मंगलवार, 20 नवंबर 2018

प्रेमी आत्मा का प्रतिशोध(एक सत्य घटना)

प्रेमी आत्मा का प्रतिशोध(एक सत्य घटना)
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आज पुरानी यादें जीवंत हो गयी आज मनोज भाई (बदला हुआ नाम) मिले करीब 12 साल बाद।मनोज भाई भिलाई की सब्जी मंडी में थोक व्यपारी थे वे बहुत अच्छे इंसान है।किंतु हमारी भेट बहुत कम होती है दोनो की व्यस्तता के कारण।एक समय था मनोज भाई बहुत परेशान थे,उनके घर मे अजब गजब के करतब हो रहे थे।कपड़ो में आग लग जाती थी,एक अलग सी बदबू घर मे फैले रहती थी,घर मे शांति नही थी,और सबसे बड़ी बात की उनकी माता बड़ा परेशान थी उनकी माता जब भी नई साड़ी पहने या मंगल सूत्र पहने तो वो अपने आप उतर जाते थे।सारा परिवार इन घटनाओं से परेशान था।मनोज भाई ने मुझसे संपर्क किया फिर उस दिन मैं मनोज भाई के घर पहुचा,घर के सारे सदस्यो को इखट्टा किया गया ।सब के मन को मैंने समझने का प्रयास की ,इस दौरान मुझे मनोज भाई के पिता की स्थिति थोड़ी संदिग्ध लगी।मैंने उनसे पूछा आपको क्या लगता है इस विषय मे,उन्होंने तपाक से उत्तर दिया कि सब बेकार बाते है इन सबका वहम है।खैर मैं ठहरा भगत आदमी भक्ति ही कर सकता था मैंने मनोज भाई की माता को जमीन पे बैठाया और माँ काली का स्मरण कर दो अगरबत्ती जला दी,फिर क्या था कुछ ही क्षण में मनोज की माता के भाव,वाणी,आंखे बदलने लगी और आवाज भी कर्कश हो गई,ये उस परिवार में पहली बार हुआ था।मैंने मनोज की माता से पूछा कौन है माँ आप?वो कहने लगी,मनोज की ओर इशारा करके,मैं तेरी माँ नही हूँ।मेरे बारे में जानना है तो जा अपने बाप से पूछ की मैं कौन हूँ?फिर वो उठी और असामान्य चाल में चलती हुई मनोज के पिता के पास पहुच कर ,उनको घुरते हुए कहा कि "यदि तुने सब को सत्य नही बताया तो पहले मैं तेरी पत्नी को मारूंगी फिर तेरी संतानो को,ये सब देख कर तू स्वयं ही मर जायेगा।अब मनोज के पिता की जो हालत थी देखने लायक थी।बहुत घबरा गए थे वो,आवाज जैसे कंठ पे फंस गई थी,अब वे मेरी तरफ करुणामय दृष्टि से देख रहे थे।मैंने उनकी स्थिति को समझते हुए मनोज की माता से विनती की "की माता आप थोड़ा सा समय दीजिये इन्हें,आप जैसे चाहती है वैसे ही होगा।अब स्त्री तो करुणा मय होती है ,जन्होने कहा कि ठीक है शुक्रवार को आऊँगी लेकिन इससे कह देना सत्य को स्वीकार करे।फिर उनके हाथ मे दो लौंग,और पानी दिया गया ,फिर वे चली गई।
अब सारे परिवार की नजरें पिता पर थी कि बात क्या है बताये?किन्तु उन्होंने कहा,की वो पहले मुझसे अकेले में बात करना चाहते है फिर वे बुधवार को मुझसे मिलने आये और फिर उन्होंने सच्चाई बताई।
