रविवार, 16 दिसंबर 2018

नवार्ण मंत्र और मेरी अनुभूति


नवार्ण मंत्र और मेरी अनुभूति
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यह अनुभूति होगी 2006 के आस-पास की।
इस समय मैं देवी चामुंडा के मंत्रो का जाप कर रहा था करीब 78000 जाप हो चुके थे।देवी चामुंडा का नवार्ण मंत्र(ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे) अपने आप मे दिव्य एवं चमत्कारी मंत्र है कुंडलिनी साधना के लिए ए एक अमोघ मंत्र है इस मंत्र के ॐ का न्यास मस्तक शीर्ष पे करके बाकी अक्षरों का न्यास शरीरस्थ अन्य चक्रो पे करके,हर चक्रो पे हर अक्षरों के साथ ध्यान लगाया जाए तो कुंडलिनी शक्ति बहुत जल्दी जागृत हो जाती है यहां बस आपको ध्यान लगाने की कला का ज्ञान होना चाहिए।या फिर आप किसी एक चक्र पे ध्यान लगा कर भी सम्पूर्ण जाप कर सकते है ये आपपे निर्भर करता है कि आप कौन सी विधि का उपयोग करना पसंद करते है।उन दिनों मैं स्वाधिस्ठान चक्र पे साधना कर रहा था जिसकी अधिकृत देवी माँ दुर्गा है।मेरी विधि के अनुसार मैं पहले सारे चक्रो पे 7 माला जाप कर ध्यान लगाकर फिर 7 माला किसी एक चक्र पे ध्यान केंद्रित करता था।
पूजा पाठ पर आधारित उन दिनों में मुझे अधिक समस्या हुई थी समस्या ऐसी थी कि मुझे एक खुशबू आ रही थी बार-बार बहुत ही अलग सी खुशबू थी वो,उसको मैं कभी पहचान नहीं पाया था उस समय तक इसकी खुशबू मुझे नहीं पता थी कि ये किसकी खुशबू है या बदबु और कहा से आ रही थी,एक नया अनुभव था मैं परेशान था सुबह से लेकर रात तक मैं परेशान रहता था। यह कैसी खुशबू है? खुशबू है या बदबू है? मुझे पता नहीं हो रहा था लेकिन ठीक है मैं चलता रहा साधना के पथ पर ।समय अपनी चाल से चलता रहा और में अपनी।अब धीरे धीरे इस खुशबू कहो या बदबु इसके साथ जीना मैंने सिख लिया था।लेकिन एक कहावत है ना कि,जहाँ चाह है वहा राह है ये कहावत अब सिद्ध होने वाली थी मेरे जीवन मे।
उन दिनों हमारे एक मित्र है श्याम जी,जिनका व्यक्तित्व आध्यात्मिक है वे सिवाय आध्यात्मिक सत्संग के किसी अन्य विषय पे बात नही करते,वे इंदौर में रहते है वे मुझसे मिलने भिलाई आए,कुछ 3 दिन वे भिलाई में रहे मेरे पास।एक दिन उन्होंने मुझसे कहा कि चलिए कही रमते है अर्थात घूमने फिरने चलते है। तो हम लोग घूमने निकले । भिलाई में एक चिड़िया घर है यहां पर पशु पक्षियों को पाला जाता है अच्छा है बहुत बढ़िया है सभी पशु-पक्षी-बंदर से लेकर के शेर तक सभी हैं यहां पर। हम चिड़िया घर पहुचे तो पहले तो परिस्थिति सामान्य सी थी किन्तु जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते गए परिस्थिति असामान्य होती गई ,मेरा सिर दर्द हो रहा था असहनीय पीड़ा होने लगी थी अचानक।