शुक्रवार, 14 जनवरी 2022

ज्योतिष_में_हैं_32_प्रकार_के_राजयोग_एवम_सिद्धांत

#ज्योतिष_में_हैं_32_प्रकार_के_राजयोग_एवम_सिद्धांत
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यहां राज योग से आशय सरकारी नौकरी से या सरकारी उच्च पद से है जहां वाहन,निवास जैसी सारी सुविधाएं,नाम-सम्मान,एवं सुखी संतुष्ट जीवन राज योग द्वारा प्राप्त हो जाता है।ज्योतिषीय राजयोग परिकल्पना में राजयोग का अर्थ है वह जीवन जिसमें किसी भी प्रकार की असंतुष्टि ना हो, वह व्यक्ति जो अपने आप में पूर्ण संतुष्ट व आनन्दित हो।
कई बार आपने किसी व्यक्ति विशेष के लिए यह सुना होगा कि वह बहुत भाग्यवान है। जो लोग किस्मत के धनी होते हैं उन्हें सफलता की सीढ़ियों पर चढ़ते देर नहीं लगती है। ज्योतिष विज्ञान के अनुसार, कुंडली में बनने वाले राजयोग व्यक्ति को कामयाबी की बुलंदियों तक पहुंचाते हैं। राजयोग कुछ विशेष ग्रहों की युति, स्थान विशेष में उनकी उपस्थिति आदि से बनते हैं। इन राजयोग के कारण व्यक्ति बनता है धनवान।कुंडली में पहला, दूसरा, पांचवां, नौवां और ग्यारहवां भाव धन देने वाले भाव होते हैं। अगर इनके स्वामियों में युति, दृष्टि या राशि परिवर्तन संबंध बनता है तो इस स्थिति में धन योग का निर्माण होता है। इन राजयोग से व्यक्ति का आर्थिक जीवन बेहद समृद्धिशाली बनता है।
ज्योतिष के प्राचीन ग्रंथों में कुल 32 प्रकार के राजयोग बताए गए हैं।इनमे से कुछ योगों पे आज परिचर्चा करते और जानते है इनके विषय मे।
जिस मनुष्य की कुंडली में 32 प्रकार के सभी योग पूर्ण रूप से घटित हो जाते हैं,वह मनुष्य चक्रवर्ती सम्राट बनता है। इसमें नीचभंग राजयोग भी प्रमुख माने जाते हैं। आइए देखते हैं जन्मकुंडली में वे कौनसे योग होते हैं जिनके होने पर राजयोग बनता है तथा व्यक्ति को उच्च पद, मान सम्मान, धन तथा अन्य प्रकार की सुख-संपत्ति प्राप्त होती हैं।

#ज्योतिष_के_सिद्धांत
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१.पहला सिद्धांत : जन्मपत्री में जो नीच ग्रह अपने उच्चांश में बली हों तो व्यक्ति राजा के समान ऐश्वर्य भोगता हैं। जबकि उच्च के ग्रह अपने नीचांशो में होने पर व्यक्ति को गरीबी में जीवन बिताना पड़ता है।

२.दूसरा सिद्धांत : जिस मनुष्य का पूर्ण बली चन्द्रमा लग्न को छोड़कर शेष केन्द्र या त्रिकोण (4, 7, 10, 5, 9) में यदि पूर्ण बली शुक्र या बृहस्पति से युति बनाता हो तो वह मनुष्य साक्षात राजा के समान ही सुख-संपत्ति और वैभवपूर्ण जीवन जीता है।

३.तीसरा सिद्धांत : किसी व्यक्ति के जन्म समय में जो भी ग्रह अपनी नीच संज्ञा वाली राशि में स्थित हो या बैठा हो, यदि उस राशि का स्वामी और उसकी उच्च संज्ञा राशि का स्वामी त्रिकोण (5, 9) या केंद्र (1, 4, 7, 10) में बैठा हो तो वह मनुष्य या तो राजा होता है या फिर चारों दिशाओं में घूमने वाला यशस्वी, धार्मिक नेता होता है। ऐसा व्यक्ति राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मंत्री, योगी, शंकराचार्य या इसी तरह के पद पर विराजमान होता है।

४.चौथा सिद्धांत : जिस मनुष्य का कर्क लग्न बृहस्पति से युक्त हो, शुक्र धर्म स्थान में विराजमान हो तथा शनि व मंगल सातवें घर में बैठे हों तो वह मनुष्य सम्राट होता है।

५.पाँचवा सिद्धांत : किसी व्यक्ति के जन्म केसमय जो ग्रह नीच राशि में हो, उस राशि का स्वामी या उसकी उच्चराशि का स्वामी लग्न में हो या चंद्रमा से केंद्र (1,4,7,10) में हो तो वह व्यक्ति स्वभाव से अत्यंत धार्मिक तथा चक्रवर्ती सम्राट होता है।

६.छठा सिद्धांत : जिस व्यक्ति के दूसरे, पांचवें तथा नवें या ग्यारहवें घर में सभी शुभ ग्रह विराजमान हो तो वह मनुष्य धनवान होता है। यदि लग्नेश शुभ ग्रहों से युक्त होकर केंद्र त्रिकोण में उच्च या स्वगृही बैठा हो तो मनुष्य बहुत धनवान राजनीतिज्ञ होता है।

७.साँतवा सिद्धांत : यदि व्यक्ति की कुंडली में नवमेश अपने नवांशनाथ के साथ केन्द्र में पंचमेश से युति बना रहा हो तो ऐसे व्यक्ति का राजा भी सम्मान करते हैं। प्राय: ऐसे लोग उच्च पदस्थ सरकारी अफसर बनते हैं।

८.अथवा सिद्धांत : यदि मेष में गुरु, धन में शनि और चन्द्रमा, दशम में राहु-शुक्र साथ बैठे हो तो व्यक्ति बहुत बड़ा राजनेता बनता है। यदि सभी ग्रह (2,6,7,12) में बैठे हो तो व्यक्ति बहुत ही बड़ा प्रभावशाली राजपुरुष होता है।

#राज_योग_एक_परिचय
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सिंहासन राज योग
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महर्षि भृगु ने कहा है कि जिन लोगों की कुंडली में सभी ग्रह, दूसरे, तीसरे, छठे, आठवें और बारहवें घर में होते हैं वह महान राजयोग लेकर पैदा हुए हैं ऐसा जनाना चाहिए। इसे सिंहासन योग कहते हैं। इस योग को लेकर पैदा हुआ व्यक्ति राजगद्दी पर विराजमान होता है और राजा बनता है। आज के संदर्भ में बात करें तो ऐसे व्यक्ति कोई मंत्री या सरकारी क्षेत्र में उच्च पद पर विराजमान हो सकते हैं।

ध्वज राज योग
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जिस व्यक्ति की जन्म कुंडली में आठवें घर में अशुभ ग्रह, शनि, सूर्य, राहु मौजूद हों और शुभ ग्रह जैसे गुरु, चंद्रमा, शुक्र लग्न यानी पहले घर में मौजूद हों वह बड़े की किस्मत वाले होते हैं। ऐसे लोग ध्वज नामक राजयोग लेकर पैदा हुए हैं ऐसा मानना चाहिए। ऐसे लोग समाज में आदरणीय होते हैं और बड़े राजनेता हो सकते हैं।

चाप राज योग
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जिनकी कुंडली में गुरु अपनी राशि मीन या धनु में हों। शुक्र तुला राशि में और मंगल अपनी उच्च राशि मेष में स्थित होते हैं वह धन संपत्ति के मामले में बड़े ही सौभाग्यशाली होते हैं। भृगु संहिता के अनुसार ग्रहों की इस स्थिति से चाप नामक शुभ योग बनता है जिससे व्यक्ति राजा के समान प्रभावशाली होता है।

उभयचरी योग
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इस योग के कारण व्यक्ति बनता है बुद्धिमान
कुंडली में यदि चंद्रमा के अतिरिक्त राहु-केतु, सूर्य से दूसरे या बारहवें घर में स्थित हों तो कुंडली में उभयचरी योग का निर्माण होता है। इस राजयोग वाले व्यक्ति का भाग्य बड़ा प्रबल होता है। ऐसे जातक स्वभाव से हंसमुख और बुद्धिमान होते हैं। ये बड़ी से बड़ी चुनौतियों को आसानी से पार कर जाते हैं।

गज-केसरी राजयोग
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इस योग के कारण व्यक्ति अध्यात्म के क्षेत्र में पाता है सफलता
कुंडली में अगर गुरु बृहस्पति चंद्रमा से केन्द्र भाव में हो और किसी क्रूर ग्रह से संबंध नहीं रखता हो तो कुंडली में गज-केसरी राजयोग बनता है। इस राजयोग के कारण व्यक्ति धर्म और अध्यात्म के क्षेत्र में कामयाबी हासिल करता है। ऐसे व्यक्ति सरकारी सेवाओं में उच्च पद पर बैठते हैं।

पाराशरी राजयोग
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इस राजयोग के कारण व्यक्ति को मिलता है भौतिक सुख
कुंडली में जब केन्द्र भावों का संबंध त्रिकोण भाव से हो तो ऐसी स्थिति में पाराशरी राजयोग का निर्माण होता है। दशावधि में इस योग के प्रभाव से आप धनी और समृद्धिशाली बनेंगे। आपके पास दौलत, शौहरत, गाड़ी, बंगला आदि सारी चीज़ें होंगी।

चंद्रमा द्वारा राजयोग
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कुंडली में चंद्रमा ग्यारहवें घर में और गुरु तीसरे घर में स्थित होने पर राजयोग बनता है। इस योग को लेकर पैदा हुआ व्यक्ति राजा के समान होता है। यह अपने समाज में प्रसिद्धि प्राप्त करता है और धन संपन्न होता है। इस तरह कुंडली के पांचवें घर में बुध और दसवें घर में चंद्रमा होने पर राजयोग का फल प्राप्त होता है।

उच्च के गुरु द्वारा राजयोग
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कुंडली में गुरु कर्क लग्न में बैठा हो यानी उच्च का गुरु पहले घर में बैठा हो तो बाकी ग्रह अनुकुल नहीं होने पर भी व्यक्ति बहुत ही ज्ञानी, साहसी, धनी और आदरणीय हो जाता है। ऐसे व्यक्ति समाज में आदर पाता है और राजा के समान सुख पाता है।

बुध चंद्र के संयोग से राजयोग
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जिनकी कुंडली में बुध और चंद्रमा दोनों एक साथ वृष राशि में या कन्या राशि में स्थित होते हैं वह अपनी वाणी और चतुराई से जीवन में अपार सफलता प्राप्त करते हैं। भृगृ संहिता के अनुसार, यह चंद्रमा और बुध की इस स्थति राजयोग बनता है। ऐसे लोग राजनीति में भी काफी सफल होते हैं।

विपरीत राजयोग-
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"रन्ध्रेशो व्ययषष्ठगो,रिपुपतौ रन्ध्रव्यये वा स्थिते।
रिःफेशोपि तथैव रन्ध्ररिपुभे यस्यास्ति तस्मिन वदेत,
अन्योन्यर्क्षगता निरीक्षणयुताश्चन्यैरयुक्तेक्षिता,
जातो सो न्रपतिः प्रशस्त विभवो राजाधिराजेश्वरः॥"
 
जब छठे,आठवें,बारहवें घरों के स्वामी छठे,आठवे,बारहवें भाव में हो अथवा इन भावों में अपनी राशि में स्थित हों और ये ग्रह केवल परस्पर ही युत व दृष्ट हो, किसी शुभ ग्रह व शुभ भावों के स्वामी से युत अथवा दृष्ट ना हों तो 'विपरीत राजयोग' का निर्माण होता है। इस योग में जन्म लेने वाला मनुष्य धनी,यशस्वी व उच्च पदाधिकारी होता है।
 
नीचभंग राजयोग
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 जन्म कुण्डली में जो ग्रह नीच राशि में स्थित है उस नीच राशि का स्वामी अथवा उस राशि का स्वामी जिसमें वह नीच ग्रह उच्च का होता है, यदि लग्न से अथवा चन्द्र से केन्द्र में स्थित हो तो 'नीचभंग राजयोग' का निर्माण होता है। इस योग में जन्म लेने वाला मनुष्य राजाधिपति व धनवान होता है।

कुछ अन्य सिद्ध योग
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१.जन्मपत्री में जो नीच ग्रह अपने उच्चांश में बली हों तो व्यक्ति राजा के समान ऐश्वर्य भोगता हैं। २.जबकि उच्च के ग्रह अपने नीचांशो में होने पर व्यक्ति को गरीबी में जीवन बिताना पड़ता है।
३.जिस मनुष्य का पूर्ण बली चन्द्रमा लग्न को छोड़कर शेष केन्द्र या त्रिकोण (4,7,10,5,9) में यदि पूर्ण बली शुक्र या बृहस्पति से युति बनाता हो तो वह मनुष्य साक्षात राजा के समान ही सुख-संपत्ति और वैभवपूर्ण जीवन जीता है।
४.किसी व्यक्ति के जन्म समय में जो भी ग्रह अपनी नीच संज्ञा वाली राशि में स्थित हो या बैठा हो, यदि उस राशि का स्वामी और उसकी उच्च संज्ञा राशि का स्वामी त्रिकोण (5,9) या केंद्र (1,4,7,10) में बैठा हो तो वह मनुष्य या तो राजा होता है या फिर चारों दिशाओं में घूमने वाला यशस्वी, धार्मिक नेता होता है। ऐसा व्यक्ति राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मंत्री, योगी, शंकराचार्य या इसी तरह के पद पर विराजमान होता है।
५.जिस मनुष्य का कर्क लग्न बृहस्पति से युक्त हो, शुक्र धर्म स्थान में विराजमान हो तथा शनि व मंगल सातवें घर में बैठे हों तो वह मनुष्य सम्राट होता है।
६.किसी व्यक्ति के जन्म केसमय जो ग्रह नीच राशि में हो, उस राशि का स्वामी या उसकी उच्चराशि का स्वामी लग्न में हो या चंद्रमा से केंद्र (1,4,7,10) में हो तो वह व्यक्ति स्वभाव से अत्यंत धार्मिक ७.तथा चक्रवर्ती सम्राट होता है।
८.जिस व्यक्ति के दूसरे, पांचवें तथा नवें या ग्यारहवें घर में सभी शुभ ग्रह विराजमान हो तो वह मनुष्य धनवान होता है।
९. यदि लग्नेश शुभ ग्रहों से युक्त होकर केंद्र त्रिकोण में उच्च या स्वगृही बैठा हो तो मनुष्य बहुत धनवान राजनीतिज्ञ होता है।
१०.यदि व्यक्ति की कुंडली में नवमेश अपने नवांशनाथ के साथ केन्द्र में पंचमेश से युति बना रहा हो तो ऐसे व्यक्ति का राजा भी सम्मान करते हैं। प्राय: ऐसे लोग उच्च पदस्थ सरकारी अफसर बनते हैं।
यदि मेष में गुरु, धन में शनि और चन्द्रमा, दशम में राहु-शुक्र साथ बैठे हो तो व्यक्ति बहुत बड़ा राजनेता बनता है।
११. यदि सभी ग्रह (2,6,7,12) में बैठे हो तो व्यक्ति बहुत ही बड़ा प्रभावशाली राजपुरुष होता है।
१२.जब तीन या तीन से अधिक ग्रह अपनी उच्च राशि या स्वराशि में होते हुए केन्द्र में स्थित हों।
१३. जब कोई ग्रह नीच राशि में स्थित होकर वक्री और शुभ स्थान में स्थित हो।
१४.जब तीन या चार ग्रहों को दिग्बल प्राप्त हो।
१५.जब चन्द्र केन्द्र में स्थित हो और गुरु की उस पर दृष्टि हो।
१६.जब नवमेश व दशमेश का राशि परिवर्तन हो।
१७.जब नवमेश नवम में व दशमेश दशम में हो।
१८.जब नवमेश व दशमेश नवम में या दशम में हो।
।।संकलित पोस्ट द्वारा व्हाट्सएप।।
इस पोस्ट को लिखने के लिए स्व अनुभव के साथ साथ आवश्यकता अनुसार कुछ पोस्ट एवं फोट, व्हाट्सएप /फेसबुक/गुगल एवं अलग-अलग पौराणिक साहित्यों  द्वारा ली गई है।

