्‌ ॥27॥
एतच्छ्रुत्वा महातेजा नष्टशोकोऽभवत्‌ तदा ॥ 
धारयामास सुप्रीतो राघव प्रयतात्मवान्‌ ॥28॥
आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वेदं परं हर्षमवाप्तवान्‌ । 
त्रिराचम्य शूचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान्‌ ॥29॥
रावणं प्रेक्ष्य हृष्टात्मा जयार्थं समुपागतम्‌ । 
सर्वयत्नेन महता वृतस्तस्य वधेऽभवत्‌ ॥30॥
अथ रविरवदन्निरीक्ष्य रामं मुदितमना: परमं प्रहृष्यमाण: ।
निशिचरपतिसंक्षयं विदित्वा सुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति ॥31॥

।।सम्पूर्ण ।।
🕉️🙏🏻🚩जयश्री माहाँकाल 🚩🙏🏻🕉️

☯️।।राहुलनाथ।।™🖋️।....भिलाई,३६गढ़,भारत
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शिव आदेश

#शिव_आदेश
ॐ अलख निरंजन शिव को आदेश।
अविगत महापुरुष मूल पुरुष पुरुषोत्तम आद पुरुष शिव को आदेश। ज्योति-परमज्योति-अयोनि रूद्र शिव को आदेश। विशूनी विश्वमूर्ति पाताल ग्रहणी शिव को आदेश। मुखेवेद पुराण नासिका गंगा - जमना - सरस्वती शिव को आदेश। ललाटी चंद मस्तके त्रिकुटा देवता धारी शिव को आदेश। नक्षत्री माला अठारह भार वनस्पती हृदय के तैतीस करोड़ देवता धारी शिव को आदेश। सेली सिंगी मीन मेखला बाघाम्बरधारी रोम - रोम सप्त सागरा शिव को आदेश। शिव के बायीं ओर निर्गुण ब्रहम् दाहिनी ओर शक्ति महामाया बीच में स्वयं पूर्ण अखण्ड   ज्योति स्वरूप शिव को आदेश। विभूति धारी बीज मंत्र घोर मंत्र अघोर मंत्र क्षीर मंत्र गायत्री मंत्र अभय जाप तंत्र - मंत्र स्वरूप शिव को आदेश। नर - नारी भूत - प्रेत यक्ष किन्नर इन्द्रादि देवता ब्रह्माण्ड व्यापक शिव को आदेश। साधु - संत योगी - ज्ञानी तपस्वी त्यागी अवधूत हर भक्त के ईष्ट शिव को आदेश। जीवों का आराध्या शिव को आदेश। सूक्ष्म में सूक्ष्म विराटों में व्यापक महातत्त्व शिव को आदेश। सृष्टि उत्पत्ति संहार पालन पंच महातत्त्व शिव को आदेश। चार खानी चार बानी चन्द सूर पवन पानी शिव को आदेश। चराचर सृष्टि का बिज शिव को आदेश। करोड़ों सूर्य प्रकाशनाथ योग आदर्श शिव को आदेश। परमात्मपूर्ण आनंद सर्व शक्तिमान चैतन्य रूप जितेन्द्र मोक्ष कैवल्य मुक्तिदाता भिन्न - अभिन्न शिव को आदेश। महाज्ञानी कृपा साक्षात्कार शिव को आदेश। सर्वनाथ सिद्धों का सतगुरु आदिनाथजि ॐकार शिव को आदेश। इतना शिव सबद निरूपा सम्पूर्ण भया। श्रीनाथजी गुरुजी को आदेश।
श्रीशंभुजती गुरु गोरखनाथ बाल स्वरूप बोलिए। इतना नौ नाथ स्वंरूप मंत्र सम्पूर्ण भया अनन्त कोट सिद्धों में बैठकर गुरु गोरखनाथजि ने कहाया नाथजी गुरुजी आदेश।संकलित पोस्ट व्हाट्सएप द्वारा
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लेखन-सम्पादन-संकलन
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ज्योतिषाचार्य,भिलाई'३६गढ़,भारत

शनिवार, 19 मार्च 2022

भोजन कैसे ग्रहण करे

भोजन कैसे ग्रहण करे
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दोनों हाथ दोनों पैर और मुख इन 5 अंगों को धोकर भोजन करना चाहिए ऐसा करने वाला मनुष्य दीर्घ जीवी होता है।

गीले पैरों वाला होकर भोजन करें पर गीले पैरों से सोए नहीं,गीले पैरों वाला होकर भोजन करने वाला मनुष्य लंबी आयु को प्राप्त करता है।