सच्चाई ये थी कि मनोज के पिता बटवारा होने के पहले पाकिस्तान में रहते थे पहले तो हिंदुस्तान पाकिस्तान की कोई बात नही होती थी।वहाँ वे किसी मंडी में सब्जी-भाजियों के थोक विक्रेता थे,वही उनको एक कन्या से प्रेम हो गया और उन्होने विवाह कर लिया,समय अच्छा बीतता रहा फिर एक घड़ी आई जब बटवारा हो गया और लोग हिंदुस्तान से पाकिस्तान ,पाकिस्तान से हिंदुस्तान की तरफ आने लगे।इस वक्त किसी कारण से ये कन्या अपने पति के साथ हिंदुस्तान नही आ सकी,कारण थोड़ा गुप्त है इसी कारण मैं उसका उल्लेख यहां नही कर पा रहा हु।बस ये वादा हुआ था दोनो में की स्थिति सुधरने से वो कन्या को साथ ले जाएंगे फिर समय कितना भी क्यो ना लगे।ये जोड़ा अब बिछड़ चुका था बस अब इंतजार था वही जहां प्रेमिका इंतजार कर रही इधर उसके प्रेमी ने दूसरा विवाह कर लिया था।इस दुःख को जानकर प्रेमिका ने आत्म दाह कर लिया था।ये वही कन्या थी जो उस दिन मनोज की माता के शरीर मे आ गई थी।ये राज मनोज के पिता ने अपनी पत्नी और 4 संतानो सहित पूरे समाज से छुपा कर रखा था और अब वो प्रेमिका न्याय चाहती थी अपने पति से।
अब गड़े मुर्दे उखड़ चुके थे और अब मनोज के पिता उपचार की आशा मुझसे रख रहे थे।मैंने उनसे कहा कि सबसे पहले तो आप अपने परिवार को सम्पूर्ण सत्य बताये,फिर वे क्या सोचते है इसपे आप ध्यान ना दे,सब माता रानी सम्हालेगी।उन्होंने वैसे ही किया,परिवार को सत्य  बता दिया,परिवार में इस विषय को ले के विवाद की स्थिति बनी किन्तु सब जल्दी सामान्य सा हो गया क्योंकि अब इंतजार था शुक्रवार का,सारा परिवार भयभीत था कि अब क्या होगा,वैसे भी परिवार वही है जो विपत्ति के समय साथ रहे।
फिर शुक्रवार आया और वो भी आई किन्तु इस बार मुझे उसका आह्वाहन करने की आवश्यकता नही पड़ी।इस बार वो क्रोधित नही थी बल्कि एक कटीली मुस्कान के साथ उसने परिवार के सभी सदस्यों को देखा और पिता से पूछा कैसे लगा,परिवार की नजर में जलील हो कर,मुझे भी लगा था जब उस समय मैं अपने परिवार के नजरो में जलील हुई थी तभी तो मैंने आत्म हत्या की।
मैंने उनको देखा और उनसे पूछा माता अब उपाय क्या है आपकी इच्छा पूरी हुई अब आप जहां से आये है वहा जाए।उन्होंने कहा इतनी जल्दी क्या ,अभी तो मुझे मेरे पहली पत्नी होने का भी सम्मान चाहिए,मैंने बहुत इन्जार किया है और इस परिवार को भी करना होगा।
मैंने कहा कि कुछ तो बताये की आपको मान सम्मान कैसे दिया जाए?
उन्होंने कहां की इनकी स्त्री को स्वीकार करना होगा कि वो दूसरी स्त्री है और मैं पहली,जो भी वो नया वस्त्र पहनेगी वो पहले मुझे दे कर ही धारण करेगी,मंगल सूत्र के पीछे मेरा नाम ऊपर अपना नाम नीचे लिखवाएगी,व्रत त्योहार में भी मुझे समान देगी तो मैं इस परिवार को परेशान नही करूँगी।
परिवार ने इस विषय मे आपस मे बात करी और उसकी सभी बातें स्वीकार की।आज मनोज का परिवार खुशहाल है।
इस पूरी घटना में आपने देखा होगा कि कही भी मैंने जादू-टोना,तंत्र-मंत्र का उपयोग नही किया गया था सामान्य सी मनोदशा को समझने का प्रयास कीया गया और समाधान मिल गया क्योंकि हर समस्या का समाधान उसके ही भीतर छुपा होता है।बस आप उस ईश्वर पे विश्वास रखे फिर कोई भी धर्म का वो हो या कोई भी उसका नाम।यहां मैंने विश्वास से माँ काली का नाम लिया था आप अपने धर्मानुसार नाम ले सकते है।
धन्यवाद
🚩जै श्री महाकाल🚩