#नोट–यदि आप अपने या अपने किसी परिचित की जन्मकुण्डली में मौजूद योगों के बारे में विस्तार से जानकारी लेना चाहते है तो ज्योतिष परामर्श के लिए आज ही सम्पर्क करें- 9827374074 (परामर्श सेवा निःशुल्क नहीं है)

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           लेखक एवं संकलनकर्ता
     ।। #राहुलनाथ ।।™ (ज्योतिष एवं वास्तुशास्त्री)
शिवशक्ति_ज्योतिष_एवं_अनुष्ठान,भिलाई,छत्तीसगढ़,भारत
 #चेतावनी:-इस लेख में वर्णित नियम ,सूत्र,व्याख्याए,तथ्य गुरू एवं साधु-संतों के कथन,ज्योतिष-वास्तु-तांत्रिक-आध्यात्मिक-साबरी ग्रंथो एवं स्वयं के अभ्यास अनुभव के आधार पर मात्र शैक्षणिक उद्देश्यों हेतु दी जाती है।इसे मानने के लिए आप बाध्य नही है।अतः बिना गुरु के निर्देशन के साधनाए या प्रयोग ना करे।विवाद या किसी भी स्थिती में लेखक जिम्मेदार नही होगा।विवाद की स्थिति में न्यायलय क्षेत्र दुर्ग छत्तीसगढ़,भारत।

गुरुवार, 13 जनवरी 2022

काली_और_दक्षिण_काली_में_क्या_अंतर_है

#प्रश्न:-#काली_और_दक्षिण_काली_में_क्या_अंतर_है?
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ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे नमः ,काली ही अपने दक्षिण और वाम रूप में प्रकट हुई हैं,और  रक्त(लाल) और कृष्‍णभेद(काला)से काली ही दो रूपों में अधिष्ठित है।थोड़ा सा गुण धर्म मे भी अंतर है।भगवती काली के अलग अलग नाम उनके स्वरूप, उनके गुण, उनके द्वारा धारण किए गए अस्त्र शास्त्र, उनके महत्व, उनके आविर्भाव के कारण है। भगवती अपने सभी रूपों में सभी कार्य करने में सक्षम है। अलग अलग स्थानों पे अलग अलग स्वरूपों की पूजा होती है। जैसे आसाम में कामाख्या काली, बंगाल में दक्षिण काली।काली कोई एक ,दस या पचास नही बल्कि करोड़ो अरबो कालिया है।आपने बहुत अच्छा प्रश्न किया है। शीघ्र ही इस विषय पे सम्पूर्ण पोस्ट लिखने का प्रयास करेंगे।धन्यवाद
🙏🏻🚩जयश्री महाकाल🚩🙏🏻
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।। राहुलनाथ।।™ (ज्योतिष एवं वास्तुशास्त्री)
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धन_के_नुकसा_से_कैसे_बचें_एवं_धन_प्राप्ति_उपाय

#धन_के_नुकसा_से_कैसे_बचें_एवं_धन_प्राप्ति_उपाय
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#धन_के_नुकसा_से_कैसे_बचें : 
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आप पूरी मेहनत करते है किंतु फिर भी बेवजह धन का नुकसान हो रहा है।काम करने वाले श्रमिक सही कार्य नही करते,बार-बार धन चोरी हो रहा है धन व्यवसाय में डूब रहा है या गायब हो जाता है।जो धन उधार ले रहा है वो वापस नही करता इत्यादि।तो इसका सर्वोत्तम उपाय है।की 

#उपाय:-
(१)प्रातः काल मे नीम की लकड़ी से दातुन करें।
(२)रात को झूठे बर्तन किचन में न रखें।
(३)उत्तर दिशा में बैठकर ही भोजन करें।
(४)भोजन की थाली में हाथ न धोएं।

#धन_प्राप्ति_का_उपाय : 
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(१)पहला उपाय यदि आप का लक्ष्य धन कमाना हैं तो यह उपाय आपका सहयोग कर सकता है।काली मिर्च के 5 दाने लें और उन्हें अपने सिर पर से 7 बार वार लें। इसके बाद किसी चौराहे या किसी सुनसान स्थान पर खड़े होकर चारों दिशाओं में 4 दाने फेंक दें। इसके बाद 5वें दाने को ऊपर आसमान की ओर उछाल दें। इसके बाद पुन: लौटते समय पीछे पलटकर न देंगे। माना जाता है कि इस उपाय से अचानक धन प्राप्ति के योग बनते हैं।आसान उपाय है एक बार अवश्य कर के देखे।।

(२)दूसरा उपाय यह कि १०-१० के या १००-१०० के १०० अच्छे नोट (कौन से नोट लेना है वो आपकीं अपनी सक्षमता पव निर्भर करता रहता)इकट्ठे करें एवं 100 सिक्के जो 1-2 या 5 रु के हो,उनको तिजोरी में सुरक्षित रखें। इस नोट की गड्डी को किसी का स्पर्श ना हो इसका ख्याल रखे।इन्हें रोज प्रतिदिन रात में सोने से पहले गिनकर उचित स्थान पर रख दें। हो सके तो नोटों के ढेर का एक चित्र खरीदकर ले आएं  और उसे घर में वहां पर चिपका दें जहां पर आपकी नजर सहज ही रूप से जाती हो।आजकल मोबाइल तो सबके पास होता है तो मोबाइल स्क्रीन पे नोट के ढेर का चित्र अवश्य लगाए।ये पूर्णतः वैज्ञानिक विधि द्वारा संदेश अवचेतन मन तक पहुचाने का प्रयास है।कुछ दिन इस उपाय को करे और इसका चमत्कारी असर देखे।

#भाग्य_चमकाने_का_अचूक_उपाय
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मंगलवार या शनिवार को एक पानी वाला नारियल लीजिये एवं उसे ऊपर से नीचे की ओर २१ बार उतार कर,किसी मंदिर की अग्नि या हवन में अपने नाम-गोत्र का उच्चारण कर समर्पित कर दे।इस उपाय को कम से कम 5 बार अवश्य करे।इस उपाय में इस्तेमाल हो रहे नारियल को घर के सभी सदस्यों के ऊपर से भी उतारा जा सकता है।इस उपाय से किसी भी प्रकार की ऊपरी बाधा, टोना-टोटका,नजर आदि का शमन हो जाता है और भाग्य का उदय होता है किंतु इसके साथ-साथ मेहनत करना भी आवश्यक है घर बैठे,बिना परिश्रम के कोई भी उपाय कार्य नही करता।ये अटल सत्य है।
#विशेष:-
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इन उपायों का उपयोग करने मैंने बहुत से भक्तो को कहा,या समझे की उपाय भक्तो को प्रदान किये।70%भक्तो से उपाय के बाद सकारात्मक परिणाम प्राप्त हुए।आप भी मेहनत करे,लगातार प्रयास करे,साथ-साथ धार्मिक, ऋषि-मुनियो द्वारा प्रदत्त उपायों की मदद ले ।बाकी गुरुदेव एवं भगवान माहाँकाल आपकीं इच्छा अवश्य पूरी करेंगे।ऐसी आशा है और विनती भी।

◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆ #इति_पोस्ट_सम्पूर्णं◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆
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लेखक एवं संकलनकर्ता:-
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#चेतावनी:-इस लेख में वर्णित नियम ,सूत्र,व्याख्याए,तथ्य गुरू एवं साधु-संतों के कथन,ज्योतिष-तांत्रिक-आध्यात्मिक-साबरी ग्रंथो एवं स्वयं के अभ्यास अनुभव के आधार पर मात्र शैक्षणिक उद्देश्यों हेतु दी जाती है।इसे मानने के लिए आप बाध्य नही है।अतः बिना गुरु के निर्देशन के साधनाए या प्रयोग ना करे।विवाद या किसी भी स्थिती में लेखक जिम्मेदार नही होगा।विवाद की स्थिति में न्यायलय क्षेत्र दुर्ग छत्तीसगढ़,भारत।
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#विशेष:-इस पोस्ट को लिखने के लिए स्व अनुभव के साथ साथ आवश्यकता अनुसार कुछ पोस्ट एवं फोट, व्हाट्सएप /फेसबुक/गुगल एवं अलग-अलग पौराणिक साहित्यों  द्वारा ली जाती है। जो किसी मित्र की पोस्ट/फ़ोटो हो सकती,अतः जिनकी पोस्ट है वे संपर्क कर सकते है।ऐसे अवस्था  में त्रुटि होने की संभावना हो सकती है कृपया गुरुजन,मित्रगण मुझे क्षमा करते हुए मेरा  मार्ग प्रशस्त कर साहित्य की त्रुटियों से अवगत कराएं जिससे कि लेख में भविष्य में सुधार किया जा सके।
*अगर आपको यह मंत्र पसंद है, तो कृपया शेयर, लाइक या कॉमेंट जरूर करें!
* कृपया अपने किसी भी तरह के सुझावों अथवा विचारों को हमारे साथ अवश्य शेयर करें।
*आप अपना हर तरह का फीडबैक हमें जरूर साझा करें, तब चाहे वह सकारात्मक हो या नकारात्मक: हो।आप यहाँ साझा करें।
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श्रीगणेश_वंदना_कवच_पंचरत्नस्तोत्र_एवं_मंत्र_संग्रह