मैने महसूस किया एक वही खुशबू आ रही थी जो लगातार मुझे परेशान कर रही थी इतने दिनों से,सुबह शाम दोपहर रात मुझे परेशान कर रही थी,पहली बार इस खुशबू कहे या बदबु उसे पास से महसूस किया था मैंने।जैसे जैसे हम आगे बढ़ते गए वो खुशबु भी बढ़ती गई और मेरा सर दर्द भी।अब मैं उस खुशबु की तलाश में उसके पास पहुचने का प्रयास करने लगा था और आज संकल्प भी कर लिया था मैंने की आज नही छोड़ना है रोज रोज रोने से अच्छा एक दिन ही रो लिया जाए।आगे बढ़ते हुए मैंने पाया कि वह खुशबु सिंह के पिंजरे से आ रही थी वह सिंह के पसीने की शायद दुर्गन्ध थी मै हैरान था अचानक सिरदर्द खत्म हो गया था ऐसे महसूस हो रहा था मानो कोई बंधन से मुक्ति मिल गई हो मूलाधार में एक कंपन सा महसूस हुआ जैसे कि गाय को छूने से एक करेंट सा कम्पन्न महसूस होता है ठीक वैसा ही कम्पन्न मूलाधार में महसूस हुआ,मन प्रसन्ता प्राप्त हुई और एक मुस्कुराहट भी पैदा हुई जो बिना कारण के थी।जब हम घर वापस पहुचे तो वो दुर्गन्ध जो इतने दिनों से मुझे परेशान कर रही थी अब वो मुझे नही आ रही थीं।ये एक चमत्कारी अनुभूति थी।
7 दिन के बाद में फिर मैंने कि स्त्री को देखा सपने में,वह शेर पर बैठी हुई थी और मुस्कुरा कर मुझसे कह रही थी कैसा लगा? स्वप्न में, मैंने कहा पता नहीं! तो उसने कहा कि चलते रहो बहुत कुछ अनुभूति और होगी,आनंद लो इसका, महादेव हर जगह हैं और उनका सबको समझाने का अपना तरीका है मैंने प्रणाम किया बहुत सुंदर थी वह स्त्री मतलब बहुत ही ज्यादा सुंदर,किन्तु उनकी आयु की कल्पना करना मुश्किल है ना वो बालिका थी ना पूर्ण रूप से स्त्री!उनकी आयु में पहचान नहीं सकता था। कौन थी? लाल वस्त्र धारी उस गौरवर्ण की देवी को मैं शत-शत नमन करता हूँ।यह समय बहुत लंबा,बहुत ही लंबा समय था वह।इस प्रकार से बहुत सी अनुभूतिया मुझे होती रही है जिसे मैं भविष्य में आपके समक्ष रखूंगा जिससे कि नवीन साधको को मेरी अनुभूतियों से कोई सहायता मिल सके। लेकिन स्मरण यह मेरी व्यक्तिगत अनुभूति है मुझे नहीं पता कि सबके साथ यह होता है या नहीं होता है मेरे साथ हो रहा था।सबके साथ होगा ये आवश्यक नही।हो सकता है कि आपको कोई और अनुभूति प्राप्त हो,बस आवश्यकता है चेतन रहने की ,साक्षी रहने की।
🚩जै श्री महाकाल🚩