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चेतावनी:-इस लेख में वर्णित सभी नियम ,सूत्र,
व्याख्याए,एवं तथ्य हमारी निजी अनुभूतियो के स्तर पर है जिसे मानने के लिए आप बाध्य नहीं है।यहां तांत्रिक-आध्यात्मिक ग्रंथो एवं स्वयं के अभ्यास अनुभव के आधार पर कुछ मंत्र-तंत्र सम्बंधित पोस्ट दी जाती है।तंत्र-मंत्रादि की जटिल एवं पूर्ण विश्वास से  साधना-सिद्धि गुरु मार्गदर्शन में होती है अतः बिना गुरु के निर्देशन के साधनाए ना करे।विवाद की स्थिति में न्यायलय क्षेत्र दुर्ग छत्तीसगढ़,भारत,©कॉपी राइट एक्ट 1957)
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बुधवार, 24 अक्टूबर 2018

मन_की_शक्ति_से_अपना_उद्धार_स्वयं_करे

#मन_की_शक्ति_से_अपना_उद्धार_स्वयं_करे।
【आध्यात्मिक एवं तांत्रिक विश्लेषण】
#मन_एव_मनुष्याणां_कारणं_बंधमोक्षयोः_।।
हमारे शास्त्रों के अनुसार हमारा मन ही समस्त बंधनों एवं मोक्ष का मूल कारण है।हमारे अमन होते ही ये दुःख दाई बंधनो से हमे मुक्ति प्राप्त हो जाती है।यहां समझने वाली बात है कि जहाँ मन को इन्द्रियों का राजा कहा गया है जहां बिना मन के सहयोग के हमारी कोई भी इंद्रिया कार्य नही कर सकती।वही इस मन को बंधन कहा गया है कारण यह है मोक्ष या अध्यात जो विषय है वो इन्द्रियों के परे है और इन पाँच इन्द्रियों का संबंध शरीर से है इन इंद्रियों से बुद्धि का विकास होता है और ये बुद्धि भी बंधन ही है क्योंकि इसका विकास भी इंद्रियों द्वारा ही होता है यदि ये इंद्रिया दिमाग को गलत संकेत देने लगे तो बुद्धि की दिशा और व्यवहार भी बदल जाता है।मन एवं बुद्धि प्रश्न वाचक है वही अध्यात्म या मोक्ष सहजता का विषय है ।अध्यात्म या भक्ति का मूल मंत्र है जो जैसा है उसे उसी अवस्था मे ग्रहण कर लो,सहजता के साथ,फिर उसमें प्रश्न ना करो।
इस मन को वश में करना मुश्किल है किंतु नामुमकिन नही।

श्रीगीताजी में अर्जुन ने कृष्ण से इस विषय मे कठिनाई बताते हुए कहा।
#चञ्चल_हि_मनः_कृष्ण_प्रमाथि_बलवद_दृढम।
हे कृष्ण,ये मन बड़ा चञ्चल, क्षोभकारक,बलावान एवं दृढ़ है अतः उसे वश में करना मैं वायु को रोकने जैसा दुष्कर समझता हूँ।

अर्जुन की इस बात को मानते हुए श्रीकृष्ण कहते है कि,
#असंशय_महाबाहो_मनो_दुर्निग्रहं_चलं||

इसमे संशय नही की मन चञ्चल एवं कठिनाई से वश में आने वाला है किंतु उसे वश में करने का उपाय बताते हुए श्रीकृष्ण कहते है।

#अभ्यासेन_तु_कौन्तेय_वैराग्येण_च_गृह्यते||
अर्थात हे कुंतीपुत्र,अभ्यास एवं वैराग्य से इसे वश में किया जा सकता है।

इस प्रकार से मन को वश में करके उसे इन्द्रियों के विषयों में आसक्त होने से रोकना उसका निषेधात्मक पक्ष है एवं देखा जाए तो भगवान के कार्य मे दखल देने जैसा है जैसा कि हठ योग।
जो जैसा है उसके स्वरूप को बदलने का प्रयास करना । फिर यदि समझा जाये तो इसका दूसरा महत्वपूर्ण एवं सृजनात्मक पक्ष भी है जिससे हम इस बलवान मन की दिशा बदलकर,अपने इसी बलवान मन की शक्ति का स्वयं अपना उत्थान करने से भी सदुपयोग कर सकते है।