#श्रीगणेश_वंदना_कवच_पंचरत्नस्तोत्र_एवं_मंत्र_संग्रह*******************************************|| श्री गणेश वंदना ||■■■■■■■■■■"नमामि विघ्ननाशनं, गणाधिप: गजाननं।","ऋद्धि सिद्धि दायकं, वरप्रद: विधायकं।।""गजाननं भूतगणादि सेवितम्","कपित्थ जम्बूफल चारू भक्षणम्।""उमासुतं शोकविनाश कारकम्।"'"नमामि विघ्नेश्वर पादपंकजम्।।"*"जय जय श्रीगणराज"* हिंदीअर्थ********सभी विघ्नों का नाश करने वाले,सभी गणों के अधिपति एवं मैं गजानन (जिनका हाथी के समान मुख है) के कमल के सामान चरणों को नमस्कार करता हु ।रिद्धि एवं सिद्धि प्रदान करने वाले एवं इच्छापुरक वर प्रदान करने वाले विधायक के कमल के सामान चरणों को नमस्कार करता हु ।मैं गजानन (जिनका हाथी के समान मुख है), जिनकी भुत आदि गण सेवा करते है,जो कप्पीथ और जम्बू फल के सार को खाते हैं ,आपके कमल के सामान चरणों को नमस्कार करता हुजो देवी उमा (पार्वती)के पुत्र है और जो जीवन के सभी दुखो का विनाश करते हैं।मैं उन विघ्नेश्वर (परमेश्वर जो जीवन के सभी विध्नों को ख़तम करते है) के कमल के सामान चरणों को नमस्कार करता हु ।श्रीगणेश जी के विभिन्न स्वरुपों का ध्यान■■■■■■■■■■■■■■■■■■■सिन्दूरवर्णं द्विभुजं गणेश,लम्बोदरं पद्मदले निविष्टम ।ब्रह्मादिदेवै: परिसेव्यमानं,सिद्धैर्युतं तं प्रणमामि देवम ।।#हिन्दीअनुवाद  भगवान गणेश की अंगकान्ति सिन्दूर के समान है, उनकी दो भुजाएँ हैं, वे लम्बोदर हैं और कमल दल पर विराजमान हैं. ब्रह्मा आदि देवता उनकी सेवा में लगे हैं और वे सिद्धसमुदाय से युक्त हैं. ऎसे श्रीगणेशपतिदेव को मैं प्रणाम करता/करती हूँ. ।।#गजवक्त्र ।।अविरलमदधाराधौतकुम्भ: शरण्य:,फणिवरवृतगात्र: सिद्धसाध्यादिवन्द्य: ।त्रिभुवनजनविघ्नध्वान्तविध्वंसदक्षो,वितरतु गजवक्त्र: संततं मंगलं व: ।।हिन्दी अनुवादजिनका कुंभस्थल निरंतर बहने वाली मदधारा से धुला हुआ है, जो सब के शरण दाता हैं, जिनके शरीर में बड़े-बड़े सर्प लिपटे रहते हैं, जो सिद्ध और साध्य आदि देवताओं के वन्दनीय हैं और तीनों लोकों के निवासी जनों के विघ्नान्धकार का विध्वंस करने में दक्ष हैं, वे गजानन गणेश आप लोगों को सदा मंगल प्रदान करें. ।।#महागणपति।।ओंकारसंनिभमिभाननमिन्दुभालं,मुक्ताग्रबिन्दुममलद्युतिमेकदन्तम ।लम्बोदरं कलचतुर्भुजमादिदेवं,ध्यायेन्महागणपतिं मतिसिद्धिकान्तम ।।हिन्दी अनुवादओंकार के समान, हाथी के समान मुख वाले, जिनके ललाट पर चंद्रमा और बिन्दुतुल्य मुक्ता विराजमान हैं, जो बड़े तेजस्वी और एक दाँत वाले हैं, जिनका पेट लंबा हैं, जिनकी चार सुंदर भुजाएँ हैं. उन बुद्धि और सिद्धि के स्वामी आदि देव गणेश जी का हम ध्यान करते हैं. ।।#विघ्नेश्वर।।विघ्नध्वान्तनिवारणैकतरणिर्विघ्नाटवीहव्यवाड्।विघ्नव्यालकुलाभिमानगरुडो विघ्नेभपंचानन:।।विघ्नोत्तुंगगिरिप्रभेदनपविर्विघ्नाम्बुधौ वाडवो।विघ्नाघौघघनप्रचण्डपवनो विघ्नेश्वर: पातु व: ।। हिन्दी अनुवादवे विघ्नेश्वर लोगों की रक्षा करें जो विघ्नान्धकार का निवारण करने के लिये एकमात्र सूर्य हैं. विघ्नरुपी विपिन को जलाकर भस्म करने के लिये दावानाल रुप हैं. विघ्नरुपी सर्पकुल के अभिमान को कुचल डालने के लिये गरुड़ हैं. विघ्नरुपी गजराज को पछाड़ने के लिये सिंह हैं. विघ्नों के ऊँचे पर्वत का भेदन करने के लिये वज्र हैं. विघ्न समुद्र के लिये वड़वानल हैं तथा विघ्न व पाप समूहरुपी मेघों की घटा को छिन्न-भिन्न करने के लिये प्रचण्ड पवन हैं.।।@गणपति।।सिन्दूराभं त्रिनेत्रं पृथुतरजठरं हस्तपद्मैर्दधानं।दन्तं पाशांकुशेष्टान्युरुकरविलसद बीजपूराभिरामम ।।बालेन्दुद्योतमौलिं करिपतिवदनं दानपूरार्द्रगण्डं।भोगीन्द्राबद्धभूषं भजत गणपतिं रक्तवस्त्रांगरागम ।। हिन्दी अनुवादजो सिन्दूर की सी अंगकान्ति धारण करने वाले तथा त्रिनेत्रधारी हैं, जिनका उदर बहुत विशाल है, जो अपने चार हस्त कमलों में – दन्त, पाश, अंकुश तथा वर मुद्रा धारण करते हैं, जिनके विशाल शुण्ड – दण्ड में बीजपूर अर्थात बिजौरा नींबू या अनार शोभा दे रहा है, जिनका मस्तक बालचन्द्र से दीप्तिमान व गण्डस्थल मद के प्रवाह से आर्द्र है, नागराज को जिन्होने भूषण के रुप में धारण किया हुआ है, जो लाल वस्त्र व अरुण अंगराग से सुशोभित है, उन गजेन्द्र-वदन गणपति का भजन करो. ।।@एकाक्षरगणपति।।रक्तो रक्तांगरागांशुककुसुमयुतस्तुन्दिलश्चन्द्रमौलि।र्नेत्रेर्युक्तस्त्रिभिर्वामनकरचरणो बीजपूरान्तनास: ।।हस्ताग्राक्लृप्तपाशांकुशरदवरदो नागवक्त्रोsहिभूषो।देव: पद्मासनो वो भवतु नतसुरो भूतये विघ्नराज: ।। हिन्दी अनुवादवे विघ्ननाशक श्रीगणपति शरीर से रक्त वर्ण के हैं. उन्होने लाल रंग के ही अंगराग, वस्त्र और पुष्पहार धारण कर रखे हैं, वे लम्बोदर हैं. उनके मस्तक पर चन्द्राकार मुकुट है, उनके तीन नेत्र हैं तथा छोटे-छोटे हाथ – पैर हैं, उन्होंणे शुण्डाग्र भाग में बीजपूर अर्थात बिजौरा नींबू ले रखा है. उनके हस्ताग्र भाग में पाश, अंकुश, दन्त तथा मुद्रा है शोभायमान है, उनका मुख गज यानि हाथी के समान है और सर्पमय आभूषण धारण किये हुए हैं. वे कमल के आसन पर विराजमान हैं. सभी देवता उनके चरणों में नतमस्तक हैं, ऎसे विघ्नराजदेव लोगों के लिये कल्याणकारी हों. ।।#हेरम्बगणपति।।मुक्ताकांचननीलकुन्दघुसृणच्छायैस्त्रिनेत्रान्वितै-र्नागास्यैर्हरिवाहनं शशिधरं हेरम्बमर्कप्रभम ।दृप्तं दानमभीतिमोदकरदान टंकं शिरोsक्षात्मिकांमालां मुद्गरमंकुशं त्रिशिखिकं दोर्भिर्दधानं भजे ।।हिन्दी अनुवादहेरम्बगणपति पाँच हस्तिमुखों से युक्त हैं. चार हस्तिमुख चारों ओर है तो एक ऊर्ध्व दिशा में हैं. उनका ऊर्ध्व हस्तिमुख मुक्तावर्ण का है. दूसरे चार हस्तिमुख क्रमश: कांचन, नील, कुंद अर्थात श्वेत और कुंकुम वर्ण के हैं. प्रत्येक हस्तिमुख तीन नेत्रों वाला है. वे सिंहवाहन हैं. उनके कपाल में चन्द्रिका विराजित है और देह की कान्ति सूर्य के समान प्रभायुक्त है. वे बलदृप्त हैं और अपनी दस भुजाओं में वर और अभयमुद्रा तथा क्रमश: लड्डू, दन्त, टंक, सिर, अक्षमाला, मुद्गर, अंकुश और त्रिशूल धारण करते हैं. मैं उन भगवान हेरम्ब का भजन करता/करती हूँ.।। #सिंहगणपति ।।वीणां कल्पलतामरिं च वरदं दक्षे विधत्ते करै।र्वामे तामरसं च रत्नकलशं सन्मंजरीं चाभयम ।।शुण्डादण्डलसन्मृगेन्द्रवदन: शंखेन्दुगौर: शुभो।दीव्यद्रत्ननिभांशुको गणपति: पायादपायात स न: ।। हिन्दी अनुवादजो दायें हाथों में वीणा, कल्पलता, चक्र तथा मुद्रा धारण करते हैं और बाएँ हाथों में कमल, रत्नकलश, सुंदर धान्य मंजरी व अभय मुद्रा धारण किए हुए हैं, जिनका सिंह के समान मुख शुण्डादण्द से सुशोभित है, जो शंख और चन्द्रमा के समान गौरवर्ण हैं तथा जिनका वस्त्र दिव्य रत्नों के समान दीप्तिमान हैं, वे शुभस्वरुप गणपति हमें विनाश से बचायें. ।।#बालगणपति।।क्रोडं तातस्य गच्छन विशदबिसधिया शावकं शीतभानो।राकर्षन बालवैश्वानरनिशितशिखारोचिषा तप्यमान: ।।गंगांम्भ: पातुमिच्छन भुजगपतिफणाफूत्कृतैर्दूयमानो।मात्रा सम्बोध्य नीतो दुरितमपनयेद बालवेषो गणेश: ।। हिन्दी अनुवादबालक गणेश जी अपने पिता शंकर जी के मस्तक पर सुशोभित बाल चन्द्र कला को कमल नाल समझकर उसे खींच लाने के लिये उनकी गोद में चढ़कर ऊपर लपके लेकिन तृतीय नेत्र से निकली लपटों की आँच लगी तब जटाजूट में बहने वाली गंगा का जल पीने को बढ़े तो सर्प फुफकार उठा. इस फुफकार से घबराए हुए गणेश जी को माता पार्वती बहला-फुसलाकर अपने साथ ले जाती हैं. ऎसे बाल गणेश हमारे सभी पाप-ताप का निवारण करें.    #गणेश कवच||◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆ कवच एक प्रकार का अदृश्य सुरक्षा चक्र है जो मनुष्य को सभी प्रकार के यंत्र तंत्र मंत्र से सुरक्षा प्रदान करता है। कवच बनाने से यह लाभ होता है, जब हम किसी देव विशेष की पूजा और मन्त्र का जाप करते हैं तो मन में उसी देव का विचार होना चाहिए, मन विचलित नहीं होना चाहिए।श्री गणेशाय नमःगौरी उवाच-एषोऽतिचपलो दैत्यान्बाल्येऽपि नाशयत्यहो ।अग्रे किं कर्म कर्तेति न जाने मुनिसत्तम ।।1।।पार्वती जी बोले:हे ऋषि श्रेष्ठ (मरीचि मुनि)हमारा पुत्र गणेश अत्यधिक चप्पल हो गया है बचपन से इन्होंने दुष्ट व्यक्तियों को मारा है और आश्चर्यचकित कार्य कर दिखाए हैं इससे आगे क्या होगा मुझे मालूम नहीं है।दैत्या नानाविधा दुष्टा: साधुदेवद्रुह: खला: ।अतोऽस्य कण्ठे किंचित्त्वं रक्षार्थं बद्धुमर्हसि ।।2।।नकारात्मक प्रवृत्तियों वाले व्यक्तियों से बचने के लिए बाल गणेश के गले में ताबीज आदि बांधने के विषय में कहो।ऋषि उवाच-ध्यायेत्सिंहगतं विनायकममुं दिग्बाहुमाद्यं युगेत्रेतायां तु मयूरवाहनममुं षड्बाहुकं सिद्धिदम् ।द्वापरे तु गजाननं युगभुजं रक्तांगरागं विभुम्तुर्ये तु द्विभुजं सितांगरूचिरं सर्वार्थदं सर्वदा ।।3।।मुनि जी बोले:ध्यान,सतयुग में दस हाथ धारण करके सिंह पर सवार होने वाले विनायक जी का ध्यान करें। त्रेता युग में छः हाथ धारण करके व मयूर की सवारी करने वाले, द्वापर युग में चार भुजावाले, नाव में अवतरित रक्तवर्ण गजानन का ध्यान करें तथा कलयुग में दो हाथ व सुंदर श्वेत स्वरूप धारण करके अवतार लेने वाले और अपने भक्तों को सभी प्रकार के सुख देने वाले गणेश जी का ध्यान करें।विनायक: शिखां पातु परमात्मा परात्पर: ।अतिसुंदरकायस्तु मस्तकं सुमहोत्कट: ।।4।।परमात्मा विनायक आप शिखा स्थान में हमारी रक्षा करें। अतिशय सुंदर शरीर वाले अत्यंत समर्थवान गणेश जी मस्तक में रक्षा करें।ललाटं कश्यप: पातु भ्रूयुगं तु महोदर: ।नयने भालचन्द्रस्तु गजास्यस्तवोष्ठपल्लवौ ।।5।।कश्यप के पुत्र गणेश ललाट में हमारी रक्षा करें, विशाल उधर वाले गणेश जी हमारी भोहों में रक्षा करें। भालचंद्र गणेश जी हमारी आंखों की रक्षा करें और गज बदन गणेश मुख्य की एवं दोनों होठों की रक्षा करें।जिह्वां पातु गणाक्रीडश्रिचबुकं गिरिजासुत: ।पादं विनायक: पातु दन्तान् रक्षतु दुर्मुख: ।।6।।शिवगणों में बराबर क्रीड़ा करने वाले गणेश जी हमारे ठोडी की रक्षा करें, गिरिजेश पुत्र गणेश जी हमारे तालु की रक्षा करें, विनायक हमारी वाणी की रक्षा करें और विघ्नहर्ता गणेश जी दांतो की रक्षा करें।श्रवणौ पाशपाणिस्तु नासिकां चिंतितार्थद: ।गणेशस्तु मुखं कंठं पातु देवो गणञज्य: ।।7।।हाथों के मध्य पाश धारण करने वाले गणेश जी दोनों कानों की रक्षा करें, मनोवांछित फल देने वाले गणेश जी नाक की रक्षा करें। गणों के अधिपति गणेश जी हमारे मुख एवं गले की रक्षा करें।स्कंधौ पातु गजस्कन्ध: स्तनौ विघ्नविनाशन: ।ह्रदयं गणनाथस्तु हेरंबो जठरं महान् ।।8।।गजस्कंध गणेश जी स्कंधों की रक्षा करें। विघ्नों के विनाशक गणेश जी हमारे स्तनों की रक्षा करें। गणनाथ गणेश हमारे हृदय की रक्षा करें और परम श्रेष्ठ हेरम्ब हमारे पेट की रक्षा करें।धराधर: पातु पाश्र्वौ पृष्ठं विघ्नहर: शुभ: ।लिंगं गुज्झं सदा पातु वक्रतुन्ड़ो महाबल: ।।9।।धरणीधर गणेश जी हमारे दोनों बांहों की रक्षा करें। सर्वमंगल व विघ्नहर्ता गणेश जी आप हमारे पीठ की रक्षा करें। वक्रतुंड और महा सामर्थवान गणेश जी हमारे लिंग व गुह्म की रक्षा करें।गणाक्रीडो जानुजंघे ऊरू मंगलमूर्तिमान् ।एकदंतो महाबुद्धि: पादौ गुल्फौ सदाऽवतु ।।10।।गणक्रीडा नाम धारण करने वाले गणेश जी आप हमारे दोनों घुटनों के जांघों की रक्षा करें। मंगलमूर्ति दोनों ऊरू की रक्षा करें। एकदंत गणेश जी आप हमारे दोनों पांव और महाबुद्धि वाले गणेश जी हमारे गुल्फों की रक्षा करें।क्षिप्रप्रसादनो बाहू पाणी आशाप्रपूरक: ।अंगुलीश्च नखान्पातु पद्महस्तोऽरिनाशन ।।11।।शीघ्र प्रसन्न होने वाले गणेश जी दोनों बाहुओं की रक्षा करें, भक्तों की मनोकामना पूर्ण करने वाले हमारे हाथों की रक्षा करें। हाथों में पदम धारण करने वाले और शत्रुओं का नाश करने वाले गणेश जी आप हमारी उंगलियों तथा नाखूनों की रक्षा करें।सर्वांगनि मयूरेशो विश्र्वव्यापी सदाऽवतु ।अनुक्तमपि यत्स्थानं धूम्रकेतु: सदाऽवतु ।।12।।संपूर्ण विश्वव्यापी मयूरेश सर्वांगों अर्थात सभी अंगों की रक्षा करें। जो स्थान स्त्रोत में नहीं कहे गए हो उनकी रक्षा धूम्रकेतु नामक गणेश जी महाराज करें।आमोदस्त्वग्रत: पातु प्रमोद: पृष्ठतोऽवतु ।प्राच्यां रक्षतु बुद्धीश आग्नेय्यां सिद्धिदायक: ।।13।।प्रसन्नचित्त नाव में विचरण करने वाले गणेश जी बाजूओं के पीछे की रक्षा करें और बाजुओं के आगे की रक्षा करें, बुद्धि के अधिपति पूर्व दिशा में हमारी रक्षा करें तथा सिद्धिदायक आग्नेय दिशा में हमारी रक्षा करें।दक्षिणस्यामुमापुत्रो नैर्ऋत्यां तु गणेश्वर: ।प्रतीच्यां विघ्नहर्ताऽव्याद्वायव्यां गजगर्णक: ।।14।।उमा के पुत्र गणेश जी दक्षिण दिशा में हमारी रक्षा करें, गणों के अधिपति नेत्रत्य दिशा में हमारी रक्षा करें। विघ्नहर्ता गणेश जी पश्चिम दिशा में हमारी रक्षा करें और गजकर्ण वायव्य दिशा में हमारी रक्षा करें।कौबेर्यां निधिप: पायादीशान्यामीशनन्दन: ।दिवोऽव्यादेलनन्दस्तु रात्रौ संध्यासु विघ्नह्रत् ।।15।।निधि में अधिपति गणेश जी उत्तर दिशा में हमारी रक्षा करें। शिवपुत्र गणेश जी ईशान दिशा में हमारी रक्षा करें, एकदंत गणेश जी आप दिन में हमारी रक्षा करें। विघ्नहर्ता रात्रि व संध्याकाल में हमारी रक्षा करें।राक्षसासुरवेतालग्रहभूतपिशाचत:पाशांकुशधर: पातु रज:सत्त्वतम:स्मृति: ।।16।।पाश अंकुश धारण करने वाले व सत रज तम तीन गुणों से जाने जाने वाले गणेश जी आप राक्षस, दैत्य, वैताल, ग्रह, भूत पिशाच आदि से हमारी रक्षा करें।ज्ञानं धर्मं च लक्ष्मीं च लज्जां कीर्तिं तथा कुलम् ।वपुर्धनं च धान्यश्र्च ग्रहदारान्सुतान्सखीन् ।।17।।ज्ञान, धर्म, लज्जा, कीर्ति, कुल, शरीर, स्त्री, पुत्र, मित्रों की रक्षा करें।सर्वायुधधर: पौत्रान्मयूरेशोऽवतात्सदा ।कपिलोऽजाबिकं पातु गजाश्रवान्विकटोऽवतु ।।18।।सर्व आयुध धारण करने वाले गणेश जी पोत्रों की रक्षा करें। कपिल नाम गणेश बकरी, गाय आदि की रक्षा करें। हाथी घोड़ों की रक्षा विकट नाम के गणेश जी करें।भूर्जपत्रे लिखित्वेदं य: कण्ठेधारयेत्सुधी: ।न भयं जायते तस्य यक्षरक्ष:पिशाचत: ।।19।।पढ़ने की फलश्रुतिजो उत्कृष्ट बुद्धिमान मनुष्य इस कवच को भोजपत्र पर लिखकर गले में धारण करता है। उसके सामने कभी यक्ष राक्षस व पिशाच नहीं आते।त्रिसंध्यं जपते यस्तु वज्रसारतनुर्भवेत् ।यात्राकाले पठेद्यस्तु निर्विघ्नेन फलं लभेत् ।।20।।जो कोई प्रातः दोपहर व संध्याकाल तीनों काल में कवच स्त्रोत का पाठ करता है तथा विधि पूर्वक जब करता है उसका शरीर वज्र जैसा कठोर बन जाता है। जो कोई यात्रा के समय इसका पाठ करता है उसकी यात्रा सफल होती है, बिना विघ्न के उसे अच्छा फल मिलता है।युद्धकाले पठेद्यस्तु विजयं चाप्नुयाद्ध्रुवम् ।मारणोच्चटनाकर्षस्तंभमोहनकर्मणि ।।21।।युद्ध के समय वीर पुरुष इस कवच को पढ़ने से शत्रु पर विजय पता है। मारण, उच्चाटन, आकर्षण, स्तंभन व मोहन ऐसी क्रिया करते हैं जिससे शत्रु पर विजय प्राप्त होती है।सप्तवारं जपेदेतद्दिननामेकविशतिम ।तत्तत्फलमवाप्नोति साधको नात्र संशय: ।।22।।जो कोई प्रतिदिन सात बार इसका पाठ करता है या इक्कीसवे दिन इस कवच का पाठ करने से साधक को अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है।एकविंशतिवारं च पठेत्तावद्दिनानि य: ।काराग्रहगतं सद्यो राज्ञा वध्यं च मोचयेत् ।।23।।जो कोई प्रतिदिन इक्कीस बार के नियम से इक्कीस दिन लगातार इसका पाठ करता है तो वह कारागृह एवं राज बंधन से मुक्त हो जाता है।राजदर्शनवेलायां पठेदेतत्तत्त्रिवारत: ।स राजानं वशं नीत्वा प्रक्रतीश्र्च सभां जयेत् ।।24।।राजा के दर्शन के समय जो कोई पुरुष इस कवच को तीन बार पाठ करें तो निश्चित ही वह राजा को वश में करके राज सभा में विजय व सम्मान प्राप्त करता है।इदं गणेशकवचं कश्यपेन समीरितम् ।मुद्गलाय च तेनाथ मांडव्याय महर्षये ।।25।।मरीच ऋषि पार्वती से बोले कि यह गणेश कवच कश्यप जी ने मुद्गल ऋषि को सुनाया तथा मुद्गल ऋषि ने मांडव्य ऋषि को सुनाया।मज्झं स प्राह कृपया कवचं सर्वसिद्धिदम् ।न देयं भक्तिहीनाय देयं श्रद्धावते शुभम् ।।26।।मांडव्य ऋषि ने सर्वसिद्धि देने वाली यह कवच पाठ मुझे पढ़ाया, हे देवी इसे भक्तिहीन मनुष्य को नहीं देना चाहिए। श्रद्धावान मनुष्य को यह कवच पाठ देना लाभदायक होता है।अनेनास्य कृता रक्षा न बाधाऽस्य भवेत्कचित् ।राक्षसासुरवेतालदैत्यदानवसंभवा ।।27।।हे देवी इस गणेश कवच के पाठ से बाल गणेश की रक्षा होगी। हमारे शत्रु, राक्षस, दैत्य, दानव, असुर से कोई भय नहीं रहेगा। यह सुनिश्चित समझो।।।अथ श्री गणेश पुराणे गणेशकवचं सम्पूर्णम्।।■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■■■■■■■■■■■■■■■#श्रीगणेश_पंचरत्नस्तोत्र।।   ■■■■■■■■■■■■■■मुदा करात्त मोदकं सदा विमुक्ति साधकम् ।कलाधरावतंसकं विलासिलोक रक्षकम् ।अनायकैक नायकं विनाशितेभ दैत्यकम् ।नताशुभाशु नाशकं नमामि तं विनायकम् ॥ 1 ॥नतेतराति भीकरं नवोदितार्क भास्वरम् ।नमत्सुरारि निर्जरं नताधिकापदुद्ढरम् ।सुरेश्वरं निधीश्वरं गजेश्वरं गणेश्वरम् ।महेश्वरं तमाश्रये परात्परं निरन्तरम् ॥ 2 ॥समस्त लोक शङ्करं निरस्त दैत्य कुञ्जरम् ।दरेतरोदरं वरं वरेभ वक्त्रमक्षरम् ।कृपाकरं क्षमाकरं मुदाकरं यशस्करम् ।मनस्करं नमस्कृतां नमस्करोमि भास्वरम् ॥ 3 ॥अकिञ्चनार्ति मार्जनं चिरन्तनोक्ति भाजनम् ।पुरारि पूर्व नन्दनं सुरारि गर्व चर्वणम् ।प्रपञ्च नाश भीषणं धनञ्जयादि भूषणम् ।कपोल दानवारणं भजे पुराण वारणम् ॥ 4 ॥नितान्त कान्ति दन्त कान्ति मन्त कान्ति कात्मजम् ।अचिन्त्य रूपमन्त हीन मन्तराय कृन्तनम् ।हृदन्तरे निरन्तरं वसन्तमेव योगिनाम् ।तमेकदन्तमेव तं विचिन्तयामि सन्ततम् ॥ 5 ॥महागणेश पञ्चरत्नमादरेण योऽन्वहं ।प्रजल्पति प्रभातके हृदि स्मरन् गणेश्वरम् ।अरोगतामदोषतां सुसाहितीं सुपुत्रताम् ।समाहितायु रष्टभूति मभ्युपैति सोऽचिरात् ॥ 6 ॥इति श्री शंकराचार्य विरचितं श्री महागणेश पञ्चरत्नं संपूर्णम्।।***********************************************************श्रीगणेश_पंचरत्नस्तोत्र इसके भावार्थ इस प्रकार हैं –■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■मै भगवान श्री गणेश को विनम्रता के साथ अपने हाथों से मोदक प्रदान करता हुँ जो मुक्ति के प्रदाता हैं। चंद्रमा जिसके सिर पर मुकुट के समान विराजमान हैं जो राजाधिराज हैं जिन्होंने गजासुर नाम के हाथी दानव का वध किया था और सभी लोगोें के पापों का विनाश कर देते हैं ऐसे गणेश जी की पूजा करते हैं।। 1।।मैं उस भगवान गणेश जी पर सदा ध्यान अर्पित करता हुँ जो समर्पित नहीं हैं, जो उषा काल की तरह चमकते हैं जिसे सभी राक्षस एवं देवता सम्मान करते हैं, जो भगवानों में सर्वोत्तम हैं।।