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चेतावनी:-इस लेख में वर्णित सभी नियम ,सूत्र,
व्याख्याए,एवं तथ्य हमारी निजी अनुभूतियो के स्तर पर है और यहां तांत्रिक-आध्यात्मिक ग्रंथो एवं स्वयं के अभ्यास अनुभव के आधार पर कुछ मंत्र-तंत्र सम्बंधित पोस्ट मात्र शैक्षणिक उद्देश्यों हेतु दी जाती है।जिसे मानने के लिए आप बाध्य नहीं है।तंत्र-मंत्रादि की जटिल एवं पूर्ण विश्वास से  साधना-सिद्धि गुरु मार्गदर्शन में होती है अतः बिना गुरु के निर्देशन के साधनाए ना करे।लेखक किसी भी कथन का समर्थन नही करता | किसी भी स्थिति के लिए लेखक जिम्मेदार नही होगा |
विवाद की स्थिति में न्यायलय क्षेत्र दुर्ग छत्तीसगढ़,भारत,©कॉपी राइट एक्ट 1957)
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महाकालसंहिता(तंत्र)गुह्यकालीखंड:(भाग-३)

#महाकालसंहिता(तंत्र)गुह्यकालीखंड:(भाग-३)
शाक्त_और_शैव_तंत्र_के_भेद
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जिस तांत्रिक प्रक्रिया में भगवान शिव की प्राधानता होती है और शक्ति यहां गौड़ या सुप्त रूप होती है उसका वर्णन करने वाला शास्त्र शैव तंत्र या इस प्रक्रिया से पूजा करने वाला शैव कहलाता है ठीक इसके विपरीत जिस तांत्रिक प्रक्रिया में शक्ति की प्राधानता होती है और शिव यहां गौड़ या सुप्त रूप होते है उसका वर्णन करने वाला शास्त्र शाक्त तंत्र या इस प्रक्रिया से पूजा करने वाला शाक्त कहलाता है ।यह भेद सामान्य स्तर पर है वस्तुतः शिव और शक्ति में अविनाभावरूप संबंध है।एक के बिना दूसरे की कल्पना नही,दूसरे का अस्तित्व नही-
#श्लोक-
न शिवः शक्तिरहितो न शक्तिर्व्यतिरेकिणी।
शक्तिशक्तिमतोरभेदः शैवे जातु न वर्णयते ।।
यह साधक या उपासक के स्तर की बात है कि वह किसमे श्रद्धावान है शिव में या शक्ति में ।उसके मन मे जिसके प्रति आस्था प्रेम और विश्वास होता है उसी की साधना ततसंबंध ग्रंथो या गुरु के निर्देशों के अनुसार करनी पड़ती है।
#शैवागम-शैवागमो में दस शिवागम,अष्टादश रुद्रागम,चौसठ भैरवागम,आठ यामल तथा अन्य अनेक ग्रंथो की परिगणना होती है।शिव वस्तुतः एक है किंतु अलग-अलग कार्यो के लिए भिन्न-भिन्न रूप धारण कर वे अलग कार्यो का सम्पादन करते है।यह भेद अपूर्ण जीवो की पात्रता को ध्यान में रखकर स्वयं परमेश्वर द्वारा रचित होता है ये दशो शैवागम भेद प्रदान है।इनका विशेष प्रचलन तमिलनाडु में है।
इसी प्रकार रुद्रागमो की संख्या अठारह है इन रुद्रागमो को वीरशैव नाम से भी अभिहित किया जाता है।इनका प्रचलन मुख्यतया कर्णाटक प्रदेश में है।
श्रीकंठीसंहिता में चौसठ भैरवागमो का विवरण मिलता है इनको आठ अष्टको में बाँटा गया है।
#१.भैरवाष्टक-स्वछंदभैरव,चंड़भैरव,क्रोधभैरव,उन्मत्तभैरव,असितांगभैरव,महोच्छावासभैरव(भीषण),कपालिशभैरव और रुरुभैरव।
इसी प्रकार से यामलाष्टक,मत्ताष्टक,मंगलाष्टक,चक्राष्टक,बहुरूपाष्टक,वागीशाष्टक और शिखाष्टक आदि को भी आठ-आठ भागो में बांटा गया है यहां सभी अष्टको को सूची नही दी जा रही है।
शिवोपासको को ध्यान में रखकर शैवागमो का आविर्भाव हुआ।इसी प्रकार शाक्तगमो का अवतरण शाक्त साधको को दृष्टि में रखकर किया गया।एक ही शक्ति के ना ना रूप है एवं उन रूपो की उपासना साधना के लिए नाना प्रकार के आगम है।
निम्लिखित पोस्ट को लिखने के लिए "महाकालसंहिता" का सहयोग लिया गया है।यदि ये तंत्रोक्त जानकारी जिसका उद्गम भगवान शिव के मुखारबिंद से है यदि आप भक्तो को पसंद आती है तो भविष्य में इस पे लगातार मेरी कलम चलते रहेगी।
क्रमशः

🚩जै श्री महाकाल🚩
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चेतावनी:-यहां तांत्रिक-आध्यात्मिक ग्रंथो एवं स्वयं के अभ्यास अनुभव के आधार पर कुछ मंत्र-तंत्र सम्बंधित पोस्ट मात्र शैक्षणिक उद्देश्यों हेतु दी जाती है।तंत्र-मंत्रादि की जटिल एवं पूर्ण विश्वास से  साधना-सिद्धि गुरु मार्गदर्शन में होती है अतः बिना गुरु के निर्देशन के साधनाए ना करे।विवाद की स्थिति में न्यायलय क्षेत्र दुर्ग छत्तीसगढ़,भारत,