मन का मूल विचार होते है और ये विचार सकारात्मक एवं नाकारात्मक दोनो है देखा जाए तो ये दोनों मात्र एक भ्रम ही है सकारात्मक-नाकारात्मक,सुख-दुःख, पाप-पुण्य ये सब मात्र मन की अवस्था ही है आप के लिए जो दुःख होगा हो सकता है वो किसी अन्य के लिए सुखकारक हो,जो आपके लिए पाप हो वो दूसरे के लिए पुण्य भी हो सकता है।
अतः यह वैज्ञानिक सिद्धांत भी है कि मन के सकारात्मक एवं नकारात्मक विचार का हमारे शरीर एवं मस्तिष्क पर सकारात्मक एवं नकारात्मक प्रभाव पड़ता है तो यदि इन विचारों को अच्छे/सकारात्म दिशा में ले जाया जाए निसंदेह हमारे स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होगा।
जहाँ भक्ति सकारात्मक एवं स्वस्थ विचारो के द्वारा प्राप्त की जाती है वही यदि सकारात्मक विचारों को किसी प्रकार बदल दिया जाए तो ये भक्ति के विरुद्ध शक्ति का रूप ले लेती है जिससे कि अनेक विद्याओ का जन्म होता है जैसे कालाजादु,नकारात्मक तांत्रिक कर्म,नकारात्मक अघोर कर्म,ना ना प्रकार की अमोक्ष कारक सिद्धिया जो कि मात्र एक मृगतृष्णा  है,जब तक इनसे दूर नही हुआ जाता तब तक मुक्ति प्राप्त नही होती यही शिव-शक्ति का मूल भेद है जहाँ शिव शाँत अवस्था मे दिखाई देते है वही शक्ति उग्र अवस्था मे।जहाँ शिव के वाहन को बैल के वाहन में देखा जाता है वही शक्ति को सिंह के वाहन में,यहां आप ही सोचे कि बैल के नाक में रस्सी तो डाली जा सकती किन्तु सिंह के???
अतः सकारात्मक विचारों के साथ अपना उद्धार स्वयं करे।क्योकि मात्र मनुष्य में ही विचारो की एक ऐसी शक्ति है जिसका सही उपयोग कर वह अपना एवं समाज का उद्धार कर सकता है।

#उद्धरेदात्मनात्मानं_नात्मानमवसादयेत_||
#आत्मैव_ह्यात्मनो_बंधुरात्मैव_रिपुरात्मनः_||
मनुष्य को चाहिए कि वह अपना उद्धार स्वयं करे।
अपना पतन न करे,क्योकि मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र है और स्वयं ही अपना शत्रु भी।
#_क्रमशः

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पूजा-साधना और साधक की सुरक्षा।।

पूजा-साधना और साधक की सुरक्षा।।
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किसी भी प्रकार की साधना चाहे वो बड़ी हो या छोटी ,साधक को चाहिए कि वो अपनी सुरक्षा पे सर्व प्रथम ध्यान दे और साधना से पहले सुरक्षा मन्त्रों से या कवचों से अपनी सुरक्षा निश्चित कर ले अन्यथा ,लाभ के स्थान में अनन्य शक्तियों का प्रकोप और दुष्ट शक्तियां साधना में बाधा अवश्य डालती है जिससे भारी हानि होने की संभावना होती है।साधना के समय साधक को चाहिए बडे ही धैर्य, शांत एवं स्थिर मन से अपने गुरु या इष्ट,देवी-देवता पे पूर्ण विश्वास के साथ मन लगाए रखे।
साधना काल मे बहुत से अच्छी बुरी अनुभूतियां होते रहती है जैसे अचानक तेज प्रकाश का दिखाई देना,अचानक तेज या सूक्ष्म ध्वनि का सुनाई देना,अंजान खुशबू का अहसास होना,शरीर मे सिरहन होना,शरीर मे कपकपी होना,स्वयं की वाणी से जोर आवाज निकलना,ऐसा महसूस होना की कोई स्पर्श कर रहा हो,अचानक हँसी या रोना आना,गले के पास अकड़न महसूस होना,कुछ पल के लिए आंखों के सामने अंधेरा छा जाना।किसी प्रकार का संदेश सुनाई देना।इस प्रकार की अनुभूतियों से साधक को विचलित नही होना चाहिए।इसके साथ साथ अपनी साधना को गुप्त रखते हुए साधना का वर्णन किसी के समक्ष नही करना चाहिए।साधक को चाहिए कि वो साधना के पहले साध्य मंत्र को कंठस्त कर ले एवं साधना के समय दीपक चेतन करके अपने समक्ष अपने इष्ट या देवी-देवता का चित्र स्थिर कर पहले अपनी आंखें बंद कर ले फिर आंखों को बस उतना ही खोले की उसे मात्र चित्र या दीपक ही दिखाई दे इनके बाद हल्के स्वर में मंत्र जाप करे।जाप करते करते यदि आंखे बंद हो जाये तो कोई बात नही जाप करते रहे और ऋण की हड्डी को सीधा रखें,आवश्यकता अनुसार आप आधारी का उपयोग भी कर सकते है।
साधक को चाहिए कि अपने गुरु से रक्षा मंत्र धारण कर, साधना के पहले गुरु मंत्र का जाप करते हुए किसी चाकू से अपने चारों तरफ एक घेरा बना ले,जिससे कि दृष्ट एवं आसुरी शक्तियों से आपकी रक्षा हो सके।पोस्ट पसंद आने पे इस विषय पे आगे भी लिखने का प्रयास रहेगा।।
।।क्रमशः।।