2।।मैं अपने मन को उस चमकते हुए भगवान गणपति के समक्ष झुकाता हुँ जो संसार के सभी खुशियों के प्रदाता हैं, जिन्होंने गजासुर दानव का वध किया था, जिनका बड़ा पेट है, हाथी के तरह सुन्दर चेहरा है, जो अविनाशी हैं, जो क्षमा को भी क्षमा करते हैं और खुशी और प्रसिद्धि प्रदान करते हैं, और बुद्धि के प्रदाता हैं।।।3।।मैं उन हाथी जैसे भगवान की पूजा करता हुँ जो गरीबों का दुख-दर्द दूर करते हैं जो ओम का निवास है, जो भगवान शिव के पहले पुत्र हैं, जो परमपिता परमेश्वर के शत्रुओं का विनाश करने वाले हैं, जो विनाश के समान भयंकर हैं, जो एक गज के समान दुष्ट हैं और धनंजय हैं और सर्प को अपने आभूषण के रूप में धारण करते हैं।।4।।मै सदा उस भगवान को प्रतिबिंबित करता हुँ जिनके चमदार दन्त हैं, जिनके दन्त बहुत सुन्दर हैं, जिनका स्वरूप अमर और अविनाशी है, जो सभी बाधाओं को दूर करते हैं, और जो हमेंशा योगियों के दिल में वास करते हैं।।5।।जो व्यक्ति प्रातःकाल में इस स्तोत्र का पाठ करता है, जो व्यक्ति भगवान गणेश पांच रत्न अपने शुद्ध हृदय मंें याद करता है तुरंत ही उसका शरीर दाग-धब्बों से मुक्त होकर जीवन स्वस्थ हो जायगा, वह शिक्षा के शिखर को प्राप्त करेगा, लम्बा जीवन शांति और सुख के साथ आध्यात्मिक एवं भौतिक समृद्धि के साथ सम्पन्न हो जायेगा।#श्रीगणेश_चालीसा■■■■■■■■■■॥ दोहा ॥जय गणपति सदगुण सदन,कविवर बदन कृपाल ।विघ्न हरण मंगल करण,जय जय गिरिजालाल ॥॥ चौपाई ॥जय जय जय गणपति गणराजू ।मंगल भरण करण शुभः काजू ॥जै गजबदन सदन सुखदाता ।विश्व विनायका बुद्धि विधाता ॥वक्र तुण्ड शुची शुण्ड सुहावना ।तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन ॥राजत मणि मुक्तन उर माला ।स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला ॥पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं ।मोदक भोग सुगन्धित फूलं ॥सुन्दर पीताम्बर तन साजित ।चरण पादुका मुनि मन राजित ॥धनि शिव सुवन षडानन भ्राता ।गौरी लालन विश्व-विख्याता ॥ऋद्धि-सिद्धि तव चंवर सुधारे ।मुषक वाहन सोहत द्वारे ॥कहौ जन्म शुभ कथा तुम्हारी ।अति शुची पावन मंगलकारी ॥एक समय गिरिराज कुमारी ।पुत्र हेतु तप कीन्हा भारी ॥ 10 ॥भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा ।तब पहुंच्यो तुम धरी द्विज रूपा ॥अतिथि जानी के गौरी सुखारी ।बहुविधि सेवा करी तुम्हारी ॥अति प्रसन्न हवै तुम वर दीन्हा ।मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा ॥मिलहि पुत्र तुहि, बुद्धि विशाला ।बिना गर्भ धारण यहि काला ॥गणनायक गुण ज्ञान निधाना ।पूजित प्रथम रूप भगवाना ॥अस कही अन्तर्धान रूप हवै ।पालना पर बालक स्वरूप हवै ॥बनि शिशु रुदन जबहिं तुम ठाना ।लखि मुख सुख नहिं गौरी समाना ॥सकल मगन, सुखमंगल गावहिं ।नाभ ते सुरन, सुमन वर्षावहिं ॥शम्भु, उमा, बहुदान लुटावहिं ।सुर मुनिजन, सुत देखन आवहिं ॥लखि अति आनन्द मंगल साजा ।देखन भी आये शनि राजा ॥ 20 ॥निज अवगुण गुनि शनि मन माहीं ।बालक, देखन चाहत नाहीं ॥गिरिजा कछु मन भेद बढायो ।उत्सव मोर, न शनि तुही भायो ॥कहत लगे शनि, मन सकुचाई ।का करिहौ, शिशु मोहि दिखाई ॥नहिं विश्वास, उमा उर भयऊ ।शनि सों बालक देखन कहयऊ ॥पदतहिं शनि दृग कोण प्रकाशा ।बालक सिर उड़ि गयो अकाशा ॥गिरिजा गिरी विकल हवै धरणी ।सो दुःख दशा गयो नहीं वरणी ॥हाहाकार मच्यौ कैलाशा ।शनि कीन्हों लखि सुत को नाशा ॥तुरत गरुड़ चढ़ि विष्णु सिधायो ।काटी चक्र सो गज सिर लाये ॥बालक के धड़ ऊपर धारयो ।प्राण मन्त्र पढ़ि शंकर डारयो ॥नाम गणेश शम्भु तब कीन्हे ।प्रथम पूज्य बुद्धि निधि, वर दीन्हे ॥ 30 ॥बुद्धि परीक्षा जब शिव कीन्हा ।पृथ्वी कर प्रदक्षिणा लीन्हा ॥चले षडानन, भरमि भुलाई ।रचे बैठ तुम बुद्धि उपाई ॥चरण मातु-पितु के धर लीन्हें ।तिनके सात प्रदक्षिण कीन्हें ॥धनि गणेश कही शिव हिये हरषे ।नभ ते सुरन सुमन बहु बरसे ॥तुम्हरी महिमा बुद्धि बड़ाई ।शेष सहसमुख सके न गाई ॥मैं मतिहीन मलीन दुखारी ।करहूं कौन विधि विनय तुम्हारी ॥भजत रामसुन्दर प्रभुदासा ।जग प्रयाग, ककरा, दुर्वासा ॥अब प्रभु दया दीना पर कीजै ।अपनी शक्ति भक्ति कुछ दीजै ॥ 38 ॥॥ दोहा ॥श्री गणेश यह चालीसा,पाठ करै कर ध्यान ।नित नव मंगल गृह बसै,लहे जगत सन्मान ॥सम्बन्ध अपने सहस्त्र दश,ऋषि पंचमी दिनेश ।पूरण चालीसा भयो,मंगल मूर्ती गणेश ॥■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■#श्रीगणेश सुकतं**************आ तू न इन्द्र क्षुमन्तं चित्रं ग्राभं सं गृभाय ।महाहस्ती दक्षिणेन ॥ ८.०८१.०१विद्मा हि त्वा तुविकृर्मि तुविदेष्णं तुवीमघम् ।तुविमात्रमवोभिः ॥ ८.०८१.०२नहि त्वा शूर देवा न मर्तासो दित्सन्तम् ।भीमं न गां वारयन्ते ॥ ८.०८१.०३एतो विन्द्रं स्तवामेशानं वस्वः स्वराजम् ।न राधसा मर्धिषन्नः ॥ ८.०८१.०४प्रस्तोषदुप गासिषच्छ्रवत्साम गीयमानम् ।अभि राधसा जुगुरत् ॥ ८.०८१.०५आ नो भर दक्षिणेनाभि सव्येन प्र मृश । इन्द्र मा नो वसोर्निर्भाक् ॥ ८.०८१.०६उप क्रमस्वा भर धृषता धृष्णो जनानाम् ।अदाशुष्टरस्य वेदः ॥ ८.०८१.०७ इन्द्र य उ नु ते अस्ति वाजो विप्रेभिः सनित्वः ।अस्माभिः सुतं सनुहि ॥ ८.०८१.०८सद्योजुवस्ते वाजा अस्मभ्यं विश्वश्चन्द्राः ।वशेश्च मक्षू जरन्ते ॥ ८.०८१.०९ गणानां त्वा गणपतिं हवामहे कविं कवीनामुपमश्रवस्तमम् ।ज्येष्ठराजं ब्रह्मणां ब्रह्मणस्पत आ नः शृण्वन्नूतिभिः सीद सादनम् ॥ २.०२३.०१निषुसीद गणपते गणेषु त्वामाहुर्विप्रतमं कवीनाम् ।न ऋते त्वत्क्रियते किं चनारे महाम: मघवञ्चित्रमर्च ॥ १०.११२.०९अभिख्या नौ मघवन्नाधमानान्सखे बोधि वसुपते सखीनाम् ।रणं कृधि रणकृत्सत्यशुष्माभक्ते चिदा भजा गये अ॒स्मान् ॥ १०.११२.१०ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■#गणेशगायत्री_मंत्र■■■■■■■■–'ऊँ एकदन्ताय विद्महे वक्रतुंडाय धीमहि तन्नो बुद्धि प्रचोदयात।।यह गणेश गायत्री मंत्र है। इस मंत्र का प्रतिदिन शांत मन से 108 बार जप करने से गणेशजी की कृपा होती है।#सर्वकार्यसिद्धी_मंत्र'ॐ गं गणपतये नमः' का जप करने से सभी कामनाओं की पूर्ति होती है।धन व आत्मबल की प्राप्ति के लिए हेरम्ब गणपति का मंत्रॐ गं नमः।।रोजगार की प्राप्ति के लिए लक्ष्मी विनायक मंत्र का जप-ॐ श्रीं गं सौभ्याय गणपतये वर वरद सर्वजनं मे वशमानय स्वाहा।विवाह दोषों को दूर करने के लिए पढ़ें त्रैलोक्य मोहन गणेश मंत्रॐ वक्रतुण्डैक दंष्ट्राय क्लीं ह्रीं श्रीं गं गणपते वर वरद सर्वजनं मे वशमानय स्वाहा।#श्रीगणपति_अथर्वशीर्ष■■■■■■■■■■■त्वमेव प्रत्यक्षं तत्वमसित्वमेव केवलं कर्ताऽ सित्वमेव केवलं धर्ताऽसित्वमेव केवलं हर्ताऽसित्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासित्व साक्षादात्माऽसि नित्यम्।।1।। अर्थ- ॐकारापति भगवान गणपति को नमस्कार है। हे गणेश! तुम्हीं प्रत्यक्ष तत्व हो। तुम्हीं केवल कर्ता हो। तुम्हीं केवल धर्ता हो। तुम्हीं केवल हर्ता हो। निश्चयपूर्वक तुम्हीं इन सब रूपों में विराजमान ब्रह्म हो। तुम साक्षात नित्य आत्मस्वरूप हो। ऋतं वच्मि। सत्यं वच्मि।।2।। मैं ऋत न्याययुक्त बात कहता हूं। सत्य कहता हूं। अव त्व मां। अव वक्तारं।अव श्रोतारं। अव दातारं।अव धातारं। अवानूचानमव शिष्यं।अव पश्चातात। अव पुरस्तात।अवोत्तरात्तात। अव दक्षिणात्तात्।अवचोर्ध्वात्तात्।। अवाधरात्तात्।।सर्वतो मां पाहि-पाहि समंतात्।।3।। हे पार्वतीनंदन! तुम मेरी (मुझ शिष्य की) रक्षा करो। वक्ता (आचार्य) की रक्षा करो। श्रोता की रक्षा करो। दाता की रक्षा करो। धाता की रक्षा करो। व्याख्या करने वाले आचार्य की रक्षा करो। शिष्य की रक्षा करो। पश्चिम से रक्षा। पूर्व से रक्षा करो। उत्तर से रक्षा करो। दक्षिण से रक्षा करो। ऊपर से रक्षा करो। नीचे से रक्षा करो। सब ओर से मेरी रक्षा करो। चारों ओर से मेरी रक्षा करो। त्वं वाङ्‍मयस्त्वं चिन्मय:।त्वमानंदमसयस्त्वं ब्रह्ममय:।त्वं सच्चिदानंदाद्वितीयोऽषि।त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्माषि।त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयोऽषि।।4।। तुम वाङ्‍मय हो, चिन्मय हो। तुम आनंदमय हो। तुम ब्रह्ममय हो। तुम सच्चिदानंद अद्वितीय हो। तुम प्रत्यक्ष ब्रह्म हो। तुम दानमय विज्ञानमय हो। सर्वं जगदिदं त्वत्तो जायते।सर्वं जगदिदं त्वत्तस्तिष्ठति।सर्वं जगदिदं त्वयि लयमेष्यति।सर्वं जगदिदं त्वयि प्रत्येति।त्वं भूमिरापोऽनलोऽनिलो नभ:।त्वं चत्वारिकाकूपदानि।।5।। यह जगत तुमसे उत्पन्न होता है। यह सारा जगत तुममें लय को प्राप्त होगा। इस सारे जगत की तुममें प्रतीति हो रही है। तुम भूमि, जल, अग्नि, वायु और आकाश हो। परा, पश्चंती, बैखरी और मध्यमा वाणी के ये विभाग तुम्हीं हो।  त्वं गुणत्रयातीत: त्वमवस्थात्रयातीत:।त्वं देहत्रयातीत:। त्वं कालत्रयातीत:।त्वं मूलाधारस्थितोऽसि नित्यं।त्वं शक्तित्रयात्मक:।त्वां योगिनो ध्यायंति नित्यं।त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णुस्त्वंरूद्रस्त्वं इंद्रस्त्वं अग्निस्त्वंवायुस्त्वं सूर्यस्त्वं चंद्रमास्त्वंब्रह्मभूर्भुव:स्वरोम्।।6।। तुम सत्व, रज और तम तीनों गुणों से परे हो। तुम जागृत, स्वप्न और सुषुप्ति इन तीनों अवस्थाओं से परे हो। तुम स्थूल, सूक्ष्म औ वर्तमान तीनों देहों से परे हो। तुम भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालों से परे हो। तुम मूलाधार चक्र में नित्य स्थित रहते हो। इच्छा, क्रिया और ज्ञान तीन प्रकार की शक्तियाँ तुम्हीं हो। तुम्हारा योगीजन नित्य ध्यान करते हैं। तुम ब्रह्मा हो, तुम विष्णु हो, तुम रुद्र हो, तुम इन्द्र हो, तुम अग्नि हो, तुम वायु हो, तुम सूर्य हो, तुम चंद्रमा हो, तुम ब्रह्म हो, भू:, र्भूव:, स्व: ये तीनों लोक तथा ॐकार वाच्य पर ब्रह्म भी तुम हो। गणादि पूर्वमुच्चार्य वर्णादिं तदनंतरं।अनुस्वार: परतर:। अर्धेन्दुलसितं।तारेण ऋद्धं। एतत्तव मनुस्वरूपं।गकार: पूर्वरूपं। अकारो मध्यमरूपं।अनुस्वारश्चान्त्यरूपं। बिन्दुरूत्तररूपं।नाद: संधानं। सँ हितासंधि:सैषा गणेश विद्या। गणकऋषि:निचृद्गायत्रीच्छंद:। गणपतिर्देवता।ॐ गं गणपतये नम:।।7।। गण के आदि अर्थात 'ग्' कर पहले उच्चारण करें। उसके बाद वर्णों के आदि अर्थात 'अ' उच्चारण करें। उसके बाद अनुस्वार उच्चारित होता है। इस प्रकार अर्धचंद्र से सुशोभित 'गं' ॐकार से अवरुद्ध होने पर तुम्हारे बीज मंत्र का स्वरूप (ॐ गं) है। गकार इसका पूर्वरूप है।बिन्दु उत्तर रूप है। नाद संधान है। संहिता संविध है। ऐसी यह गणेश विद्या है। इस महामंत्र के गणक ऋषि हैं। निचृंग्दाय छंद है श्री मद्महागणपति देवता हैं। वह महामंत्र है- ॐ गं गणपतये नम:। एकदंताय विद्‍महे,वक्रतुण्डाय धीमहि,तन्नो दंती प्रचोदयात।।8।। एक दंत को हम जानते हैं। वक्रतुण्ड का हम ध्यान करते हैं। वह दन्ती (गजानन) हमें प्रेरणा प्रदान करें। यह गणेश गायत्री है। एकदंतं चतुर्हस्तं पाशमंकुशधारिणम्।रदं च वरदं हस्तैर्विभ्राणं मूषकध्वजम्।रक्तं लंबोदरं शूर्पकर्णकं रक्तवाससम्।रक्तगंधाऽनुलिप्तांगं रक्तपुष्पै: सुपुजितम्।।भक्तानुकंपिनं देवं जगत्कारणमच्युतम्।आविर्भूतं च सृष्टयादौ प्रकृ‍ते पुरुषात्परम्।एवं ध्यायति यो नित्यं स योगी योगिनां वर:।।9।। एकदंत चतुर्भज चारों हाथों में पाक्ष, अंकुश, अभय और वरदान की मुद्रा धारण किए तथा मूषक चिह्न की ध्वजा लिए हुए, रक्तवर्ण लंबोदर वाले सूप जैसे बड़े-बड़े कानों वाले रक्त वस्त्रधारी शरीर प रक्त चंदन का लेप किए हुए रक्तपुष्पों से भलिभाँति पूजित। भक्त पर अनुकम्पा करने वाले देवता, जगत के कारण अच्युत, सृष्टि के आदि में आविर्भूत प्रकृति और पुरुष से परे श्रीगणेशजी का जो नित्य ध्यान करता है, वह योगी सब योगियों में श्रेष्ठ है। नमो व्रातपतये। नमो गणपतये,नम: प्रमथपतये।नमस्तेऽस्तु लंबोदरायैकदंताय,विघ्ननाशिने शिवसुताय।श्रीवरदमूर्तये नमो नम:।।10।। व्रात (देव समूह) के नायक को नमस्कार। गणपति को नमस्कार। प्रथमपति (शिवजी के गणों के अधिनायक) के लिए नमस्कार। लंबोदर को, एकदंत को, शिवजी के पुत्र को तथा श्रीवरदमूर्ति को नमस्कार-नमस्कार ।।10।।  एतदथर्वशीर्ष योऽधीते,स ब्रह्मभूयाय कल्पते।स सर्व विघ्नैर्नबाध्यते,स सर्वत: सुखमेधते।स पञ्चमहापापात्प्रमुच्यते।।11।। यह अथर्वशीर्ष (अथर्ववेद का उप‍‍‍निषद) है। इसका पाठ जो करता है, ब्रह्म को प्राप्त करने का अधिकारी हो जाता है। सब प्रकार के विघ्न उसके लिए बाधक नहीं होते। वह सब जगह सुख पाता है। वह पांचों प्रकार के महान पातकों तथा उपपातकों से मुक्त हो जाता है। सायमधीयानो दिवसकृतं पापं नाशयति,प्रातरधीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति।सायंप्रात: प्रयुंजानोऽपापो भवति,सर्वत्राधीयानोऽपविघ्नो भवति।धर्मार्थकाममोक्षं च विंदति।।12।। सायंकाल पाठ करने वाला दिन के पापों का नाश करता है। प्रात:काल पाठ करने वाला रात्रि के पापों का नाश करता है। जो प्रात:- सायं दोनों समय इस पाठ का प्रयोग करता है वह निष्पाप हो जाता है। वह सर्वत्र विघ्नों का नाश करता है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को प्राप्त करता है। इदमथर्वशीर्षमशिष्याय न देयम्।यो यदि मोहाद्‍दास्यति स पापीयान् भवति।सहस्रावर्तनात् यं यं काममधीते तं तमनेन साधयेत्।13।। इस अथर्वशीर्ष को जो शिष्य न हो उसे नहीं देना चाहिए। जो मोह के कारण देता है वह पातकी हो जाता है। सहस्र (हजार) बार पाठ करने से जिन-जिन कामों-कामनाओं का उच्चारण करता है, उनकी सिद्धि इसके द्वारा ही मनुष्य कर सकता है। अनेन गणपतिमभिषिंचति स वाग्मी भवति चतुर्थ्यामनश्र्नन जपति,स विद्यावान भवति।इत्यथर्वणवाक्यं।ब्रह्माद्यावरणं विद्यात्,न बिभेति कदाचनेति।।14।। इसके द्वारा जो गणपति को स्नान कराता है, वह वक्ता बन जाता है। जो चतुर्थी तिथि को उपवास करके जपता है वह विद्यावान हो जाता है, यह अथर्व वाक्य है जो इस मं‍त्र के द्वारा तपश्चरण करना जानता है वह कदापि भय को प्राप्त नहीं होता। यो दूर्वांकुरैंर्यजतिस वैश्रवणोपमो भवति।यो लाजैर्यजति स यशोवान भवति,स मेधावान भवति।यो मोदकसहस्रेण यजति,स वाञ्छित फलमवाप्रोति।य: साज्यसमिद्भिर्यजति,स सर्वं लभते स सर्वं लभते।।15।। जो दूर्वांकुर के द्वारा भगवान गणपति का यजन करता है वह कुबेर के समान हो जाता है। जो लाजो (धानी-लाई) के द्वारा यजन करता है वह यशस्वी होता है, मेधावी होता है। जो सहस्र (हजार) लड्डुओं (मोदकों) द्वारा यजन करता है, वह वांछित फल को प्राप्त करता है। जो घृत के सहित समिधा से यजन करता है, वह सब कुछ प्राप्त करता है। अष्टौ ब्राह्मणान् सम्यग्ग्राहयित्वा,सूर्यवर्चस्वी भवति।सूर्यग्रहे महानद्यां प्रतिमासंनिधौ,वा जप्त्वा सिद्धमंत्रों भवति।महाविघ्नात्प्रमुच्यते।,महादोषात्प्रमुच्यते।महापापात् प्रमुच्यते,स सर्वविद्भवति से सर्वविद्भवति।य एवं वेद इत्युपनिषद्‍।।16।। आठ ब्राह्मणों को सम्यक रीति से ग्राह कराने पर सूर्य के समान तेजस्वी होता है। सूर्य ग्रहण में महानदी में या प्रतिमा के समीप जपने से मंत्र सिद्धि होती है। वह महाविघ्न से मुक्त हो जाता है। जो इस प्रकार जानता है, वह सर्वज्ञ हो जाता है वह सर्वज्ञ हो जाता है। **********अथर्ववेदीय गणपतिउपनिषद समाप्त।।********** #गणेशजी_के_अन्य_मंत्र■■■■■■■■■■■■गणपतिजी का बीज मंत्र 'गं' है। इनसे युक्त मंत्र- 'ॐ गं गणपतये नमः' का जप करने से सभी कामनाओं की पूर्ति होती है। षडाक्षर मंत्र का जप आर्थिक प्रगति व समृद्धि प्रदायक है।१.षडाक्षर मंत्र का जप आर्थिक प्रगति व समृद्धि प्रदायक:-- ॐ वक्रतुंडाय हुम्‌ २.किसी के द्वारा नेष्ट के लिए की गई क्रिया को नष्ट करने के लिए, विविध कामनाओं की पूर्ति के लिए उच्छिष्ट गणपति की साधना करना चाहिए। इनका जप करते समय मुंह में गुड़, लौंग, इलायची, पताशा, ताम्बुल, सुपारी होना चाहिए। यह साधना अक्षय भंडार प्रदान करने वाली है। इसमें पवित्रता-अपवित्रता का विशेष बंधन नहीं है।#उच्छिष्ट_गणपति_का_मंत्र- ॐ हस्ति पिशाचि लिखे स्वाहा ३.आलस्य, निराशा, कलह, विघ्न दूर करने के लिए विघ्नराज रूप की आराधना का यह मंत्र जपें -  गं क्षिप्रप्रसादनाय नम: ४.विघ्न को दूर करके धन व आत्मबल की प्राप्ति के लिए हेरम्ब गणपति का मंत्र जपें - 'ॐ गं नमः' .रोजगार की प्राप्ति व आर्थिक वृद्धि के लिए लक्ष्मी विनायक मंत्र का जप करें-  ॐ श्रीं गं सौभ्याय गणपतये वर वरद सर्वजनं मे वशमानय स्वाहा।६.विवाह में आने वाले दोषों को दूर करने वालों को त्रैलोक्य मोहन गणेश मंत्र का जप करने से शीघ्र विवाह व अनुकूल जीवनसाथी की प्राप्ति होती है-  ॐ वक्रतुण्डैक दंष्ट्राय क्लीं ह्रीं श्रीं गं गणपते वर वरद सर्वजनं मे वशमानय स्वाहा।◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆ #इति_पोस्ट_सम्पूर्णं◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆🙏🏻🚩जयश्री महाकाल🚩🙏🏻लेखक एवं संकलनकर्ता।। #राहुलनाथ ।।™ (ज्योतिष एवं वास्तुशास्त्री)शिवशक्ति_ज्योतिष_एवं_अनुष्ठान,भिलाई,छत्तीसगढ़, भारत📞+ 917999870013,+919827374074 (w)पेज लिंक:-https://www.facebook.com/rahulnathosgybhilai/#चेतावनी:-इस लेख में वर्णित नियम ,सूत्र,व्याख्याए,तथ्य गुरू एवं साधु-संतों के कथन,ज्योतिष-तांत्रिक-आध्यात्मिक-साबरी ग्रंथो एवं स्वयं के अभ्यास अनुभव के आधार पर मात्र शैक्षणिक उद्देश्यों हेतु दी जाती है।इसे मानने के लिए आप बाध्य नही है।अतः बिना गुरु के निर्देशन के साधनाए या प्रयोग ना करे।विवाद या किसी भी स्थिती में लेखक जिम्मेदार नही होगा।विवाद की स्थिति में न्यायलय क्षेत्र दुर्ग छत्तीसगढ़,भारत।◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆#विशेष:-इस पोस्ट को लिखने के लिए स्व अनुभव के साथ साथ आवश्यकता अनुसार कुछ पोस्ट एवं फोट, व्हाट्सएप /फेसबुक/गुगल एवं अलग-अलग पौराणिक साहित्यों  द्वारा ली जाती है। जो किसी मित्र की पोस्ट/फ़ोटो हो सकती,अतः जिनकी पोस्ट है वे संपर्क कर सकते है।ऐसे अवस्था  में त्रुटि होने की संभावना हो सकती है कृपया गुरुजन,मित्रगण मुझे क्षमा करते हुए मेरा  मार्ग प्रशस्त कर साहित्य की त्रुटियों से अवगत कराएं जिससे कि लेख में भविष्य में सुधार किया जा सके।*अगर आपको यह मंत्र पसंद है, तो कृपया शेयर, लाइक या कॉमेंट जरूर करें!* कृपया अपने किसी भी तरह के सुझावों अथवा विचारों को हमारे साथ अवश्य शेयर करें।*आप अपना हर तरह का फीडबैक हमें जरूर साझा करें, तब चाहे वह 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तिलक_लगाने_का_महत्व_एवं_विधि