अघोर_गायत्री_मंत्र

#अघोर_गायत्री_मंत्र
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सतनमो आदेश।श्री नाथजी गुरुजी को आदेश।
ॐ गुरुजी मैं अघोरी सर्वरंगी।गुरु हमारे बहुरंगी।भूत प्रेत वैताल मेंरे संगी।डाकिनी शाकिनी अंग अंग में लगी।भूतनी प्रेतनी हाथ जोड़ पांव में पड़ी।चुड़ैल पिशाचिनी सेंवा में हाजिर हजूर खड़ी। अघोरी अघोरी भाई भाई।अघोरी साधो मढ़ी मसान के मांई।अघोरी की संगत करना।जिस संगत से पार उतरना।मढ़ी मसान से अघोरी आया।खुर खुर खावें।लुदर मांगे।आस पल के संग न जावें।गगन मण्डल में उनकी फेरी।काली नागिन उसकी चेली।उस नागिन पर अघोरी की छायां।अघोरी ने छायां से अघोर उपाया।अघोर से अघोरी हो कर ब्रम्ह चेताया।सेली सिंगी बटुआ लाया।बटुवें में काली नागिन।काली नागिन लाकर तलें बिछाई।तब अघोरी ने जुगत कमाई।रक्त गुलासी।शुद्ध गुलासी।केतु केतु हेरो भाई।ना किसी के भेलें जावें।ना किसी के भेलें खावें।मढ़ी मसान मेरा वासा।मैं छोड़ी कुल की आशा।अघोर अघोर महाअघोर।आदि शक्ति का भग वो भी अघोर।गौरी नन्द गणेश के शुभ लाभ वो भी अघोर।काली पुत्र काल भैरव का कपाल वो भी अघोर।अंजनी सुत हनुमान कि ललकार वो भी अघोर।ब्रम्हा जी के चार वेद छहः शास्त्र वो भी अघोर।वासुदेव श्री कृष्ण के छप्पन करोड़ यादव वो भी अघोर।देवाधिदेव महादेव के ग्यारह रुद्र वो भी अघोर।गौरां पार्वती माई की दस महाविद्या वो भी अघोर।कामदेव की रति वो भी अघोर।ब्रम्हऋषि वाल्मिकी जी की रामायण वो भी अघोर।महऋषि वेदव्यास जी की श्रीमद्भागवत गीता वो भी अघोर।गोस्वामी तुलसीदास जी की रामचरित मानस वो भी अघोर।माता पिता वो भी अघोर।गुरु शिष्य वो भी अघोर।मढ़ी मसान की राख वो भी अघोर।मुआ मुर्दा की ख़ाक वो भी अघोर।सदाशिव गुरू गोरक्ष नाथ जी ने अघोर गायत्री मंत्र सिद्ध गहनी नाथ जी को कान में सुनाया।अज्जर वज्जर किन्हें हाड़ चाम ,अमर किन्हीं सिद्ध गहनी नाथ जी की काया।आवें नहीं जावें नहीं।मरें नहीं जन्में नहीं।काल कभी नहीं खावें।मरें नहीं कभी घट पिण्ड ,सड़े नहीं नाद बिन्द की काया।शिव शक्ति ने अण्ड फोड़ ब्रम्हाण्ड रचाया।