🙏🏻🚩आदेश-जयश्री माहाँकाल 🔱


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#चेतावनी:-इस लेख में वर्णित नियम ,सूत्र,व्याख्याए,तथ्य स्वयं के अभ्यास-अनुभव के आधार पर एवं गुरू-साधु-संतों के कथन,ज्योतिष-वास्तु-वैदिक-तांत्रिक-आध्यात्मिक-साबरी ग्रंथो,

मान्यताओं और जानकारियों के आधार पर मात्र शैक्षणिक उद्देश्यों हेतु दी जाती है।हम इनकी पुष्टी नही करते,अतः बिना गुरु के निर्देशन के साधनाए या प्रयोग ना करे। किसी भी विवाद की स्थिति न्यायलय क्षेत्र दुर्ग छत्तीसगढ़,भारत।

गुरुवार, 23 नवंबर 2017

त्रिपुर सुंदरी षोडशी साधना

त्रिपुर सुंदरी षोडशी साधना
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देवी यौवन और आकर्षण की देवी है, जिनके पूजन द्वारा आकर्षण व सौंदर्यता प्राप्त होती है। दाम्पत्य जीवन में कलह, किसी प्रिय जन का रूठना, सम्मान व पद प्राप्त करना आदि
या सभी प्रकार के कामनाओं को पूर्ण करने वाली।
शारीरिक वर्ण : उगते हुए सूर्य के समान।

मुख्य नाम : महा त्रिपुरसुंदरी।
अन्य नाम : श्री विद्या, त्रिपुरा, श्री सुंदरी, राजराजेश्वरी, ललित, षोडशी, कामेश्वरी, मीनाक्षी।
भैरव : कामेश्वर।
त्रिपुर सुंदरी देवी:१. शाम्भवी २. श्यामा तथा ३. विद्या
तीन भैरव: परमशिव, सदाशिव तथा रुद्र
षोडसी माता का स्वरूप:माता के चार हाथ हैं। चारों हाथों में पाश, अंकुश, धनुष और बाण सुशोभित है।
तिथि : मार्गशीर्ष पूर्णिमा।
कुल : श्री कुल ।
दिशा : नैऋत्य कोण।
स्वभाव : सौम्य।
यंत्र:  अलौकिक तथा दिव्य शक्ति दायक श्रीयंत्र
सम्बंधित तीर्थ स्थान या मंदिर : कामाख्या मंदिर, ५१ शक्ति पीठों में सर्वश्रेष्ठ, योनि पीठ गुवहाटी, आसाम।
कार्य : देवी यौवन और आकर्षण की देवी है, जिनके पूजन द्वारा आकर्षण व सौंदर्यता प्राप्त होती है। दाम्पत्य जीवन में कलह, किसी प्रिय जन का रूठना, सम्मान व पद प्राप्त करना आदि
या सभी प्रकार के कामनाओं को पूर्ण करने वाली।
शारीरिक वर्ण : उगते हुए सूर्य के समान।
संबंधित ग्रंथ:‘‘भैरवयामल तंत्र और शक्ति लहरी’’

।।गुरु पूजन विधि प्रारम्भ।।
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सतनमो आदेश गुरुजी को आदेश ॐ गुरुजी आदेश
श्री गुरुदेवेभ्यो नमः