#तिलक_लगाने_का_महत्व_एवं_विधि
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तिलक किस अंगुली से लगाना चाहिए?
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मोक्ष एवं शक्ति प्राप्ति के लिए तिलक अंगूठे से 
शत्रु नाश करने के लिए तर्जनी से 
धन,दीर्घायु प्राप्त करने के लिए मध्यमा से 
शांति एवं समृद्धि प्राप्त करने के लिए अनामिका उंगली से 
तिलक लगाया जाना चाहिए।

#ब्रह्माण्ड_पुराण_के_अनुसार_तिलक_में
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अंगुठे के प्रयोग से – शक्ति, 
मध्यमा के प्रयोग से – दीर्घायु, 
अनामिका के प्रयोग से- समृद्धि 
तथा तर्जनी से लगाने पर – मुक्ति प्राप्त होती है।
देवताओं पर केवल अनामिका उंगली से तिलक बिन्दु लगाया जाता है।
और शिवलिंग पर तर्जनी मध्यमा और अनामिका से त्रिपुंड बनाया जाता है।
तिलक विज्ञान विषयक समस्त ग्रन्थ तिलक अंकन में नाखून स्पर्श तथा लगे तिलक को पौंछना अनिष्टकारी बतलाते हैं।शास्त्रानुसार यदि द्विज (ब्राह्मण, क्षत्रीय, वैश्य) तिलक नहीं लगाते हैं तो उन्हें “चाण्डाल” कहते हैं। तिलक हमेशा दोनों भौहों के बीच “आज्ञाचक्र” पर भ्रुकुटी पर किया जाता है। इसे चेतना केंद्र भी कहते हैं।
"शिव पुराण" के अनुसार जो व्यक्ति माथे पर त्रिशूल लगाता है उस पर शिव भगवान की विशेष कृपा होती है और उस पर भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न होते हैं।मस्तज पे तिलक लगाने से  व्यक्ति का गौरव बढ़ता है।तिलक का धार्मिक महत्व होने के साथ साथ वैज्ञानिक महत्व भी है।मस्तिष्क में सेराटोनिन एवं बीटाएंडोरफिन रसायनों का संतुलन होता है।इससे मेघाशक्ति बढ़ती है और मानसिक थकावट नही होती।सिर,ललाट,कंठ, हृदय,दोनो बाहु,बाहुमूल,नाभि,पीठ,दोनो बगल में इस प्रकार कुल 12 स्थानों पे तिलक करने का विधान है।(विष्णु संहिता के अनुसार)
#तिलक_किसका_लगाया_जा_सकता_है?
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पर्वताग्रे नदीतीरे रामक्षेत्रे विशेषतः।
सिन्धुतिरे च वल्मिके तुलसीमूलमाश्रीताः।।
मृदएतास्तु संपाद्या वर्जयेदन्यमृत्तिका।
द्वारवत्युद्भवाद्गोपी चंदनादुर्धपुण्ड्रकम।।