ले सिन्दूर लिलाट चढ़ाया।सिन्दूर सिन्दूर महासिन्दूर।महा सिन्दूर कहाँ से आया।कैलाश पर्वत से आया।कौन कौन ल्याया।गौरी नंद गणेश काली पुत्र काल भैरव अंजनी सुत हनुमान ल्याया।कौन कारण ल्याये।माता आदि शक्ति के कारण ल्याये।तेल तेल महातेल।देंखु रे सिन्दूर तेरी शक्ति का खेल।तेल में लेऊँ सिन्दूर मिलाय।बीच लिलाट बिंदी लेऊँ लगाय।भूत प्रेत बेरी दुश्मन के लगाऊँ वज्र शैल।एक सेवा से हनुमन्त ध्याऊँ।पकड़ भुजा काल भैरव की ल्याऊं।हथेली तो हनुमान बसे बिंदी बसे दुर्गा माई काल भैरव बसे कपाल।विभुति उलेटू विभुति पलेटु।विभुति का करूँ शिंणगार।आप लगायें धरती के मै लगाऊँ संसार।अवधूत दत्तात्रेय नाथ जी बोलें बंम बंम ओउमकार।माया मछिन्द्र नाथ जी ने ओउमकार का ध्यान लगाया।ओउमकार में अलख निरंजन निराकार।अलख निरंजन निराकार में पारब्रम्ह।पारब्रम्ह में कामधेनु गाय।कामधेनु गाय से उत्पन्न भई माता अघोर गायत्री।अघोर गायत्री अज़रा जरें।काट्या घाव भरें।अमिया पीवें।अभय मण्डल में रहन्ती।असँख्य रूप धरन्ती।साधु संतों को तारन्ती।अभेद कवच भेदन्ती।छल कपट छेदन्ती।लख चौरासी जिया जून से टालन्ती।अपने ग्वाल बाल को पालन्ती।इंद्री का श्राप टालन्ती।वैतरणी नदी से पार उतारन्ती।अघोर गायत्री माई सत्य सागरी।ओउम तरी।सोहंम तरी।रेवन्तरी।धावन्तरि।अजरावन्ती।वजरावन्ती।वासु मुनि के वचना दुर्वासा ऋषि के लार पडन्ती।अट्ठारह भार वनस्पति चरन्ती।गोचरी।अगोचरी।खेचरी।भूचरी।चाचरी।।सुमेरू पर्वत पर बैठन्ती।हूँ हूँ कार करन्ती।पंचमुख पसारन्ती।गंगा यमुना सरस्वती में खेलन्ती।अजपा जाप जपन्ती।सात हत्या पाप उतारन्ती।अघोर गायत्री अनहद में गाजे।काल पुरुष खाये तो गुरु गोरक्षनाथ लाजे।तार तार माता अघोर गायत्री तारिणी।सकल दुःख निवारिणी।बोलो बंम बंम।ॐ अघोराय विदमहे महाअघोराय धीमहि तन्नो अघोराय प्रचोदयात।इतना अघोर गायत्री मंत्र जाप सम्पूर्ण भया।शून्य की गादी बैठ राजा गोपीचन्द नाथ जी ने आपो आप सुनाया।श्री नाथजी गुरुजी को आदेश।आदेश।आदेश।
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शनिवार, 15 दिसंबर 2018