।।आसन ।।
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‘सुखपूर्वक स्थिरता से बहुत काल तक बैठने का नाम आसन है।‘
आसन अनेको प्रकार के होते है। अनमे से आत्मसंयम चा‍हने वाले पुरूष के लिए सिद्धासन, पद्मासन, और स्वास्तिकासन – ये तीन उपयोगी माने गये है। इनमे से कोई सा भी आसन हो, परंतु मेरूदण्ड, मस्तक और ग्रीवा को सीधा अवश्ये रखना चाहिये और दृष्टि नासिकाग्र पर अथवा भृकुटी में रखनी चाहिये। आलस्य न सतावे तो आंखे मुंद कर भी बैठ सकते ‍है। जिस आसन से जो पुरूष सुखपूर्वक दीर्घकाल तक बैठ सके, वही उसके लिए उत्तम आसन है।
शरीर की स्वाभाविक चेष्टा के शिथिल करने पर अर्थात् इनसे उपराम होने पर अथवा अनन्त परमात्मा में मन के तन्मय होने पर आसन की सिद्धि होती है। कम से कम एक पहर यानी तीन घंटे तक एक आसन से सुखपूर्वक स्थिर और अचल भाव से बैठने को आसनासिद्धि कहते है।

।।आसन मंत्र।।
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सत नमो आदेश। गुरूजी को आदेश। ऊँ गुरूजी।
ऊँ गुरूजी मन मारू मैदा करू, करू चकनाचूर। पांच महेश्वर आज्ञा करे तो बेठू आसन पूर।श्री नाथजी गुरूजी को आदेश।

।।श्री गुरु ध्यान ।।
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ओम गुरुजी।ओमकार आदिनाथ ज्योति स्वरूप बोलियेे। उदयनाथ पार्वती धरती स्वरूप बोलियेे। सत्यनाथ ब्रहमाजी जल स्वरूप बोलियेे। सन्तोषनाथ विष्णुजी खडगखाण्डा तेज स्वरूप बोलियेे। अचल अचम्भेनाथ शेष वायु स्वरूप बोलियेे। गजबलि गजकंथडानाथ गणेषजी गज हसित स्वरूप बोलियेे। ज्ञानपारखी सिद्ध चौरंगीनाथ चन्द्रमा अठारह हजार वनस्पति स्वरूप बोलियेे। मायास्वरूपी रूपी दादा मत्स्येन्द्रनाथ   माया मत्स्यस्वरूपी बोलियेे। घटे पिण्डे नवनिरन्तरे रक्षा करन्ते श्री शम्भुजति गुरु गोरक्षनाथ बाल स्वरूप बोलियेे। इतना नवनाथ स्वरूप मंत्र सम्पूर्ण भया, अनन्त कोटि सिद्धों मेंं नाथजी ने कथ पढ़ सुनाया। नाथजी गुरुजी को आदेष! आदेष!!

।।धूप लगाने का मन्त्र।।

सत नमो आदेश। गुरूजी को आदेश। ऊँ गुरूजी। धूप कीजे, धूपीया कीजे वासना कीजे।जहां धूप तहां वास जहां वास तहां देव जहां देव तहां गुरूदेव जहां गुरूदेव तहां पूजा।
अलख निरंजन ओर नही दूजा निरंजन धूप भया प्रकाशा। प्रात: धूप-संध्या धूप त्रिकाल धूप भया संजोग।
गौ घृत गुग्गल वास, तृप्त हो श्री शम्भुजती गुरू गोरक्षनाथ।
इतना धूप मन्त्र सम्पूर्ण भया नाथजी गुरू जी को आदेश।

।।ज्योति जगाने का मन्त्र।।

सत नमो आदेश। गुरूजी को आदेश।
ऊँ गुरूजी। जोत जोत महाजोत, सकल जोत जगाय, तूमको पूजे सकल संसार ज्योत माता ईश्वरी।
तू मेरी धर्म की माता मैं तेरा धर्म का पूत ऊँ ज्योति पुरूषाय विद्येह महाज्योति पुरूषाय धीमहि तन्नो ज्योति निरंजन प्रचोदयात्॥
अत: धूप प्रज्वलित करें।

।।रक्षा मन्त्र।।
ॐ सीस राखे साइंया श्रवण सिरजन हार ।
नैन राखे नरहरी नासा अपरग पार ।
मुख रक्षा माधवे कंठ रखा करतार।
हृदये हरी रक्षा करे नाभी त्रिभुवन सार ।
जंघा रक्षा जगदीश करे पिंडी पालनहार।
सीर रक्षा गोविन्द की पगतली परम उदार
आगे रखे राम जी पीछे रावण हार।
वाम दाहिणे राखिले कर गृही करतार ।
जम डंक लागे नाही विघन काल ते दूर।
राम रक्षा जन की करे बजे अनहद तुर ।
कलेजो रखे केसवा जिभ्या कू जगदीश ।
आतम कं अलख रखे जीव को जोतिश ।
राख रख सरनागति जीव को एके बार ।।
संतो की रक्षा करे शिव गुरु गोरख़ सत गुरु सृजनहार ।।
(इस मंत्र को 7 पढ़कर शरीर पे फूँक लगाए)