#भावार्थ-
चंदन हमेशा पर्वत के नोक का, नदी तट की मिट्टी का, पुण्य तीर्थ का, सिंधु नदी के तट का, चींटी की बांबी व तुलसी के मूल की मिट्टी का चंदन वही उत्तम चंदन है। तिलक हमेंशा चंदन या कुमकुम का ही करना चाहिए। कुमकुम हल्दी से बना हो तो उत्तम होता है। तिर्थ स्नान, जप कर्म, दानकर्म, यज्ञ होमादि, पितर हेतु श्राद्धकर्म तथा देवों का पुजनार्चन ये सभी कर्म तिलक न करने से निष्फल होता है |सिंदूर, केशर, अष्टगंध और भस्म का तिलक लगाना भी श्रेष्ठ हैतुलसी के मूल की मिट्टी का या गोपी चंदन का भी तिलक लगाया जाता है।

#तिलक_लगाने_का_मंत्र
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केशवानन्न्त गोविन्द बाराह पुरुषोत्तम ।
पुण्यं यशस्यमायुष्यं तिलकं मे प्रसीदतु ।।
कान्ति लक्ष्मीं धृतिं सौख्यं सौभाग्यमतुलं बलम् ।
ददातु चन्दनं नित्यं सततं धारयाम्यहम् ।।

दोनों भौंहों के बीच में जहां तिलक लगाते हैं वह आज्ञा चक्र होता है, यहां पर शरीर की प्रमुख तीन नाड़ीयां इडा, पिंगला और सुषुम्ना आकर मिलती है जिस कारण इसे त्रिवेणी या संगम भी कहा जाता है। यहीं से पूरे शरीर का संचालन होता है और यह हमारी चेतना का मुख्य स्थान भी है। इस स्थान पर तिलक लगाने से स्वभाव में सुधार आता है वह देखने वाले पर सात्विक प्रभाव भी पड़ता है।

#तिलक_किस_दिन_किसका_लगाये?
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सोमवार   ◆◆ सफेद चंदन और विभूति या भस्म
मंगलवार  ◆◆ लाल चंदन या चमेली तेल मिश्रित सिंदूर
बुधवार     ◆◆ सूखा सिंदूर
गुरुवार     ◆◆      केशर मिश्रित सफेद चंदन, हल्दी या गोरोचन
शुक्रवार    ◆◆     लाल चंदन या सिंदूर
शनिवार    ◆◆      लाल चंदन या विभूति या भस्म
रविवार     ◆◆      लाल चंदन या हरि चंदन

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🙏🏻🚩जयश्री महाकाल🚩🙏🏻
लेखक एवं संकलनकर्ता
।। #राहुलनाथ ।।™ (ज्योतिष एवं वास्तुशास्त्री)
शिवशक्ति_ज्योतिष_एवं_अनुष्ठान,भिलाई,छत्तीसगढ़, भारत
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#चेतावनी:-इस लेख में वर्णित नियम ,सूत्र,व्याख्याए,तथ्य गुरू एवं साधु-संतों के कथन,ज्योतिष-तांत्रिक-आध्यात्मिक-साबरी ग्रंथो एवं स्वयं के अभ्यास अनुभव के आधार पर मात्र शैक्षणिक उद्देश्यों हेतु दी जाती है।इसे मानने के लिए आप बाध्य नही है।अतः बिना गुरु के निर्देशन के साधनाए या प्रयोग ना करे।विवाद या किसी भी स्थिती में लेखक जिम्मेदार नही होगा।विवाद की स्थिति में न्यायलय क्षेत्र दुर्ग छत्तीसगढ़,भारत।
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श्रीविन्ध्येश्वरी_स्तोत्र_चालीसा_एवं_मंत्रसंग्रह

#श्रीविन्ध्येश्वरी_स्तोत्र_चालीसा_एवं_मंत्रसंग्रह

#श्रीविन्ध्येश्वरी_स्तोत्र
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निशुम्भशुम्भमर्दिनीं प्रचण्डमुण्डखण्डिनीम्।
वने  रणे  प्रकाशिनीं   भजामि   विन्ध्यवासिनीम्।।1।
त्रिशूलरत्नधारिणीं             धराविघातहारिणीम्।
गृहे  गृहे  निवासिनीं  भजामि  विन्ध्यवासिनीम।।2।।
दरिद्रदु:खहारिणीं     सतां      विभूतिकारिणीम्।
वियोगशोकहारिणीं   भजामि   विन्ध्यवासिनीम्।।3।।
लसत्सुलोलचनां          लतां         सदावरप्रदाम्।
कपालशूलधारिणीं     भजामि   विन्ध्यवासिनीम्।।4।।
करे    मुदा    गदाधरां    शिवां    शिवप्रदायिनीम्।
वरावराननां   शुभां    भजामि   विन्ध्यवासिनीम्।।5।।
ऋषीन्द्रजामिनप्रदां त्रिधास्यरूपधारिणिम्।
जले स्थले निवासिनीं  भजामि   विन्ध्यवासिनीम्।।6।।
विशिष्टसृष्टिकारिणीं          विशालरूपधारिणीम्।
महोदरां  विशालिनीं   भजामि   विन्ध्यवासिनीम्।।7।।
प्रन्दरादिसेवितां              मुरादिवंशखण्डिनीम्।
विशुद्धबुद्धिकारिणीं    भजामि    विन्ध्यवासिनीम्।।8।।
*****।।इति श्रीविन्ध्येश्वरीस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।।********

#श्रीविन्ध्येश्वरी_स्तोत्र_का_हिंदी_में_अर्थ
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अर्थ – शुम्भ तथा निशुम्भ का संहार करने वाली, चण्ड तथा मुण्ड का विनाश करने वाली, वन में तथा युद्ध स्थल में पराक्रम प्रदर्शित करने वाली भगवती विन्ध्यवासिनी की मैं आराधना करता हूँ.।।1।।

अर्थ – त्रिशूल तथा रत्न धारण करने वाली, पृथ्वी का संकट हरने वाली और घर-घर में निवास करने वाली भगवती विन्धवासिनी की मैं आराधना करता हूँ।।2।।.