सूखे पैर और अंधेरे में भोजन कदापि नहीं करना चाहिए।

शास्त्र में मनुष्य के लिए प्रातः काल और सायंकाल दो ही समय भोजन करने का विधान है बीच में भोजन करने की विधि नहीं देखी गई है,जो इस नियम का पालन करता है उसे उपवास करने का फल प्राप्त होता है।

मनुष्य की एक बार भोजन देवताओं का भाग दूसरी बार का भोजन मनुष्य का भाग,तीसरी बार का भोजन प्रेतों का भाग और चौथी बार का भोजन राक्षसों का भाग होता है।

संध्या काल में भोजन नहीं करना चाहिए।

गृहस्थी को चाहिए कि वह पहले देवताओंको,ऋषियोंको मनुष्यको(अतिथि) को पितरों को और घर के देवताओं का पूजन कर के पीछे स्वयं भोजन करें।

भोजन सदा पूर्व अथवा उत्तर की ओर मुख करके करना चाहिए पूर्व की ओर मुख करके खाने से मनुष्य की आयु बढ़ती है दक्षिण दिशा की ओर मुख करके खानेसे प्रेतत्वतत्व की प्राप्ति होती है पश्चिम की ओर मुख करके खाने से मनुष्य रोगी होता है और उत्तर की ओर मुख करके जाने से आयु तथा धन की प्राप्ति होती है।

सदा एकांत में ही भोजन करना चाहिए।

ईख, जल,दूध,कंद,तांबूल,फल और औषध इनका सेवन स्नान किए बिना भी कर सकते हैं इनका सेवन करने के बाद भी स्नान दान यज्ञ तर्पण आदि क्रियाएं कर सकते हैं।

एक ही वस्त्र पहनकर भोजन नहीं करना चाहिए सारे शरीर को कपड़े से ढक कर भी भोजन न करें जो मनुष्य सिरको ढक कर खाता है दक्षिण दिशा की ओर मुख करके खाता है जूते पहनकर खाता है और पैर धोए बिना खाता है उसके अन्न को प्रेत खाते हैं तथा उसका वह सारा भोजन असुर समझना चाहिए।

भोजन की वस्तु गोद में रखकर नहीं खानी चाहिए,

टूटे-फूटे हुए बर्तन में भोजन नहीं करना चाहिए,टूटे हुए बर्तन में खाने वाला चांद्रायण व्रत करने से शुद्ध होता है।

शैया पर बैठकर भोजन ना करें तथा जल ना पिये। हाथ में लेकर भोजन न करें और आसन पर थाली रख कर भोजन ना करें।
भविष्य में इसी विषय पे जानकारी प्रेषित की जाएगी जो पूर्णतः शास्त्रोक्त होगी।'क्या करें,क्या ना करें?'१३८१आचार-संहिता, गीताप्रेस,गोरखपुर

लेखन-सम्पादन-संकलन
☯️राहुलनाथ™ 🖋️....
ज्योतिषाचार्य,भिलाई'३६गढ़,भारत

गुरु-शिष्य के लिए उपयोगी मार्गदर्शन

गुरु-शिष्य के लिए उपयोगी मार्गदर्शन
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१.गुरु को चाहिए कि वह शिष्य को पुत्र की तरह मांनता हुआ और उसकी उन्नति की इच्छा करता हुआ सभी धर्मों में कुछ भी गुप्त न रखते हुए उसे विद्या प्रदान करें ।

२.गुरु आपत्तिकाल के सिवाय अन्य समय में शिष्य के शिक्षा अध्ययन में पहुंचा कर उसे अपने किसी कार्य में ना लगाएं।

३.गुरु को बहुत विचार करके ही किसी को शिष्य बनाना चाहिए अन्यथा शिष्य के दोष के कारण गुरु नरक में जा सकता है।

४.जिस प्रकार मंत्री का पाप राजा को और स्त्री का पति को प्राप्त होता है उसी प्रकार निश्चय ही शिष्य का पाप गुरु को प्राप्त होता है।

५.भ्रूण हत्या करने वाला,अपना अन्न खाने वाले को,व्यभिचारीणी स्त्री पति को,शिष्य गुरु को, यजमान गुरु को और चोर राजा को अपना अपना पाप दे देते हैं

६.एकमात्र पति ही स्त्रियों का गुरु है अतः स्त्री को पति के सिवाय किसी को भी गुरु नहीं बनाना चाहिए।

७.शिष्य को गुरु के साथ एक आसन पर नहीं बैठना चाहिए परंतु वह
बैलगाड़ी,घोड़ागाड़ी,ऊंठगाड़ी,महल की छत, कुशकी, चटाई, शिलाखंड और नाव पर गुरुके साथ बैठ सकता है।