।।त्रिपुर सुंदरी षोडशी पूजन प्रारम्भ।।
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।।त्रिपुर सुंदरी ध्यान मंत्र।।

बालार्कायुंत तेजसं त्रिनयना रक्ताम्ब रोल्लासिनों।

नानालंक ति राजमानवपुशं बोलडुराट शेखराम्।।

हस्तैरिक्षुधनु: सृणिं सुमशरं पाशं मुदा विभृती।

श्रीचक्र स्थित सुंदरीं त्रिजगता माधारभूता स्मरेत्।।

।।त्रिपुर सुंदरी आसन मंत्र।।
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ॐ आसनं भास्वरं तुङ्गं मांगल्यं सर्वमंगले
भजस्व जगतां मातः प्रसीद जगदीश्वरी
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुर सुन्दर्यै आसनं समर्पयामि

।।त्रिपुर सुंदरीआवाहन मंत्र।।
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ऊं त्रिपुर सुंदरी पार्वती देवी मम गृहे आगच्छ आवहयामि स्थापयामि।

।।त्रिपुर सुंदरी धूप मंत्रं।।
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ॐ गुग्गुलम घृत संयुक्तं नाना भक्ष्यैश्च संयुतम ।
दशांग ग्रसताम धूपम् त्रिपुरसुन्दर्यै देवि नमोस्तुते ।।
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुर सुन्दर्यै धूपं समर्पयामि

।।त्रिपुर सुंदरी दिप मंत्रं।।
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ॐ मार्तण्ड मंडळांतस्थ चन्द्र बिंबाग्नि तेजसाम्
निधानं देवि त्रिपुरसुन्दर्यै दीपोअयं निर्मितस्तव भक्तितः
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुर सुन्दर्यै दीपं दर्शयामि )

।।पुष्प समर्पण ।।
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ॐ देवेशि भक्ति सुलभे परिवार समन्विते
यावत्तवां पूजयिष्यामि तावद्देवी स्थिरा भव

।।नमस्कार मंत्रं ।।
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शत्रुनाशकरे देवि ! सर्व सम्पत्करे शुभे
सर्व देवस्तुते ! त्रिपुरसुन्दर्यै ! त्वां नमाम्यहम

इसके बाद देवी को सुपारी में प्रतिष्ठित कर दें। इसे तिलक करें और धूप-दीप आदि पूजन सामग्रियों के साथ पंचोपचार विधि से पूजन पूर्ण करें अब कमल गट्टे की माला लेकर करीब 108 बार या संकल्पानुसार नीचे लिखे मंत्र का जप करें

षोडशी – त्रिपुर सुन्दरी मूल मंत्रं।।
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ऊं ह्रीं क ऐ ई ल ह्रीं ह स क ल ह्रीं स क ह ल ह्रीं।

।।क्षमाप्रार्थना ।।
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ॐ प्रार्थयामि महामाये यत्किञ्चित स्खलितम् मम
क्षम्यतां तज्जगन्मातः कालिके देवी नमोस्तुते
ॐ विधिहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं यदरचितम्
पुर्णम्भवतु तत्सर्वं त्वप्रसादान्महेश्वरी
शक्नुवन्ति न ते पूजां कर्तुं ब्रह्मदयः सुराः
अहं किं वा करिष्यामि मृत्युर्धर्मा नरोअल्पधिः
न जाने अहं स्वरुप ते न शरीरं न वा गुणान्
एकामेव ही जानामि भक्तिं त्वचर्णाबजयोः

जाप के अंत मे अपने हाथ मे पुष्प,अक्षत,जल ले कर अपने किये गए जाप पूजन को देवी के बाये हाथ मे संकल्प द्वारा प्रदान कर दंडवत प्रणाम करना चाहिए।

।।विसर्जन मंत्रं।।
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पूजकन के अंत में अपने हाथ में चावल,फूल लेकर देवी भगवतीत्रिपुर सुंदरी  का इस मंत्र को पढ़ कर  विसर्जन करना चाहिए-