अर्थ – दरिद्रजनों का दु:ख दूर करने वाली, सज्जनों का कल्याण करने वाली और वियोगजनित शोक का हरण करने वाली भगवती विन्ध्यवासिनी की मैं आराधना करता हूँ.।।3।।

अर्थ – सुन्दर तथा चंचल नेत्रों से सुशोभित होने वाली, सुकुमार नारी विग्रह से शोभा पाने वाली, सदा वर प्रदान करने वाली और कपाल तथा शूल धारण करने वाली भगवती विन्ध्यवासिनी की मैं आराधना करता हूँ.।।4।।

अर्थ – प्रसन्नतापूर्वक हाथ में गदा धारण करने वाली, कल्याणमयी, सर्वविध मंगल प्रदान करने वाली तथा सुरुप-कुरुप सभी में व्याप्त परम शुभ स्वरुपा भगवती विन्ध्यवासिनी की मैं आराधना करता हूँ.।।5।।

अर्थ – ऋषि श्रेष्ठ के यहाँ पुत्री रुप से प्रकट होने वाली, ज्ञानलोक प्रदन करने वाली, महाकाली, महालक्ष्मी तथा महासरस्वती रूप से तीन स्वरुपों धारण करने वाली और जल तथा स्थल में निवास करने वाली भगवती विन्ध्यवासिनी की मैं आराधना करता हूँ.।।6।।

अर्थ – विशिष्टता की सृष्टि करने वाली, विशाल स्वरुप धारण करने वाली, महान उदर से सम्पन्न तथा व्यापक विग्रह वाली भगवती विन्ध्यवासिनी की मैं आराधना करता हूँ.।।7।।

अर्थ – इन्द्र आदि देवताओं से सेवित, मुर आदि राक्षसों के वंश का नाश करने वाली तथा अत्यन्त निर्मल बुद्धि प्रदान करने वाली भगवती विन्ध्यवासिनी की मैं आराधना करता हूँ.।।8।।
विशेष:-जो भी व्यक्ति श्रद्धा तथा विश्वास के साथ नियमित रुप से 9 दिन तक इस स्तोत्र का जाप करता है उसे जीवन में अपार सफलता प्राप्त होती है. धन-धान्य, सुख-समृद्धि, वैभव, पराक्रम तथा सौभाग्य में वृद्धि होती है.
माँ विन्ध्येश्वरी देवी का ये स्तोत्र गीताप्रेस,गोरखपुर से प्रकाशित ग्रंथ "देवी स्तोत्र रत्नाकर" पर आधारित है।यह एक संकलित स्तोत्र है अतः इस स्तोत्र के रचयिता के नाम का ज्ञान नही है।माँ विन्ध्यासिनी त्रिकोण यन्त्र पर स्थित तीन रूपों को धारण करती हैं जहां स्वयं माँ आदिशक्ति महालक्ष्मी विंध्यवासिनी के रूप में, अष्टभुजी अर्थात महासरस्वती और कालीखोह स्थित महाकाली के रूप में विराजमान हैं। मान्यता अनुसार सृष्टि आरंभ होने से पूर्व और प्रलय के बाद भी इस क्षेत्र का अस्तित्व कभी समाप्त नहीं हो सकता।

************।।इति श्रीविन्ध्येश्वरीस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।।******************
#श्रीविन्ध्येश्वरी_चालीसा
दोहा
नमो नमो विन्ध्येश्वरी नमो नमो जगदंबे ।
संतजनो कर काज में,मां करती नही विलंब।।

संतजनो के काज में मां करती नहीं विलंभ ॥
जय जय जय विन्ध्याचल रानी । आदि शक्ति जग विदित भवानी ॥
सिंहवाहिनी जै जग माता । जय जय जय त्रिभुवन सुखदाता ॥
कष्ट निवारिनी जय जग देवी । जय जय जय जय असुरासुर सेवी ॥
महिमा अमित अपार तुम्हारी । शेष सहस मुख वर्णत हारी ॥
दीनन के दुःख हरत भवानी । नहिं देख्यो तुम सम कोई दानी ॥
सब कर मनसा पुरवत माता । महिमा अमित जगत विख्याता ॥
जो जन ध्यान तुम्हारो लावै । सो तुरतहि वांछित फल पावै ॥
तू ही वैष्णवी तू ही रुद्राणी । तू ही शारदा अरु ब्रह्माणी ॥
रमा राधिका शामा काली । तू ही मात सन्तन प्रतिपाली ॥
उमा माधवी चण्डी ज्वाला । बेगि मोहि पर होहु दयाला ॥
तू ही हिंगलाज महारानी । तू ही शीतला अरु विज्ञानी ॥
दुर्गा दुर्ग विनाशिनी माता । तू ही लक्श्मी जग सुखदाता ॥
तू ही जान्हवी अरु उत्रानी । हेमावती अम्बे निर्वानी ॥
अष्टभुजी वाराहिनी देवी । करत विष्णु शिव जाकर सेवी ॥
चोंसट्ठी देवी कल्यानी । गौरी मंगला सब गुण खानी ॥
पाटन मुम्बा दन्त कुमारी । भद्रकाली सुन विनय हमारी ॥
वज्रधारिणी शोक नाशिनी । आयु रक्शिणी विन्ध्यवासिनी ॥
जया और विजया बैताली । मातु सुगन्धा अरु विकराली ।
नाम अनन्त तुम्हार भवानी । बरनैं किमि मानुष अज्ञानी ॥
जा पर कृपा मातु तव होई । तो वह करै चहै मन जोई ॥
कृपा करहु मो पर महारानी । सिद्धि करिय अम्बे मम बानी ॥
जो नर धरै मातु कर ध्याना । ताकर सदा होय कल्याना ॥
विपत्ति ताहि सपनेहु नहिं आवै । जो देवी कर जाप करावै ॥
जो नर कहं ऋण होय अपारा । सो नर पाठ करै शत बारा ॥
निश्चय ऋण मोचन होई जाई । जो नर पाठ करै मन लाई ॥
अस्तुति जो नर पढ़े पढ़ावे । या जग में सो बहु सुख पावै ॥
जाको व्याधि सतावै भाई । जाप करत सब दूरि पराई ॥
जो  नर अति बन्दी महं होई । बार हजार पाठ कर सोई ॥
निश्चय बन्दी ते छुटि जाई । सत्य बचन मम मानहु भाई ॥
जा पर जो कछु संकट होई । निश्चय देबिहि सुमिरै सोई ॥
जो नर पुत्र होय नहिं भाई । सो नर या विधि करे उपाई ॥
पांच वर्ष सो पाठ करावै । नौरातर में विप्र जिमावै ॥
निश्चय होय प्रसन्न भवानी । पुत्र देहि ताकहं गुण खानी ।
ध्वजा नारियल आनि चढ़ावै । विधि समेत पूजन करवावै ॥
नित प्रति पाठ करै मन लाई । प्रेम सहित नहिं आन उपाई ॥
यह श्री विन्ध्याचल चालीसा । रंक पढ़त होवे अवनीसा ॥
यह जनि अचरज मानहु भाई । कृपा दृष्टि तापर होई जाई ॥
जय जय जय जगमातु भवानी । कृपा करहु मो पर जन जानी ॥
**********श्री विन्ध्येश्वरी चालीसा संपूर्ण*************
             
#आरती_श्रीविन्ध्येश्वरीजी_की
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सुन मेरी देवी पर्वत वासिनी तेरा पार न पाया ॥
पान सुपारी ध्वजा नारियल ले तरी भेंट चढ़ाया । सुन.।
सुवा चोली तेरे अंग विराजे केसर तिलक लगाया । सुन.।
नंगे पग अकबर आया सोने का छत्र चढ़ाया । सुन.।
उँचे उँचे पर्वत भयो दिवालो नीचे शहर बसाया । सुन.।
कलियुग द्वापर त्रेता मध्ये कलियुग राज सबाया । सुन.।
धूप दीप नैवेद्य आरती मोहन भोग लगाया । सुन.।
ध्यानू भगत मैया तेरे गुण गावैं मनवांछित फल पाया । सुन.।
*********आरती श्री विन्ध्येश्वरी जी की सम्पूर्ण*********

#देवी_का_शक्तिशाली_आत्मरक्षामंत्र
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ॐ क्षीं क्षीं क्षीं क्षीं क्षीं फट्'

#देवी_का_स्त्री_सौभाग्यवर्धक_मंत्र
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ॐ ह्रीं कपालिनि कुल कुण्डलिनि मे सिद्धि देहि भाग्यं देहि देहि स्वाहा।।

◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆ #इति_पोस्ट_सम्पूर्णं◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆
🙏🏻🚩जयश्री महाकाल🚩🙏🏻
लेखक एवं संकलनकर्ता
।। #राहुलनाथ ।।™ (ज्योतिष एवं वास्तुशास्त्री)
शिवशक्ति_ज्योतिष_एवं_अनुष्ठान,भिलाई,छत्तीसगढ़, भारत
📞+ 917999870013,+919827374074 (w)
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#चेतावनी:-इस लेख में वर्णित नियम ,सूत्र,व्याख्याए,तथ्य गुरू एवं साधु-संतों के कथन,ज्योतिष-तांत्रिक-आध्यात्मिक-साबरी ग्रंथो एवं स्वयं के अभ्यास अनुभव के आधार पर मात्र शैक्षणिक उद्देश्यों हेतु दी जाती है।इसे मानने के लिए आप बाध्य नही है।अतः बिना गुरु के निर्देशन के साधनाए या प्रयोग ना करे।विवाद या किसी भी स्थिती में लेखक जिम्मेदार नही होगा।विवाद की स्थिति में न्यायलय क्षेत्र दुर्ग छत्तीसगढ़,भारत।
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#विशेष:-इस पोस्ट को लिखने के लिए स्व अनुभव के साथ साथ आवश्यकता अनुसार कुछ पोस्ट एवं फोट, व्हाट्सएप /फेसबुक/गुगल एवं अलग-अलग पौराणिक साहित्यों  द्वारा ली जाती है। जो किसी मित्र की पोस्ट/फ़ोटो हो सकती,अतः जिनकी पोस्ट है वे संपर्क कर सकते है।ऐसे अवस्था  में त्रुटि होने की संभावना हो सकती है कृपया गुरुजन,मित्रगण मुझे क्षमा करते हुए मेरा  मार्ग प्रशस्त कर साहित्य की त्रुटियों से अवगत कराएं जिससे कि लेख में भविष्य में सुधार किया जा सके।
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दुर्गा_सप्तशती_के_बीज_एवं_वशीकरण_मंत्रो_का_संग्रह

#दुर्गा_सप्तशती_के_बीज_एवं_वशीकरण_मंत्रो_का_संग्रह
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#दुर्गा_सप्तशती_बीज_मंत्र_खण्ड
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कुल सात सौ प्रयोगें के श्लाकों वाले दुर्गा सप्तशती में मारण के 90, मोहन के 90, उच्चाटन के 200, स्तंभन के 200, विद्वेषण के 60 और वशीकरण के 60 प्रयोग होते हैं। इसी कारण इसे सप्तशती कहा जाता है। जैसा कि आप सब में से अधिकतर लोग इस बात को जानते ही होंगे कि हमारे हिंदू धर्म में सबसे प्रमुख देवी जिनको माना जाता है वह मां दुर्गा है। मां दुर्गा को देवी शक्ति और जगदंबा के नाम से भी जाना जाता है। मां दुर्गा शाक्त संप्रदाय की प्रमुख एवं मुख्य देवी है और मां दुर्गा एकमात्र ऐसी देवी है जिनकी तुलना स्वयं परम ब्रह्म (ब्रम्हा) से की जाती है। मां दुर्गा के बारे में यह मान्यताएं प्रख्यात हैं कि वह सुख, शांति, समृद्धि तथा धर्म पर आघात करने वाले दुष्ट राक्षस और बुरी शक्तियों का विनाश करती है।
मां दुर्गा के वैसे तो कई रूप हैं पार्वती, लक्ष्मी, सावित्री पर इन सबसे अलग मां दुर्गा का मुख्य रूप गौरी है, इसका मतलब शांत, सुंदर और गोरा रूप होता है। मां दुर्गा का सबसे भयानक रूप जो है वह है मां काली का जिसका अर्थ होता है काला रूप। मां दुर्गा शेर की सवारी करती है और उनकी आठ भुजाएं हैं और हर भुजाओं में कोई ना कोई शस्त्र होते हैं।
दुर्गा सप्तशती में  वर्णित कवच को बीज , अर्गला को शक्ति और कीलक को कीलक कहा गया है।
दुर्गा सप्तशती के मंत्र बहुत ही चमत्कारी हैं अगर विधि-विधान से इनका जाप किया जाए तो असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं। ये मंत्र बहुत ही जल्दी असर दिखाते हैं। (दुर्गा सप्तशती के मंत्र बहुत ही शीघ्र असर दिखाते हैं, यदि आप मंत्रों का उच्चारण ठीक से नहीं कर सकते तो किसी योग्य ब्राह्मण से इन मंत्रों का जाप करवाएं, अन्यथा इसके दुष्परिणाम भी हो सकते हैं।
जाप विधि– सुबह जल्दी उठकर साफ वस्त्र पहनकर सबसे पहले माता दुर्गा की पूजा करें। इसके बाद अकेले में कुशा (एक प्रकार की घास) के आसन पर बैठकर लाल चंदन के मोतियों की माला से इन मंत्रों का जाप करें।
इन मंत्रों की प्रतिदिन 5 माला जाप करने से मन को शांति तथा प्रसन्नता मिलती है। यदि जाप का समय, स्थान, आसन, तथा माला एक ही हो तो यह मंत्र शीघ्र ही सिद्ध हो जाते हैं।