८.शिष्य को चाहिए कि जिस आसन पर गुरु बैठते हो उस पर वह न बैठे और  जिस शैय्या पर वे सोते हो उस पर न सोये।

९.गुरु के सामने किसी वस्तु का सहारा लगाकर अथवा पैरों को फैलाकर नहीं बैठना चाहिए।

१०.शिष्य को चाहिए कि वह गुरु को अपेक्षा अपने अन्न, वस्त्र तथा वेश को हीन(कम) रखे।वह गुरु के सो कर उठने से पहले उठे और उनके सोने के बाद सोए।
११.क्रुद्ध  गुरु के मुख पर दृष्टि नहीं डालनी चाहिए।

१२. शिष्य को चाहिए कि वह परोक्ष में भी गुरु के नाम का उच्चारण न करें और गुरु के गति भाषण आदि की नकल न करें ।

१३.जो मनुष्य उदासीन एवं दुराचारी गुरु की मंत्र दीक्षा ग्रहण करता है वह निश्चय ही धनहीन हो जाता है।

१४.जो दृष्ट संकल्प वाले निषिद्ध( दुराचारी) गुरु का शिष्य बनता है,उसे महाप्रलयपर्यन तक उसे पुनः मनुष्य शरीर नहीं मिलता 

१५.यदि गुरु भी घमंड में आकर कर्तव्य और अकर्त्तव्य का ज्ञान  खो बैठे और गलत रास्ते पर चलने लगे तो उसका तो त्याग कर देना चाहिए।

१६.ज्ञानरहित और मिथ्यावादी और भ्रम पैदा करने वाले ग़ुरूका त्याग कर देना चाहिए क्योंकि जो खुद शांति नहीं प्राप्त कर  सका वह दूसरों को शांति कैसे देगा।

१७. जिसके पास एक वर्ष तक रहने पर भी शिष्य को थोड़ा से भी आनंद और प्रबोध की उपलब्धि न हो तो शिष्य उसे छोड़कर दूसरे गुरु का आश्रय ले।
भविष्य में इसी विषय पे जानकारी प्रेषित की जाएगी जो पूर्णतः शास्त्रोक्त होगी।'क्या करें,क्या ना करें?'१३८१आचार-संहिता, गीताप्रेस,गोरखपुर
🕉️🙏🏻🚩जयश्री माहाँकाल 🚩🙏🏻🕉️

लेखन-सम्पादन-संकलन
☯️राहुलनाथ™ 🖋️....
ज्योतिषाचार्य,भिलाई'३६गढ़,भारत

स्मशान और साधक का वैराग्य

स्मशान और साधक का वैराग्य


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पुरानान्ते,भोजनान्ते, मैथुनान्ते,स्मशानान्ते च या मते:।
सा मते: सर्वदा चेत् स्यात्  को न मुच्यत बंधनात नरो नारायणो भवेत्।।

पुराणों को सुनने के बाद अंत मे मन की गति में परिवर्तन हो जाता है,भोजन ग्रहण करने के बाद अंत मे पेट भर जाने से भोजन से मन हट जाता है।मैथुन की प्रबल इच्छा रखने वाले जीव-मानवो का मैथुन के बाद अचानक मन हट जाती है और इसी प्रकार स्मशान में किसी का दाह संस्कार करने के बाद इस संसार से कुछ समय के लिए मन मे संसार के लिए वैराग्य पैदा हो जाता है और मनुष्य अमन हो जाता है।इस समय जैसी बुद्धि हो जाती है अगर ऐसी बुद्धि सदा के लिए हो जाये तो,ऐसा कौन है जो बंधनो से मुक्त हो नारायण नही बन सकता।
स्मशान एक ऐसा स्थान है जहां प्रवेश करते ही संसार की नश्वरता का आभास होता है,मन मे संसार के लिए वैराग्य पैदा हो जाता है और मनुष्य अमन हो जाता है।स्मशान में जाकर साधना करने का यही अभिप्राय होता है कि वैरागय की भवाना का उदय हो और भय का सर्वनाश हो।किन्तु आज का साधक घर मे रहकर पुस्तकों को पढ़कर सिद्धि प्राप्त करना चाहता है सिद्ध अघोरी या तांत्रिक बनना चाहता है।साधको को यदि साधना सिद्धि में सफलता पानी है तो साधक को कठोर परिश्रम करना ही होगा,गुरुधाम,शिवालय या स्मशान जाना ही होगा,इन स्थानों से रिश्ता-नाता जोड़ना ही होगा।
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