गच्छ गच्छ सुरश्रेष्ठे स्वस्थानं परमेश्वरि त्रिपुर सुंदरी।पूजाराधनकाले च पुनरागमनाय च।।

षोडशी – त्रिपुर सुन्दरी साबर मंत्रं
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ॐ निरन्जन निराकार अवधू मूल द्वार में बन्ध लगाई पवन पलटे गगन समाई, ज्योति मध्ये ज्योत ले स्थिर हो भई ॐ मध्या: उत्पन्न भई उग्र त्रिपुरा सुन्दरी शक्ति आवो शिवघर बैठो, मन उनमन, बुध सिद्ध चित्त में भया नाद | तीनों एक त्रिपुर सुन्दरी भया प्रकाश | हाथ चाप शर धर एक हाथ अंकुश | त्रिनेत्रा अभय मुद्रा योग भोग की मोक्षदायिनी | इडा पिंगला सुषुम्ना देवी नागन जोगन त्रिपुर सुन्दरी | उग्र बाला, रुद्र बाला तीनों ब्रह्मपुरी में भया उजियाला |योगी के घर जोगन बाला, ब्रह्मा विष्णु शिव की माता |

श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं सौं ह्रीं श्रीं कं एईल
ह्रीं हंस कहल ह्रीं सकल ह्रीं सो:
ऐं क्लीं ह्रीं श्रीं

।।श्री त्रिपुरसुन्दरी स्तोत्रम्।।
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कदंबवनचारिणीं मुनिकदम्बकादंविनीं,
नितंबजितभूधरां सुरनितंबिनीसेविताम् |
नवंबुरुहलोचनामभिनवांबुदश्यामलां,
त्रिलोचनकुटुम्बिनीं त्रिपुरसुंदरीमाश्रये ॥|1|

कदंबवनवासिनीं कनकवल्लकीधारिणीं,
महार्हमणिहारिणीं मुखसमुल्लसद्वारुणींम् |
दया विभव कारिणी विशद लोचनी चारिणी,
त्रिलोचन कुटुम्बिनी त्रिपुर सुंदरी माश्रये ॥|2|

कदंबवनशालया कुचभरोल्लसन्मालया,
कुचोपमितशैलया गुरुकृपालसद्वेलया |
मदारुणकपोलया मधुरगीतवाचालया ,
कयापि घननीलया कवचिता वयं लीलया ॥|3|

कदंबवनमध्यगां कनकमंडलोपस्थितां,
षडंबरुहवासिनीं सततसिद्धसौदामिनीम् |
विडंवितजपारुचिं विकचचंद्रचूडामणिं ,
त्रिलोचनकुटुंबिनीं त्रिपुरसुंदरीमाश्रये ॥|4|

कुचांचितविपंचिकां कुटिलकुंतलालंकृतां ,
कुशेशयनिवासिनीं कुटिलचित्तविद्वेषिणीम् |
मदारुणविलोचनां मनसिजारिसंमोहिनीं ,
मतंगमुनिकन्यकां मधुरभाषिणीमाश्रये ॥|5|

स्मरेत्प्रथमपुष्प्णीं रुधिरबिन्दुनीलांबरां,
गृहीतमधुपत्रिकां मधुविघूर्णनेत्रांचलाम्‌ |
घनस्तनभरोन्नतां गलितचूलिकां श्यामलां,
त्रिलोचनकुटंबिनीं त्रिपुरसुंदरीमाश्रये ॥|6|

सकुंकुमविलेपनामलकचुंबिकस्तूरिकां ,
समंदहसितेक्षणां सशरचापपाशांकुशाम् |
असेष जनमोहिनी मरूण माल्य भुषाम्बरा,
जपाकुशुम भाशुरां जपविधौ स्मराम्यम्बिकाम ॥|7|

पुरम्दरपुरंध्रिकां चिकुरबंधसैरंध्रिकां ,
पितामहपतिव्रतां पटुपटीरचर्चारताम्‌ |
मुकुंदरमणीं मणिलसदलंक्रियाकारिणीं,
भजामि भुवनांबिकां सुरवधूटिकाचेटिकाम् ॥|8|

इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यश्रीमच्छंकराचार्य विरचितं त्रिपुरसुन्दरीस्तोत्रं संपूर्णम् ।

।। राहुलनाथ।।™
भिलाई,छत्तीसगढ़,भारत
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