महाकालसंहिता(तंत्र)गुह्यकालीखंड:(भाग-२)

#महाकालसंहिता(तंत्र)गुह्यकालीखंड:(भाग-२)
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परा, पश्यन्ति,मध्यमा,वैखरी रूप शब्दब्रह्म की उपासना तंत्रशास्त्र की देन है।वर्ण, मंत्र,पद, कला,तत्व और भुवन रूप षडद्धवा के द्वारा जगत की सृष्टि एवं प्रलय का सिद्धांत तांत्रिक दृष्टि की विशेषता है।'अकारो वै सर्वावाक (ऐ. आ.२/३/६)वाचीमा विश्वा भुवनान्यर्पिता (तै.ब्रा.२/८/८/४) इत्यादि वचन केवल संकेत मात्र है।'स्त्री शूद्रो न यजेताम नाधियाताम' अर्थात स्त्री और शूद्र को न यज्ञ करना चाहिए,न वेद पढ़ना चाहिए-ये वैदिक मत है।किंतु तंत्र के अनुसार अध्यन तथा उसके अनुष्ठान में सबका बराबर अधिकार है फिर वो स्त्री हो,शुद्र हो,ब्राह्मण हो या कोई अन्य।
प्रमाण-
अस्यां च पूजायां सर्वजातानामाधिकारः(सौ.भा.)
उत्तमाः पंचरात्रस्था मध्यमास्तु त्रयीमयाः।(ल.तंत्र)
निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि आज के अल्पज्ञ,अल्पशक्तिमान,आलस्य आदि दोषो से परिपूर्ण, शिश्नोदरपरायण,बहिर्मुखी वृति वाले,तप-कठोर-व्रत-आचरण आदि से हीन किसी भी वर्ण,जाति, देश के लोगो के लिए अभ्युदय निःश्रेयस लाभ का यदि कोई उपाय है तो वह तंत्रशास्त्र है।
#तंत्रो_के_प्रकार_और_भेद-
तंत्रशास्त्र का क्षेत्र विशाल है।इसमें अनेक वर्ग है।यद्यपि इस समय शैव,शाक्त और गाणपत्य तीन का ही प्रचलन है तथापि तांत्रिक ग्रंथो में अन्य तंत्रो के नाम भी आते है।इनमे से तो कई लुप्तप्राय है जैसे शाक्त,गणपत्य, शैव सिद्धांत, चान्द्र, वैष्णव,बौद्ध, जैन,पाशुपत, गारुड़,भूतड़ामर,पाँचरात्र, कापालिक,नाकुल,दुर्गा,कौल, वाममार्ग, दक्षिणमार्ग,त्रिक आदि अनेक तंत्रो के नाम लिए गए है।
#तंत्र_शास्त्र_का_वर्गीकरण-
तंत्र शास्त्र का वर्गीकरण तीन रूपों में किया गया है स्रोत,पीठ एवं आम्नाय।यहां क्रमशः उनका संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत है
#स्तोत्र-शिव तंत्र शास्त्र का तीन, चार एवं पाँच स्रोत्र के रूप में भी विभाजन मिलता है। वाम,दक्षिण और सिद्धांत, यह तीन शुद्ध शैव तंत्र है इनमें शक्तिप्रधान वाम है भैरव प्रधान दक्षिण है कामिक आदि सिद्धांत है। मिश्र के नाम से एक चौथा तंत्र है जो सप्तमातृपरक है।पंचस्त्रोतस तंत्र शिव के पांच मुख से उद्भूत माना गया है।
#पहला-"उर्ध्वमुख"-"सिद्धांततंत्र",इसका उद्देश्य "मुक्ति" है।
#दूसरा-"पूर्वमुख"-"गारूड़तंत्र"-इसका उद्देश्य सभी विषो को हरने का है।
#तीसरा-"उत्तरमुख"-"वामतंत्र"-इसका उद्देशय सर्ववशिकरन का है।
#चौथा-"पश्चिममुख"-"भूततंत्र"-इसका उद्देश्य भूतग्रह निवारण का है।
#पांचवा-"दक्षिणमुख"-"भैरवतंत्र"-इसका उद्देश्य शत्रुनाश का है।
स्रोतों के अतिरिक्त अनुस्त्रोत्रो का भी वर्णन मृगेंद्रगम के चर्यापाद में मिलता है।उनकी संख्या आठ है ये है-शैव मान्तरेश्वर गाण दिव्य आर्ष गौह्यक योगिनी कौल और सिद्धांत।

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शुक्रवार, 14 दिसंबर 2018

महाकालसंहिता(तंत्र)गुह्यकालीखंड:(भाग:-१)