#कवच_के_रूप_में_बीज_मंत्र
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या चण्डी मधुकैटभादिदैतयदलनी या माहिषोन्मूलिनी।
या धुम्रेक्षणचण्डमण्ड मथनी या रक्तबीजशनी।।
शक्ति शुम्भनिशुम्भ दैयदलनी या सिद्धिदात्री परा।
सा देवी नवकोटिमूर्तसहिता मां पातु विश्वेश्वरी।।

इस बीज मेंत्र में अपार शक्ति समाहित है और इसके प्रभाव से हर बाधाएं दूर होती हैं। समस्त दोषों से छुटकारा मिलने के साथ-साथ जीवन सुखमय बन जाता है। इसका लाभ गुरु के सानिध्य में साधना और मंत्र जाप से मिलता है। इसी के साथ देवी दुर्गा के सभी
#नौ_रूपों_के_बीज_मंत्र
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शैलपुत्रीः ह्रीं शिवायै नमः!
ब्रह्मचारिणीः ह्रीं श्रीं अम्बिकायै नमः!
चंद्रघंटाः ऐं श्रीं शक्तयै नमः!
कूष्मांडाः ऐं ह्रीं देव्यै नमः!
स्कंदमाताः ह्रीं क्लीं स्वमिन्यै नमः!
कात्यायनीः क्लीं श्री त्रिनेत्रायै नमः!
कालरात्रिः क्लीं ऐं श्री कालिकायै नमः!
महागौरीः श्री क्लीं ह्रीं वरदायै नमः!
सिद्धिदात्रीः ह्रीं क्लीं ऐं सिद्धये नमः!

#दुर्गा_मंत्र_साधना
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मां दुर्गा के मंत्रों की वैदिक रीति द्वारा साधना के अनुसार जाप करने से हर तरह की मनोकामना पूर्ति संभव है। मां दुर्गा के मूर्ति या तस्वीर की पंचोपचार द्वारा पूजा कर तुलसी या चंदन की माला से जाप करना चाहिए। अलग-अलग मनोकामनाओं के मंत्र अलग-अलग इस प्रकार हैंः-

#सर्व_विध्ननाशक
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सर्वबाधा प्रशमनं त्रिलोक्यस्यखिलेश्वरी।
एवमेय त्वया कार्य मस्माद्वैरि विनाशनम्।।
#भय_मुक्ति_और_ऐश्वर्य_प्राप्ति
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ऐश्वर्य यत्प्रसादेन सौभाग्य-आरोग्य सम्पदः।
शत्रु हानि परोमोक्षः स्तुयते सान किं जनै।।
#विपत्ति_नाशक
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शरणगतर्दिनात्र परित्राण पारायण्ये।
सर्वस्यार्ति हरे देवि नारायणि नमस्तुते।।
#पाप_मुक्ति_हेतु
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हिनस्ति दैत्यतेजांसि स्वनेनापूर्य या जगत् ।
सा घण्टा पातु नो देवि पापेभ्योऽन: सुतानिव ॥
#कार्य_सिद्धि
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दुर्गे देवी नमस्तुभ्यं सर्वकामार्थसाधिके।
मम सिद्धिंमसिद्धिं व स्वप्ने सर्वं प्रदर्शय।।
#दरिद्रता_नाशक
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ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तो:।
स्वस्थै: स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि ।।
दारिद्र्यदु:खभयहारिणि का त्वदन्या।
सर्वोपकारकरणाय सदाऽऽ‌र्द्रचित्ता ॥१।।
#निरोगता_और_सौभाग्य
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देहि सौभाग्यं आरोग्यं देहि में परम सुखम्,
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषोजहि।।
#सर्व_कलयाण
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सर्व मंगल मांगल्ये शिवे स्वार्थ साधिके।
शरण्ये´्ंबके गौरी नारायणी नमोस्तुते।।
#संतान"_प्राप्ति_और_बाधा_मुक्तिः
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सर्वाबाधा विनिर्मुक्तो धन धान्य सुतान्वितः।
मनुष्यों मत्प्रसादेन भविष्यति न संशय।।
#शत्रु_नाश
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ऊँ ह्लीं बगलामुखी सर्वदुष्टानं
वाचंमुखं पदं स्तंभय जिह्वाम् कीलय बुद्धिविनाशाय ह्लीं ऊँ स्वाहा।
#सुलक्षणापत्नी
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पत्नीं मनोरमां देही मनोवृत्तानुसारिणीम्,
तारिणीं दुर्ग संसारसागरस्य कुलोद्भवाम्।।१।।

हे गौरी शंकरधंगी, यथा तवं शंकरप्रिया ।
तथा मां कुरु कल्याणी, कान्तकान्तम् सुदुर्लभं ।।२।।

#दुःख_बाधा_दूर_करने_हेतु
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सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके ।
शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणि नमोऽस्तुते ।।१।।

ॐ जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी ।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते ।।२।।

#अन्य_इच्छापुरक_मंत्र
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या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।१।।
या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।२।।
या देवी सर्वभूतेषु तुष्टिरूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।३।।
या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।४।।
या देवी सर्वभूतेषु दयारूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।५।।
या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।६।।
या देवी सर्वभूतेषु शांतिरूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।७।।

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#वशीकरण_मंत्र_खंड
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वशीकरण अर्थात सम्मोहन या आकर्षण प्रयोग के विविध मंत्रों में देवी दुर्गा वशीकरण मंत्र भी विशिष्ट व अचूक प्रभाव वाले होते हैं। उनके कुछ सरलता के साथ सामान्य जाप किए जाते हैं, तो कुछ पूरी तरह से विधि-विधान के साथ विशेष वैदिक या तांत्रिक अनुष्ठान के बाद प्रयोग में लाए जाते हैं। इसके प्रयोगों से अगर स्वाभाव, आचरण  या व्यवहार से अनियंत्रत हो चुके किसी व्यक्ति को अपने नियंत्रण में लाया जा सकता है तो रूठे निकट संबंध के व्यक्ति का मान-मनव्वल भी संभव है। वैचारिक और भावनात्मक मतभेद से बिगड़े चुके दांपत्य संबंध हों या फिर अनैतिकता की राह पर भटके हुए परिवार का कोई सदस्य, उन्हें सही राह पर लाया जा सकता है। इनसे प्रेम-संबंध की मधुरता भी बढ़ाई जा सकती है। महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित मार्कण्डेय पुराण की धार्मिक पुस्तक दुर्गा सप्तशती के कई अनुभव सिद्ध मंत्र बहुत ही उपयोगी हैं। कामनापूर्ति के कुल 13 अध्यायों में आठवां मिलाप और वशीकरण के लिए है, जिनमें एक अचूक असर देने वाला एक मंत्र इस प्रकार हैं"||
#वशीकरण_मंत्र
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ॐ ज्ञानि न मपि चेतान्शी देवी भग्वति हिसा ।
ग्रहा बलादा कृष्य मोहाय महामाया प्रयक्षति. ।।

#विधि
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इस मंत्र का प्रयोग करने से पहले भगवती त्रिपुर सुंदरी मां महामाया का एकग्रता से ध्यान किया जाता है। ध्यान के बाद उनकी पूरी तरह से श्रद्धा-भक्ति के साथ पंचोपकार विधि से पूजा कर उनके सामने अपनी मनोकामन की इच्छा व्यक्त की जाती है। जिस किसी के ऊपर वशीकरण के प्रयोग करने हों उसका नाम लेते हुए मंत्र का 21, 51 या 108 बार जाप किया जाता है। इस अनुष्ठान के समय लाल रंग के प्रयोग महत्वपूर्ण है। इस संदर्भ में लाल आसन, लाल फूल और जाप के लिए उपयोग में आने वाली लाल चंदन की माला है। इसका प्रयोग अनैतिक कार्य यानि किसी को हानि पहुंचाने के उद्देश्य करने की सख्त मनाही है। अन्यथा यह मंत्र पलटवार भी कर सकता है।प्रबल आकर्षण वशीकरण के लिए निम्न मंत्र का 10 हजार जप कर 1,000 आहुति से हवन करें। संकल्प में नाम बोलें, कार्य होगा।

#अन्य_वशीकरण_साबर_मंत्र
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ओम नमो काला भैरूं,
काली रात, काला चाल्या आधी रात,
काला रेत मेरा वीर,   
पर नारी के राखे सीर, बेगी जा छाती धर ला,
सूती हो जो जगाय ला,
शब्द सांचा पिण्ड कांचा पफूरो मंत्रा ईश्वरी वाचा।
(४३दिन१०८पाठ)

#वशीकरण_मंत्र
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ओम जल मोहूं, थल मोहूं, जंगल की हिरणी मोहूं,
बाट चलंता बटोही मोहूं, कचहरी बैठी राजा मोहूं,
पीढ़ा बैठी रानी मोहूं, मोहनी मेरा नाम,
मोहूं जग संसार, तारा तरीला तोतला तीनों बसैं कपाल,
मस्तक बैठी मात के दुश्मन करूं पामाल,
मेरी भक्ति गुरु की शक्ति पुफरो मंत्र ईश्वरी वाचा।
(४३दिन१०८पाठ,इत्र पे फुकना है)

#वशीकरण_मंत्र
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ओम सत् नाम आदेश गुरु को,
लौंग तू मेरा भाई,चार लौंग ने शक्ति चलाई,
पहली लौंग राती माता,दूजी लौंग जोबन जाती,
तीजी लौंग अंग मरोड़े,चैथी लौंग दोऊ कर जोड़े,
चारो लौंग जो मेरी खाए,
अमुकी अमुक के पास चली आए,
मेरी भक्ति गुरु की शक्ति फूरो मंत्र ईश्वरी वाचा।
(रविवार से प्रारम्भ करे,३१दिन43पाठ,४ लौंग पे)

#वशीकरण_मंत्र
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ओम नमो धूलि धूलि,
विकट चांदनी पर मारूं धूलि।
धूलि लगे, बने दीवानी।
घर तजे, बाहर तजे।
ठाडा तजे भर्तार दीवानी।
तू नाहरसिंह वीर अमुक को उठाय लाव।
न लाय तो हनुमान वीर की दुहाय।
मेरी भक्ति, गुरु की शक्ति, फुरो मंत्र ईश्वरोवाचा।
(शानिवार,1108 पाठ अभिमंत्रित करे,शनिवार को स्त्री की चिता की भस्म पे,ये तामसिक एवं असामाजिक कृत्य है हो सके तो इसे मात्र ज्ञानार्थ ही ले)

माता की नौ शक्तियों की साधना के लिए नौ विभिन्न मंत्र बताए गए हैं जिनकी साधना शक्ति उपासना पर्व  नौरात्र में की जाती है। वे इस प्रकार हैंः-

1.#शैलीपुत्री
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वंदे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
वृषारुदढां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्।।

2.#ब्रह्मचारिणी
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दधाना करपद्माभ्याम क्षमालाकमण्डलू।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा।।

3.#चंद्रघंटा
**********
पिण्डजप्रवरारुढ़ा चण्डकोपास्तकैर्युता।
प्रसादं तनुते मह्यां चंद्रघण्टेति विश्रुता।।

4.#कुष्माण्डा
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सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च।
दधाना हस्तपद्मभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे।।

5.#स्कंदमाता
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सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया।
शुभदास्तु सदा देवी स्कंदमाता यशस्विनी।।

6. #कत्यायनी
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चंद्रहासोज्वलकरा शर्दूलवरवाहना।
कत्यायनी शुभं दद्यादेवी दानवघातिनी।।

7. #कालरात्री
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एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।
लम्बोष्ठी कर्णिकाकार्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी।।
वामपादोल्लोहलताकण्टकभूषण।
वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयङक्री।।

8. #महागौरी
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श्वेते वृषे समारुढा श्वेताम्बरधरा शुचिः।
महागौरी शुभं दद्यन्महादेवप्रमोददा।।

9. #सिद्धिदात्री
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सिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि।
सेव्यमाना सदा भूयात्
#तीव्र_दुर्गा_साधना_का_मंत्र
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ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे,
ऊँ ग्लौं हूं क्लीं जूं सः ,
ज्वालय-ज्वालय, ज्वल-ज्वल प्रज्ज्वल-प्रज्ज्वल,
ऐं ह्रीं क्लीं चमुण्डायै विच्चे, ज्वल हं सं लं क्षं फट स्वाहा!!
#अष्टाक्षरी_मंत्र
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ऊँ ह्रीं दुं दुर्गायै नमः(स्वयं सिद्ध मंत्र)
#पोस्ट_श्रीदुर्गा_सप्तशती_अनुसार
क्रमशः.......

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🙏🏻🚩जयश्री महाकाल🚩🙏🏻
लेखक एवं संकलनकर्ता
।। #राहुलनाथ ।।™ (ज्योतिष एवं वास्तुशास्त्री)
शिवशक्ति_ज्योतिष_एवं_अनुष्ठान,भिलाई,छत्तीसगढ़, भारत
📞+ 917999870013,+919827374074 (w)
पेज लिंक:-https://www.facebook.com/rahulnathosgybhilai/
#चेतावनी:-इस लेख में वर्णित नियम ,सूत्र,व्याख्याए,तथ्य गुरू एवं साधु-संतों के कथन,ज्योतिष-तांत्रिक-आध्यात्मिक-साबरी ग्रंथो एवं स्वयं के अभ्यास अनुभव के आधार पर मात्र शैक्षणिक उद्देश्यों हेतु दी जाती है।इसे मानने के लिए आप बाध्य नही है।अतः बिना गुरु के निर्देशन के साधनाए या प्रयोग ना करे।विवाद या किसी भी स्थिती में लेखक जिम्मेदार नही होगा।विवाद की स्थिति में न्यायलय क्षेत्र दुर्ग छत्तीसगढ़,भारत।
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