महाकालसंहिता(तंत्र)गुह्यकालीखंड:
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महाकालसंहिता मे उल्लेखित 'पंचशत-साहस्त्रयां महाकालसंहितायाम' से ज्ञात होता है कि यह ग्रंथ पांच लाख में लिखा गया था।इस ग्रंथ का इतना बड़ा आकार होना कोई आश्चर्य की बात नही, क्योकि 'मालिनीविजयतंत्र' के-वचन से 'सिद्धयोगेश्वरीतंत्र' जिसे 'वागकेश्वरतंत्र' भी कहते है।इसका प्रणयन नव करोड़ श्लोको से हुआ था।
काली अध्य शक्ति है रखता श्यामा भेद से ही त्रिपुर सुंदरी त्रिपुरा त्रिपुरभैरवी भैरवी आदि तथा दक्षिणकाली भद्रकाली आदि रूप धारण करती है काली की अनेक अवांतर रूप है इनकी संख्या ८,९,१०,१२ तक बताई गई है इनके अतिरिक्त तारा आदि 9 महाविद्याऐं भी मूलतः इसी का रुप-विस्तार है महाकाल संहिता बहुत संभव है आद्या के महाविद्या नामक सभी दशरूपो तथा अन्य विग्रहों के वर्णन से उपनिबद्ध रही हो;क्योंकि 500000 अथवा 50000 श्लोक केवल आद्यशक्ति काली एवं उसके रूपांतरण तारा आदि की चर्चा नहीं करेंगे तो फिर किसकी करेंगे इसके अतिरिक्त गुह्यकाली और कामकला काली नामक दो खंडों में विभक्त इस ग्रंथ के दोनों खंडो के बीच के बहुत सारे पटल अनुपलब्ध है।गुह्यकाली खंड का प्रारंभ पटल संख्या १८१तथा कामकलाकाली खंड का पटलसँख्या २४१ से होता है ।इससे सिद्ध होता है कि यह संहिता अधिक बृहदाकार ही रही होगी ।
महाकालसंहिता शक्ति की वाम मार्गी साधना-उपासना का उच्चकोटिक ग्रंथ है।इस उपासना में पञ्चमकार (मांस,मद्य,मत्स्य,मैथुन और मुद्रा) का प्रयोग किया जाता है।यद्यपि लौकिक तथा स्मार्त दृष्टि से इसकी वैधता नही है तथापि यदि ये कार्य तंत्रशास्त्रोक्त विधि से देवि के लिये समर्पण भाव से किया जाता है तो इसमें दोष नही होता।इस विषय मे 'ताराभक्तिसुधारणव' 'तंत्रालोक' आदी ग्रंथ प्रमाण है।महाकालसंहिता उदारवादी शास्त्र है।यह पंचमकार के अनुकल्पो की भी चर्चा करता है।यह ग्रंथ वैदिक एवं कौलिक दो अतिमार्गी के मध्य सामंजस्य की भूमिका प्रस्तुत करता है।तंत्रशास्त्र विषय एवं प्रक्रिया या यों कहिये सिद्धांत एवं व्यवहार दोनो दृष्टि से दुरूह है।यहाँ पद-पद पर स्खलन की संभावना रहती है अतः इस ग्रंथ की व्याख्या अत्यंत सावधानी से की गई है।
महाकाल संहिता मूलतः तंत्रोक्त ग्रंथ है आगमशास्त्र मुख्यतः शिवपार्वती संवाद रूप में है इसका प्रमाण-
श्लोक-
आगतं शिवक्त्रेभ्यो गतं च गिरिजश्रुतौ।
मतं च वासुदेवन तस्मादाग़म उच्यते।।

इसका दूसरा नाम तंत्र भी है।
तन्यते=विस्तारयते आत्मा येन तत तन्त्रम
सिद्धांत ,व्यवहार,प्रतीति का सर्वोत्तम एवं अदभुत सामन्जस्य यदि कही है तो वह तंत्र में है।संस्कृति भाषा के अनुस्वार अर्थात बिंदु को सृष्टी का मूल मानने का सिद्धांत तंत्र का है।मंत्र का जप शरीरस्थ कोषों का विकास करता हैं किंतु जप की विधि उसके बीजाक्षर,जप की पुर्णता के लिए होम,हवनीय द्रव्य,आसन स्थान काल दिशा आदि का निर्धारण तंत्र का ही विषय है किस समय किस स्थान में किन पदार्थों का किस रूप में संयोग एवं मिश्रण कर किस लक्ष्य की प्राप्ति की जा सकती है-यह ज्ञान तंत्र से ही मिलता है यह है तंत्र शास्त्र का वैशिष्ट्य।
रुद्रयामल तंत्र के-
कृते श्रुतयुक्तमार्ग: स्यात्त्रेतायां स्मृति भाषितः।
द्वापरे वै पुराणोक्त: कलावागमसम्भवः।।
श्लोक तथा 'कलौ चंडी महेश्वरौ' अथवा 'कलौ चंडी कपीश्वरौ' वचनों से भी तंत्र की महत्ता  एवं आवश्यकता सिद्ध होती है।आध्यात्मिक तथा आधिभौतिक जगत की आश्चर्यमयी तथा मनुष्य की बुद्धि के परे की घटनाओं का विश्लेषण,समस्याओ का समाधान करने की शक्ति केवल और केवल तंत्र में है।
निम्लिखित पोस्ट को लिखने के लिए "महाकालसंहिता" का सहयोग लिया गया है।यदि ये तंत्रोक्त जानकारी जिसका उद्गम भगवान शिव के मुखारबिंद से है यदि आप भक्तो को पसंद आती है तो भविष्य में इस पे लगातार मेरी कलम चलते रहेगी।
क्रमशः

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